रूस को मिला भारत का साथ तो तिलमिलाया अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया, भारत ने भी दिया करारा जवाब

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने रूस के ‘रुपया-रूबल’ प्रस्ताव पर विचार करने के लिए भारत की आलोचना की है, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को कमजोर करेगा।

नई दिल्ली/मॉस्को/वॉशिंगटन, अप्रैल 01: रूस को प्रतिबंधों की बेड़ियों में जकड़ देने वाला अमेरिका, मॉस्को पर नई दिल्ली के रूख से तिलमिला गया है और भारत की सख्त आलोचना कर रहा है। अमेरिका के साथ साथ ऑस्ट्रेलिया भी रूस की मदद करने के लिए भारत की तिखी आलोचना कर रहा है और इन सबके बीच रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत के दौरे पर हैं और माना जा रहा है, कि भारत और रूस के बीच कई अहम समझौते हो सकते हैं, जिससे रूस को प्रतिबंधों से थोड़ी राहत मिल सकती है।

भारत की आलोचना

भारत की आलोचना

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने रूस के 'रुपया-रूबल' प्रस्ताव पर विचार करने के लिए भारत की आलोचना की है, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को कमजोर करेगा। वहीं, एक्सपर्ट्स का मानना है कि, रूस की मदद के लिए भारत जिन तरह के कदम उठा रहा है, उससे भारत और अमेरिका, जो उभरते हुए सुरक्षा भागीदार बन रहे हैं, उन दोनों देशों के बीच एक गहरी दरार पैदा करेगा, क्योंकि, यूक्रेन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है, जबकि रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत के दौरे पर हैं और नई दिल्ली उनकी मेजबानी कर रहा है। भारत की आलोचना करते हुए अमेरिका की वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो ने बुधवार को वॉशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि, 'यह समय इतिहास में सही के तरफ खड़े होने का है और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ दर्जनों देश सही की तरफ खड़े हैं और यूक्रेन के लोकतंत्र और संप्रभुता के लिए खड़े हैं और यह वक्त रूस को वित्त पोषण और उसकी अर्थव्यवस्था को ईंधन देने का नहीं है'। आगे उन्होंने भारत के कदम को 'गहरा निराशाजनक' करार दे दिया, हालांकि उन्होंने कहा कि, अभी उन्होंने डिटेल्ड नहीं देखा है।

ऑस्ट्रेलिया भी भारत पर भड़का

ऑस्ट्रेलिया भी भारत पर भड़का

अमेरिका के साथ साथ ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत की आलोचना करनी शुरू कर दी है और ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्री डैन तेहान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि, लोकतांत्रिक देशों के लिए "दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हमारे पास जो नियम-आधारित दृष्टिकोण है, उसे बनाए रखने के लिए" एक साथ काम करना महत्वपूर्ण है। अमेरिका के बाद ऑस्ट्रेलिया का भी भारत की आलोचना करना साफ तौर पर दर्शाता है, कि इंडो पैसिफिक की 'रक्षा' के लिए बने क्वाड के साथियों के बीच दरार बढ़ता जा रहा है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता का मुकाबला करने की मांग करने वाले लोकतंत्रों का एक समूह है जिसमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान भी शामिल हैं। आपको बता दें कि, भारत रूसी हथियारों का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है, और ईंधन की कीमतों में वृद्धि के वक्त रूस ने ऊंधन की पुरानी कीमत में भी करीब 30 प्रतिशत का भारी डिस्काउंट देने का ऑफर भारत को दिया है, जिसके लिए भारत तैयार हो चुका है।

रूस पर भारत का रूख

रूस पर भारत का रूख

यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने भले ही यूनाइटेड नेशंस में वोटिंग से परहेज किया है, लेकिन भारत ने लगातार संघर्ष विराम और कूटनीतिक समाधान के आह्वान का समर्थन किया है। भारत ने यूएन में वोट डालने से भले ही परहेज किया है, लेकिन उन प्रस्तावों को पहले ही रूस अपने वीटो से खारिज कर चुका था। वहीं, ब्लूमबर्ग ने बुधवार को बताया कि, अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा सात रूसी बैंकों को बेल्जियम स्थित सीमा-पार भुगतान प्रणाली स्विफ्ट ऑपरेटर का उपयोग करने से रोकने के बाद, भारत स्विफ्ट के विकल्प का उपयोग करके रुपया-रूबल-मूल्यवान भुगतान करने की योजना का वजन कर रहा है और भारत का ये कदम रूस के लिए बहुत बड़ी राहत है। वहीं, रूसी योजना में रूस के मैसेजिंग सिस्टम एसपीएफएस का उपयोग करते हुए रुपये-रूबल-मूल्यवर्ग के भुगतान शामिल हैं और रिपोर्ट है कि, रूसी केन्द्रीय बैंक के कई उच्च अधिकारी अगले हफ्ते भारत दौरे पर आ रहे हैं और भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों से मिलकर 'रुपया-रूबल' कारोबार को अंतिम रूप देंगे।

‘अमेरिका की जबरदस्ती नहीं चलेगी’

वहीं, भारत और रूस के बीच दोस्ताना संबंध को लेकर अमेरिका बुरी तरह से भड़का हुआ है और अब भारत और अमेरिकी नेताओं के बीच तनातनी शुरू हो गई है। अमेरिका के इंटरनेशनल इकोनॉमी के डिफ्टी एनएसए दलीप सिंह ने दो दिन पहले भारत का दौरा किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि, 'अमेरिका नहीं चाहेगा, कि भारत ऊर्जा समेत दूसरी चीजों का आयात रूस से बढ़ाए'। अमेरिका के डिप्टी एनएसए यहीं नहीं रूके, उन्होंने आगे कहा कि, 'भारत इस बात की कतई उम्मीद नहीं करे, कि अगर एलएसी पर चीन कभी उल्लंघन करता है, तो रूस उसे बचाने आएगा'। अमेरिका के डिप्टी एनएसए के इस बयान का भारत की तरफ से करारा जवाब दिया गया है। यूनाइटेड नेशंस में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरूद्दीन ने अमेरिकी डिप्टी एनएसए को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए सख्त आलोचना की है। उन्होंने कहा कि, 'तो ये हमारा दोस्त है... ये भाषा कूटनीति की नहीं है, ये भाषा जबरदस्ती की भाषा है।' उन्होंने आगे कहा कि, 'कोई इस युवक को बताए, कि एकतरफा दंडात्मक प्रतिबंध भी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन ही होता है।'

कूटनीति का केन्द्र बना भारत

कूटनीति का केन्द्र बना भारत

यूक्रेन युद्ध के बीच भारत दुनिया का नया कूटनीतिक केन्द्र बनता जा रहा है और पिछले हफ्ते चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत का दौरा कर लौटे हैं, तो मार्च महीने में जापान के प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। वहीं, मार्च महीने में ही पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच भी वर्चुअल शिखर सम्मेलन हुआ है। जबकि, अप्रैल के पहले हफ्ते में इजरायल के प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट का भी भारत दौरा प्रस्तावित था, लेकिन कोविड पॉजिटिव होने के बाद उनका दौरा फिलहाल स्थगित करना पड़ा है। वहीं, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लागरोव फिलहाल भारत के दौरे पर हैं और भारत से समर्थन बढ़ाने का अनुरोध कर रहे हैं। वहीं, इसी महीने भारत और अमेरिका की टू प्लस टू वार्ता भी होने वाली है, जिसमें भारत की तरफ से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल होंगे, तो अमेरिका की तरफ से रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी शामिल होंगे। इसके साथ ही, अमेरिका और उसके सहयोगी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को प्रभावित करने के प्रयास में आगे बढ़ रहे हैं।

यूक्रेन पर भारत-अमेरिका की बात

यूक्रेन पर भारत-अमेरिका की बात

बुधवार को, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भारत के विदेश मंत्री और अपने समकक्ष सुब्रह्मण्यम जयशंकर के साथ अन्य मुद्दों के बीच "यूक्रेन में बिगड़ती मानवीय स्थिति" पर चर्चा करने के लिए टेलीफोन किया था और माना जा रहा है, कि रूसी विदेश मंत्री के भारत दौरे के बीच अमेरिका की तरफ से दवाब बनाने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही भारत इस वक्त ब्रिटेन की विदेश मंत्री लिज़ ट्रस की भी मेजबानी कर रहा है। ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह "बढ़ती वैश्विक असुरक्षा के इस समय रूस पर रणनीतिक निर्भरता को कम करने वाले सभी देशों के महत्व को इंगित करेंगी।"

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