UP में लेट मानसून ने बढ़ाई टेंशन! खरीफ सीजन बचाने के लिए CM Yogi का क्या मास्टरप्लान? 75 जिलों में अलर्ट

UP Monsoon Delay: उत्तर प्रदेश में मानसून की देरी ने खेती-किसानी से लेकर प्रशासनिक तैयारियों तक दबाव बढ़ा दिया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 28 जून के आसपास पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जबकि सामान्य तौर पर यह इससे लगभग 12 दिन पहले दस्तक दे देता है। इसी अनिश्चितता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागों को खरीफ सीजन के लिए बीज, खाद, सिंचाई, फसल ऋण और किसान सलाह सेवाओं को पहले से दुरुस्त रखने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री ने कृषि उत्पादन आयुक्त शाखा से जुड़े विभागों की समीक्षा बैठक में साफ कहा कि मौसम का मिजाज अब पहले जैसा अनुमानित नहीं रह गया है। कभी बारिश देर से आती है, कभी कम दिनों में तेज बारिश हो जाती है और बीच-बीच में सूखे जैसे हालात बनते हैं। ऐसे में सरकार की तैयारी केवल सामान्य मानसून को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि असामान्य बारिश, लू, उमस और संभावित शुष्क दौर को देखते हुए होनी चाहिए।

UP Monsoon Delay

यूपी मानसून में देरी क्यों अहम है?

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े कृषि राज्य में खरीफ की बुआई काफी हद तक मानसून के समय और फैलाव पर निर्भर करती है। धान की नर्सरी, रोपाई, मक्का, दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती के लिए शुरुआती बारिश बहुत मायने रखती है। अगर बारिश कुछ दिन भी पीछे खिसकती है, तो किसान बुआई के फैसले टालते हैं और खेत की तैयारी, मजदूरी, सिंचाई और बीज की व्यवस्था प्रभावित होती है।

मौसम संबंधी आकलन के अनुसार, मानसून की रफ्तार बिहार के आसपास धीमी पड़ने से उत्तर प्रदेश में इसकी एंट्री अटक गई थी। अब इसके आगे बढ़ने की स्थिति बनी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में शनिवार शाम से बादल बढ़ने और रविवार के बाद मानसून के लिए अधिक अनुकूल हालात बनने की उम्मीद है। हालांकि, उससे पहले क्षेत्र के कई हिस्सों में लू और उमस लोगों की परेशानी बढ़ा सकती है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में बुधवार से शुक्रवार तक गर्मी का असर बने रहने की आशंका है। कुछ इलाकों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के करीब रह सकता है। अधिक नमी के कारण वास्तविक तापमान से ज्यादा गर्मी महसूस हो सकती है और हीट इंडेक्स 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना है। मंगलवार को अधिकतम तापमान 39.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 4.7 डिग्री अधिक था।

सोमवार (23 जून) को हुई हल्की बारिश से थोड़ी उम्मीद जरूर बनी थी, लेकिन अगले दिन लोगों को खास राहत नहीं मिली। दिन के समय उमस और तेज धूप ने गर्मी को और कठिन बना दिया। यही स्थिति किसानों के लिए भी चुनौती बनती है, क्योंकि खेत में नमी पर्याप्त न हो तो धान की रोपाई या बारिश आधारित बुआई शुरू करना जोखिम भरा हो जाता है।

खरीफ तैयारी में बीज, खाद और सिंचाई पर सबसे ज्यादा फोकस

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों से खरीफ अभियान को मिशन मोड में चलाने को कहा है। निर्देश दिए गए हैं कि हर जिले में गुणवत्तापूर्ण बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहें और किसानों को उनके लिए अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें। खरीफ सीजन में समय पर बीज मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि देरी होने पर किसान कम अवधि वाली किस्मों की ओर जाते हैं या कई बार बुआई का रकबा घटा देते हैं।

खाद की उपलब्धता पर भी खास जोर दिया गया है। बारिश शुरू होते ही उर्वरकों की मांग अचानक बढ़ जाती है, खासकर उन जिलों में जहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अगर इस समय वितरण व्यवस्था कमजोर रही, तो खेत तैयार होने के बावजूद किसान रोपाई या बुआई में पीछे रह सकते हैं। मुख्यमंत्री ने खाद की आपूर्ति और वितरण की नियमित निगरानी करने के निर्देश दिए हैं।

सिंचाई की व्यवस्था इस बार और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि मानसून देर से आने पर नर्सरी बचाने और खेत में नमी बनाए रखने के लिए किसान ट्यूबवेल, नहर या पंपिंग सेट पर अधिक निर्भर होते हैं। इससे डीजल, बिजली और पानी की मांग बढ़ती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च सीजन की शुरुआत में ही आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है।

फसल ऋण को लेकर भी सरकार ने सतर्कता बरतने को कहा है। खरीफ की शुरुआत में किसानों को बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, डीजल और खेत की तैयारी के लिए नकद जरूरत होती है। अगर संस्थागत ऋण समय पर नहीं मिलता, तो कई किसान महंगे निजी कर्ज की ओर चले जाते हैं। इससे पूरी फसल अवधि में उनकी लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।

कम बारिश हुई तो क्या रास्ता किसानों के पास?

बैठक में अधिकारियों ने बताया कि कृषि विभाग ने कम बारिश या सूखे जैसे हालात को ध्यान में रखते हुए आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है। ऐसी योजनाओं में आम तौर पर वैकल्पिक फसलों की सलाह, कम अवधि वाली किस्में, बीज व्यवस्था, सिंचाई सहायता, कीट-रोग प्रबंधन और जिला स्तर पर अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय शामिल होता है।

यह कार्ययोजना इसलिए जरूरी है क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में बारिश एक जैसी नहीं होती। पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानसून पहले पहुंच सकता है, जबकि मध्य और पश्चिमी हिस्सों में बारिश का समय और तीव्रता अलग हो सकती है। किसी जिले में तेज बारिश से जलभराव की समस्या बनती है, तो दूसरे जिले में कम बारिश से नमी की कमी रह सकती है।

धान की खेती सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि इसकी नर्सरी और रोपाई दोनों के लिए पानी की जरूरत होती है। अगर मानसून देर से आता है, तो किसान रोपाई की तारीख बदलते हैं। कुछ किसान कम अवधि वाली धान किस्में चुन सकते हैं, जबकि बारिश कमजोर रहने पर मक्का, अरहर, उड़द, तिल या अन्य विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। ऐसे फैसलों में स्थानीय कृषि सलाह की भूमिका अहम हो जाती है।

मुख्यमंत्री ने वैज्ञानिक सलाह को किसानों तक समय पर पहुंचाने पर भी जोर दिया है। मौसम बदलने पर केवल सरकारी तैयारी काफी नहीं होती, किसान को यह भी पता होना चाहिए कि बुआई कब करें, कौन सी किस्म चुनें, सिंचाई कितनी करें और बारिश रुकने या तेज होने पर फसल को कैसे बचाएं। मोबाइल संदेश, किसान सेवा केंद्र, कृषि विज्ञान केंद्र और जिला कृषि विभाग इस कड़ी में महत्वपूर्ण हैं।

लू और उमस से खेती के साथ स्वास्थ्य पर भी असर

मानसून से पहले लंबा खिंचता गर्म दौर केवल खेतों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि ग्रामीण जीवन और श्रमिकों की दिनचर्या पर भी असर डालता है। धान की नर्सरी तैयार करने, खेत की जुताई, मेड़बंदी और सिंचाई जैसे कामों में किसानों और मजदूरों को धूप में अधिक समय बिताना पड़ता है। हीट इंडेक्स ज्यादा होने पर शरीर पर गर्मी का असर बढ़ जाता है।

ऐसी स्थिति में कृषि कार्यों का समय बदलना पड़ सकता है। सुबह और शाम के समय खेत में काम करना, पशुओं के लिए पानी और छाया की व्यवस्था रखना, नर्सरी में नमी बनाए रखना और सिंचाई को प्राथमिकता देना व्यावहारिक जरूरत बन जाती है। प्रशासनिक स्तर पर भी स्वास्थ्य, पशुपालन, बिजली और सिंचाई विभागों की तैयारी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।

बारिश देर से आने पर बिजली की मांग भी बढ़ सकती है, क्योंकि किसान नलकूपों और पंप सेटों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीण इलाकों में सिंचाई के लिए बिजली आपूर्ति बाधित होने पर डीजल पंप का खर्च बढ़ता है। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है। यही कारण है कि मौसम की देरी केवल कृषि विभाग का मामला नहीं रह जाती, बल्कि कई विभागों की संयुक्त तैयारी मांगती है।

जिलों की भूमिका सबसे अहम क्यों है?

राज्य सरकार ने जिलाधिकारियों को स्थानीय हालात का आकलन कर पहले से तैयारी रखने को कहा है। यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य स्तर पर मानसून की औसत तस्वीर कुछ और हो सकती है, जबकि गांव और ब्लॉक स्तर पर वास्तविक स्थिति अलग दिखती है। कहीं नहर में पानी की उपलब्धता बेहतर होती है, कहीं किसान पूरी तरह बारिश या निजी सिंचाई पर निर्भर होते हैं।

जिला प्रशासन को बीज और खाद वितरण केंद्रों की निगरानी, सहकारी समितियों की उपलब्धता, बैंकिंग समन्वय, सिंचाई संसाधनों और किसान परामर्श को साथ लेकर चलना होगा। खरीफ की शुरुआती अवधि में अगर सूचना और संसाधन समय पर मिल जाएं, तो किसान मौसम की अनिश्चितता के बावजूद नुकसान कम कर सकते हैं। देरी होने पर वही समस्या बड़े संकट में बदल सकती है।

पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने मौसम की कई अनियमित स्थितियां देखी हैं। कहीं मानसून देर से आया, कहीं कम दिनों में भारी बारिश हुई, कहीं फसल पकने के समय बेमौसम बारिश ने नुकसान किया। लंबी गर्मी और अचानक बदलते मौसम ने खेती की योजना को अधिक जटिल बना दिया है। इसीलिए अब केवल पारंपरिक बुआई कैलेंडर पर निर्भर रहना कई इलाकों में पर्याप्त नहीं रह गया है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कुल बारिश से ज्यादा उसका वितरण फसल के लिए निर्णायक होता है। अगर बारिश देर से आए और फिर थोड़े समय में बहुत तेज हो जाए, तो खेत में जलभराव और पौधों को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, बारिश कमजोर रही तो अंकुरण, रोपाई और बढ़वार पर असर पड़ता है। दोनों स्थितियों में किसान को अलग-अलग रणनीति अपनानी पड़ती है।

किसानों के लिए अगले कुछ दिन क्यों निर्णायक हैं?

पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए 28 जून के आसपास का मौसम खास नजर में रहेगा। अगर मानसून सक्रिय होकर अच्छी बारिश देता है, तो धान की रोपाई और खरीफ बुआई की गति बढ़ सकती है। लेकिन अगर बारिश कमजोर या बिखरी हुई रही, तो किसान स्थानीय सलाह और खेत की नमी देखकर ही फैसला करेंगे। जल्दबाजी में की गई बुआई बाद में नुकसान का कारण बन सकती है।

किसानों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि वे स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, कृषि विभाग की सलाह और अपने खेत की स्थिति को साथ देखकर निर्णय लें। धान की नर्सरी, उपलब्ध सिंचाई, बीज की किस्म, मजदूरों की उपलब्धता और खाद की व्यवस्था सभी को समय पर मिलाना होगा। छोटे किसानों के लिए सामुदायिक या साझा संसाधनों का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है।

सरकार की तत्काल प्राथमिकता खरीफ सीजन को पटरी पर बनाए रखना है। देर से मानसून, लू और बारिश की अनिश्चितता ने चुनौती जरूर बढ़ाई है, लेकिन समय पर बीज, खाद, ऋण, सिंचाई और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध रहे तो नुकसान की आशंका कम की जा सकती है। आने वाले दिनों में मानसून की वास्तविक चाल ही तय करेगी कि उत्तर प्रदेश की खरीफ खेती कितनी सुचारू आगे बढ़ती है।

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उत्तर प्रदेश में लेट मानसून से सबसे ज्यादा दबाव किन क्षेत्रों पर पड़ रहा है?
मानसून की देरी खेती-किसानी के साथ-साथ प्रशासनिक तैयारियों पर भी दबाव बढ़ा रही है। इससे बीज, खाद, सिंचाई और किसान सेवाओं की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानसून के करीब कब पहुंचने की संभावना जताई गई है?
दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 28 जून के आसपास पहुंचने की संभावना जताई गई है। सामान्य रूप से यह इससे लगभग 12 दिन पहले दस्तक देता है।
खरीफ सीजन बचाने के लिए योगी सरकार ने किन विभागों को अलर्ट मोड पर रखा है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागों को बीज, खाद, सिंचाई, फसल ऋण और किसान सलाह सेवाओं को पहले से दुरुस्त रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कृषि उत्पादन आयुक्त शाखा से जुड़े विभागों की समीक्षा भी की गई है।
मानसून की देरी के कारण किसानों के लिए खेती के फैसलों पर क्या असर पड़ता है?
बारिश कुछ दिन भी पीछे खिसकती है तो किसान बुआई के निर्णय टालते हैं, जिससे खेत की तैयारी, मजदूरी, सिंचाई और बीज की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। धान की नर्सरी और रोपाई जैसे कामों के लिए पानी की जरूरत होने से संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।
यदि कम बारिश हो या सूखे जैसे हालात बनें, तो सरकार ने किस तरह की आकस्मिक योजना का उल्लेख किया है?
कम बारिश या सूखे के मद्देनजर कृषि विभाग ने आकस्मिक कार्ययोजना तैयार करने की बात कही है। इसमें वैकल्पिक फसलों की सलाह, कम अवधि वाली किस्में, बीज व्यवस्था, सिंचाई सहायता, कीट-रोग प्रबंधन और जिला स्तर पर विभागों के समन्वय जैसे बिंदु शामिल हैं।
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