सूरज पर मची हलचल से बढ़ी टेंशन, उपग्रहों के विलुप्त होने की आशंका, जानिए किस हद तक बुरे हो सकते हैं परिणाम
नई दिल्ली, 5 अगस्त: हाल के महीनों में सूर्य की सतह पर अचानक गतिविधियां बढ़ गई हैं। आए दिन सौर विस्फोट की खबरें आने लगी हैं। इसके चलते इस साल कई उपग्रह जलकर भस्म भी हो चुके हैं। सबसे ज्यादा नुकसान एलन मस्क की कंपनी के उपग्रहों का हुआ है, जो थोक के भाव सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज रही है। लेकिन, वैज्ञानिकों की चिंता ये है कि अभी तक सूरज पर जो कुछ भी हुआ है, वह बहुत ही कम क्षमता का था। लेकिन, भविष्य में यह बहुत बड़े सौर तूफान उठने की चेतावनी भी हो सकती है। वैज्ञानिकों ने हर संभावना बताने की कोशिश की है कि यह हमारे लिए कितने मुश्किल हालात पैदा कर सकता है।

कोई बड़ा सौर तूफान उठा तो क्या होगा ?
करीब दो दशक पहले धरती से एक भयानक सौर तूफान के टकराने के बाद उपग्रहों के कंट्रोलरों का सैकड़ों स्पेसक्राफ्ट से कई दिनों तक संपर्क टूट गया था। घटना अक्टूबर, 2003 की है। बीते 20 वर्षों में काफी कुछ बदल चुका है। पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाने वाले उपग्रहों की संख्या कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है। अंतरिक्ष में मलबों की ढेर भी बढ़ चुकी है। ऐसे में वैज्ञानिकों की चिंता स्वाभाविक है कि जिस तरह से हाल के समय में सूरज पर खलबली मची हुई है। आए दिन कोई ना कोई सौर विस्फोटों की खबरें आने लगी हैं। ऐसे में यदि कोई विशाल सौर तूफान उठा तो अब उपग्रहों के भरोसे चल रही दुनिया और उसके लोगों को क्या भुगतना होगा?

सूर्य अपने सौर चक्र के चरम पर पहुंचने वाला है
हाल के महीनों में जिस तरह से सौर तूफान की घटनाएं बढ़ी हैं, उसकी वजह ये बताई जा रही है कि सूर्य अपने सौर चक्र के चरम पर पहुंचने वाला है। दरअसल, सूर्य की सतह के किसी हिस्से में जब विस्फोट होता है तो उसकी वजह से कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) की स्थति बनती है और इसी के चलते सौर तूफान पैदा होते हैं। सौर तूफान दरअसल खतरनाक सौर भड़काव हैं, जो अगर पृथ्वी की ओर बढ़ जाएं तो काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

भू-चुंबकीय तूफान पैदा होने की बढ़ रही है आशंका
सौर तूफान के साथ आए सौर भड़काव जब पृथ्वी के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र से टकराते हैं तो उसकी वजह भू-चुंबकीय तूफान पैदा होता है, जो हमारे लिए तबाही हैं। इसके चलते पावर ग्रिड के बैठने का खतरा रहता है तो साथ ही साथ जीपीएस नेटवर्क का भट्टा बैठाने में भी सक्षम होता है। लेकिन, वैज्ञानिक भविष्य के किसी बड़े सौर तूफान को लेकर टेंशन में हैं। क्योंकि, पृथ्वी की निचली कक्षा यानी 1,000 किलोमीटर से कम की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में अनेकों देशों को सैकड़ों उपग्रहों का बसेरा है। वहां पर वे लगातार धरती की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं।

सौर तूफान के चलते उपग्रहों के विलुप्त होने का खतरा
इसी साल फरवरी-मार्च में दुनिया के सबसे अमीर हस्ती एलन मस्क की स्टारलिंक कंपनी के कम से कम 40 सैटेलाइट मध्यम दर्जे के सौर तूफान की वजह से धूल चाट चुके हैं। स्पेस डॉट कॉम ने आशंका जताई है कि आने वाले समय में अगर सूर्य पर कोई बड़ा विस्फोट होता है और शक्तिशाली सौर तूफान धरती की दिशा में बढ़ता है तो रास्ते में ना सिर्फ तमाम उपग्रहों के विलुप्त होने की आशंका है, बल्कि अंतरिक्ष में मौजूद मलबों की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन को भी खतरा पहुंच सकता है।

करीब 20,000 ऑब्जेक्ट मौजूद
अंतरिक्ष में पृथ्वी के निकट मौजूद चीजों को अमेरिकी स्पेस सर्विलांस नेटवर्क (एसएसएन) ट्रैक करता रहता है। उसके हिसाब से इस समय पृथ्वी की निचली कक्षा में 10 सेंटी मीटर से बड़े करीब 20,000 वस्तु मौजूद हैं। एसएसएन उसकी मौजूदा स्थिति और उनके प्रक्षेपपथ का रिकॉर्ड रखता है। इन वस्तुओं में सभी तो नहीं, लेकिन अधिकतर वस्तु निचली कक्षा में परिक्रमा कर रहे कृत्रिम उपग्रह हैं। इनके अलावा जो चीजें हैं, उनमें बेकार पड़े उपग्रह, खाली पड़े हुए रॉकेट और अंतरिक्ष के मलबे शामिल हैं।

उपग्रह की सुरक्षा क्यों हो सकता है असंभव ?
अभी तक क्या होता है कि जब कोई उपग्रह अंतरिक्ष में पड़े मलबे से टकराने लगता है तो उस सैटेलाइट को कंट्रोल कर रहा केंद्र उसके पथ को थोड़ा एडजस्ट कर देता है, जिससे टकराने की आशंका खत्म हो जाती है। लेकिन, सौर तूफान की स्थिति में यह काम बहुत ही मुश्किल हो जाता है; और यहां तो आशंका किसी बहुत ही भयानक सौर तूफान की हो रही है। क्योंकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि उन चीजों की कक्षा में स्थिति हमेशा पूरी तरह सटीक नहीं होती है और खासकर सौर तूफान की वजह से और ज्यादा अनिश्चितता के हालात पैदा होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार टकराव का सटीक अनुमान लगा पाना असंभव हो जाता है।

आधुनिक दुनिया के लिए हो सकता है विनाशकारी
सौर भौतिक विज्ञानी और कोलोराडो यूनिवर्सिटी में स्पेस वेदर टेक्नोलॉजी सेंटर के डायरेक्टर टॉम बर्गर ने स्पेस डॉट कॉम से कहा, 'सबसे विशाल तूफानों में, कक्षीय प्रक्षेपपथ में त्रुटियां इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि, निश्चित रूप से, कक्षीय वस्तुओं की लिस्ट के कोई मायने नहीं रह जाते।' उनके मुताबिक, 'ऑब्जेक्ट रडार के द्वारा बताई गई अंतिम स्थिति से दसियों किलोमीटर दूर हो सकती हैं। वे अनिवार्य रूप से खो जाएंगे, और एकमात्र समाधान उन्हें फिर से रडार के जरिए ढूंढना है। ' अगर एकसाथ इतनी ज्यादा संख्या में उपग्रह रडार से विलुप्त हो जाएंगे तो लगभग उन्हीं के भरोस चल रही आधुनिक व्यवस्थाएं भी पूरी तरह से ठप हो जाने की आशंका से इनकार नहीं किया सकता।












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