'लोकसभा स्पीकर को बागी सांसदाें से नहीं मिला कोई लेटर', ओम बिरला से मिलने के बाद उद्धव गुट ने किया दावा
Shiv Sena UBT : महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों गुटो में चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब देश की संसद तक पहुंच गई है। उद्धव ठाकरे गुट यानी शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा में बागी सांसदों के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। इसी सिलसिले में उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों और नेताओं ने नई दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें ज्ञापन सौंपा।
इस मुलाकात के बाद पार्टी सांसद अरविंद सावंत ने बताया किशिवसेना (यूबीटी) के सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलने का समय मांगा था। जिसमें कहा था कि संविधान की रक्षा आपको करनी है इसलिए बागी गुट को लेकर कोई भी फैसला लेने से पहले हमारा पक्ष जरूर सुना जाए।

अरविंद सावंत ने बताया कि आज हमने फिर से अनुरोध किया है कि शिवसेना के मामले में जल्दबाजी में एकतरफा निर्णय न लिया जाए। लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले दोनों पक्षों की उचित सुनवाई आवश्यक है।
बागी सांसदों की ओर से नहीं भेजा गया कोई लेटर
इसके साथ ही अरविंद सावंत ने बताया कि उद्धव ठाकरे धड़े के प्रतिनिधियों ने मुलाकात के दौरान लोकसभा अध्यक्ष से पूछा कि क्या विरोधी गुट की तरफ से किसी अलग व्यवस्था को लेकर कोई पत्र मिला है? इस पर अरविंद सावंत ने बताया कि स्पीकर ओम बिरला ने साफ किया कि उनके कार्यालय को अभी तक बागी सांसदों के समूह की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक पत्र या दस्तावेज प्राप्त नहीं हुआ है जिससे भ्रम की स्थिति बने।
दलबदल विरोधी कानून क्या कहता है?
अरविंद सावंत ने बागी धड़े की कानूनी स्थिति पर हमला बोलते हुए कहा कि संविधान के प्रावधानों के तहत बागी सांसदों को किसी अलग गुट के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद के भीतर बागी गुट के लिए अलग से बैठने की कोई व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए। सावंत का मानना है कि ऐसा करना लोकतांत्रिक नियमों और परंपराओं के विपरीत होगा।
अनिल देसाई ने बताया क्यों विलय नहीं कर सकते?
मुलाकात में शामिल रहे शिवसेना (यूबीटी) के दूसरे वरिष्ठ नेता अनिल देसाई ने भी इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को सामने रखा। देसाई ने स्पष्ट किया कि 10वीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत यदि किसी विधायी दल के पास दो-तिहाई बहुमत भी मौजूद हो, तो भी वह मूल राजनीतिक दल के विलय के बिना खुद को अलग दल घोषित नहीं कर सकता। यदि वे किसी स्थापित दल में स्वयं का विलय नहीं करते हैं, तो उनकी सदस्यता पर संकट खड़ा हो जाएगा। वे स्वतंत्र समूह के रूप में मान्यता की मांग नहीं कर सकते।
लोकसभा स्पीकर ने शिवसेना यूबीटी को दिया भराेसा
अनिल देसाई ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें पूरा भरोसा दिलाया है कि इस मामले में जो भी फैसला होगा, वह पूरी तरह से स्थापित नियम-प्रक्रियाओं के तहत ही तय किया जाएगा। नियमों और संवैधानिक प्रावधानों से इतर कोई भी बात नहीं सुनी जाएगी। बागी गुट की ओर से यदि कोई भी आवेदन आता है, तो लोकसभा सचिवालय पहले उसकी गहन कानूनी पड़ताल करेगा और फिर फैसला लेगा।
यह पूरा विवाद केवल संसद में बैठने की व्यवस्था तक सीमित नहीं है। संसद के भीतर किस गुट को वास्तविक शिवसेना माना जाएगा, इसका सीधा ताल्लुक इस बात से है कि सदन में पार्टी का आधिकारिक व्हिप जारी करने का अधिकार किसके हाथों में रहेगा। व्हिप का उल्लंघन होने पर सांसदों की सदस्यता रद्द हो सकती है, यही वजह है कि दोनों गुट इस मोर्चे पर मुस्तैद हैं।













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