100 साल का हुआ तुर्की: मुस्तफा कमाल पाशा से अर्दोआन तक.. कितना बदल गया है अतातुर्क का देश?

100 years of turkey: इस हफ्ते आधुनिक तुर्की के 100 साल पूरे हो गए हैं, जिसकी स्थापना मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने की थी, जिन्होंने विदेशी सेनाओं को हटाकर ऑटोमन साम्राज्य के खंडहरों से तुर्की गणराज्य की स्थापना की थी।

मुस्तफा कमाल पाशा को अतातुर्क उपनाम तुर्की की संसद में दिया गया गया था, जिसका मतलब होता है, 'सभी तुर्कों का पिता', जिन्होंने तुर्की के समाज को बदलकर रख दिया था और आधुनिक तुर्की की नींव रखी थी। मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की के गणतंत्र में कई क्रांतिकारी सुधार लाए, जिनमें महिलाओं को वोट देने का अधिकार देना, यूरोपीय कानूनों को अपनाना और खलीफा शासन को खत्म करना शामिल था।

100 years of turkey

लेकिन, मुस्तफा कमाल पाशा ने आज से 100 साल पहले जो कमाल किया था, उसे आज के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन मिट्टी में मिला रहे हैं और तुर्की को फिर से 100 साल पीछे जा रहे हैं। अर्दोआन एक बार फिर से तुर्की को रूढ़िवादी परिधान पहना रहे हैं, जो पिछले दो दशकों से ज्यादा वक्त से सत्ता में हैं।

हालांकि, अर्दोआन अभी भी मुस्तफा कमाल पाशा को सम्मान देते हैं, लेकिन तुर्की में एक नया समाज भी तैयार कर रहे हैं, जो कट्टरपंथ के सिद्धांत को आत्मसात करता है। ये बहुत कुछ उसी तरह का है, जैसे भारत में कई नेता महात्मा गांधी को भले ही सम्मान देते हैं, लेकिन अपने वोटबैंक के अनुकूल समाज का भी निर्माण कर रहे हैं।

69 साल के राष्ट्रपति अर्दोआन, मुस्तफा कमाल पाशा के बाद तुर्की के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं, जो अपने भाषणों में "तुर्की की सदी" के बारे में बोलते रहे हैं, जो देश में अपने सिद्धांतों और इस्लाम की रूढ़िवादी परंपराओं को पैबस्त कर रहे हैं।

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सौ साल में फिर से बंटा तुर्की का समाज

धर्मनिरपेक्ष बनाम रूढ़िवादी बहस, तुर्की में सबसे विवादास्पद सांस्कृतिक विभाजनों में से एक बनी हुई है।

देश के संस्थापक अतातुर्क ने आधुनिकता की शर्त के साथ एक धर्मनिरपेक्ष देश की कल्पना की थी। और धीरे धीरे तुर्की एक ऐसा इस्लाम बहुल देश बन गया, जिसने अपने शासन से धर्म को अलग करके रखा। लिहाजा, तुर्की की सरकार कभी भी धार्मिक दबावों में नहीं आई और एक स्वस्थ विचारधारा का जन्म भी हुआ, लेकिन पिछले 20 सालों में अर्दोआन ने एक बार फिर सत्ता में मजहब को पैबस्त किया। लेकिन, अभी भी तुर्की का एक विशाल वर्ग है, जो अर्दोआन की विचारधारा का विरोध करता है।

तुर्की में दशकों तक स्कूलों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगा रहा, स्कूली किताबों से धार्मिक शिक्षा को पूरी तरह से हटाकर रखा, शराब पर उदार नीतियां अपनाईं और यहां तक, कि मुख्य ओटोमन शाही मस्जिद, हागिया सोफिया को एक संग्रहालय में बदल दिया।

लेकिन, अर्दोआन ने इन सभी नीतियों को पलट दिया। हागिया सोफिया, जो पहले एक चर्च था, फिर जिसे म्यूजियम बनाया गया, उसे अर्दोआन ने एक मस्जिद बना दिया।

तुर्की में सरकारी दफ्तर अब इस्लामिक प्रार्थनाओं के साथ खुलते हैं, धार्मिक मामलों के निदेशालय को एक बजट दिया गया है, जो अधिकांश मंत्रालयों को बौना कर देता है, धार्मिक स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है और यहां तक कि अर्दोआन ने अपनी ब्याज दरों को कम करने की अपरंपरागत आर्थिक नीति को भी मजहबी आधार पर उचित ठहराने की कोशिश की, जिसने तुर्की को आर्थिक संकट में फंसा दिया है।

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट में तुर्की के विशेषज्ञ और कई पुस्तकों के लेखक सोनर कैगाप्टे ने कहा, "अतातुर्क एक... शीर्ष स्तर राजनेता थे, जो सामाजिक इंजीनियरिंग में विश्वास करते थे और वह तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष, पश्चिम-मुखी, यूरोपीय समाज के रूप में फिर से स्थापित करना चाहते थे।"

लेकिन, "अर्दोआन की नीति और पद्धति अतातुर्क के ठीक विपरीत है।"

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तुर्की की विदेश नीति

तुर्की साल 1952 में नाटो में शामिल हुआ था और वो आधिकारिक तौर पर यूरोपीय संघ (ईयू) में शामिल होने का उम्मीदवार भी है। लेकिन, अब इसे सदस्यता मिलना काफी मुश्किल है।

20वीं सदी में ज्यादातर वक्त तुर्की के हित, पश्चिमी देशों के हितों के साथ जुड़े रहे, लेकिन हाल के वर्षों में, तुर्की ने पश्चिम की नीतियों का खुलकर विरोध किया है, जिसका मकसद खुद को इस्लामिक देशों का नया खलीफा बनाना है। जिसका असर ये रहा, कि अर्दोआन ने तुर्की को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई अरब देशों के खिलाफ कर दिया।

अर्दोआन ने पाकिस्तान और मलेशिया जैसी कट्टरपंथी ताकतों के साथ मिलकर नया इस्लामिक गुट बनाने की कोशिश की, जो बुरी तरह से नाकाम रही।

तुर्की और पश्चिम के बीच तनाव का एक हालिया बिंदु सीरिया में रहा है, जहां तुर्की अक्सर स्थानीय कुर्द बलों के खिलाफ हमले कर रहा है, जिन्हें यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहयोगी मानते हैं और तुर्की जिन्हें प्रतिबंधित कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी यानि पीकेके की शाखाएं मानता है। तुर्की अब सीरिया में बड़े पैमाने पर क्षेत्र को नियंत्रित करता है और कुर्द लड़ाकों के खिलाफ सीरिया और इराक के साथ अपनी सीमाओं पर एक बफर जोन बनाने की बात करता है।

यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद, स्वीडन और फिनलैंड दोनों ने अपनी लंबे समय से चली आ रही तटस्थता को त्यागने और नाटो में शामिल होने का फैसला किया। फिर भी तुर्की स्वीडिश सदस्यता के खिलाफ मुख्य अवरोधक बन गया, उसने स्वीडन पर पीकेके और तुर्की द्वारा गैरकानूनी घोषित अन्य समूहों के प्रति बहुत नरम होने का आरोप लगाया।

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तुर्की का विकास

अतातुर्क के सुधारों और आधुनिकीकरण के अभियान ने तुर्की को उस गहरी गरीबी से बाहर निकालने में मदद की जो ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद झेलनी पड़ी थी। आज देश 20 सर्वाधिक विकसित देशों के समूह (G20) का सदस्य है।

अर्दोआन के शासनकाल में तुर्की में इन्फ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास किया गया। देश भर में राजमार्ग, पुल, सुरंगें, पाइपलाइन, हवाई अड्डे, अस्पताल और अनगिनत आवासों का निर्माण किया गया। और तुर्की में इस विकास का श्रेय अर्दोआन के शासन को दिया जाता है, लिहाजा विकास के नाम पर अर्दोआन वोट बटोरने में काफी कामयाब होते हैं।

तुर्की अभी भी तेजी से देश में निर्माण कार्य में तेजी को प्रोत्साहित कर रहा है। हालांकि, आलोचकों का कहना है, कि सरकार ने इसके विनियमन के प्रति लापरवाह रवैया अपनाया है। फरवरी में आए विनाशकारी भूकंप के बाद, व्यापक विनाश के लिए बिल्डिंग कोड के ढीले कार्यान्वयन को दोषी ठहराया गया था।

अर्दोआन की कुछ महत्वाकांक्षी परियोजनाएं भी तुर्की में राजनीतिक विवाद का विषय रही हैं, जिसमें अंकारा में राष्ट्रपति के लिए बनाए गए विशाल महल से लेकर देश भर में बने छोटे लक्जरी महलों तक के निर्माण शामिल हैं। उनका अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी प्रस्ताव, इस्तांबुल के माध्यम से एक भव्य नहर के निर्माण के प्रस्ताव ने पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान की आशंका पैदा कर दी है।

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तुर्की के रास्ते में चुनौतियां

तुर्की के पिछले सौ वर्षों में सैन्य तख्तापलट, आर्थिक संकट और अक्सर अस्थिर सरकारों का दौर देखा गया है। आज, यह कई अनसुलझे मुद्दों का सामना कर रहा है, जिनमें कुर्द विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई भी शामिल है, जो चार दशकों से चल रही है और तुर्की, सीरिया और इराक में दैनिक सैन्य अभियानों के बावजूद समाधान के करीब नहीं दिख रही है।

तुर्की की मुखर विदेश नीति का मतलब है, कि पड़ोसियों के साथ उसके संबंध दोस्त और दुश्मन के बीच हिंसक रूप से झूल रहे हैं।

हाल ही में संसदीय प्रणाली से राष्ट्रपति प्रणाली में बदलाव ने तुर्की के राजनीतिक संतुलन को काफी कमजोर कर दिया है। अर्दोआन ने सारी ताकतें अपने हाथों में समेट ली हैं, जिससे तुर्की का लोकतंत्र काफी कमजोर हुआ है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार के मामले में तुर्की को 180 देशों में से 101वां स्थान दिया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में 180 देशों में से तुर्की को 165वां स्थान दिया है, जो पिछले वर्ष 149वां था। पिछले साल, इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने अपने लोकतंत्र सूचकांक में तुर्की को 167 में से 103 स्थान दिया था और इसे एक सत्तावादी शासन और एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र के बीच एक मिश्रित शासन के रूप में वर्गीकृत किया था।

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