रूस का यूएन में बदला रुख़, लेकिन 'आगे क्या' के लिए निगाहें अब 'विक्ट्री डे' परेड पर
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाक़ी 14 सदस्यों के साथ रूस ने शुक्रवार को पहली बार सुर में सुर मिलाते हुए 'यूक्रेन की शांति और सुरक्षा बनाए रखने पर गहरी चिंता' ज़ाहिर की है.
साथ ही उसने इस संकट का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रयासों का समर्थन भी किया है.
ऐसा करते हुए रूस ने पहली बार अपना वीटो वापस लेते हुए इस घोषणा के समर्थन में अपना वोट डाला.
इस वजह से सुरक्षा परिषद का ताज़ा बयान आम सहमति से तैयार हुआ है. वैसे इसे नॉर्वे और मेक्सिको ने मिलकर तैयार किया था.
इसमें कहा गया, "सुरक्षा परिषद यूक्रेन की शांति और सुरक्षा बनाए रखने को लेकर गहरी चिंता जताती है. सुरक्षा परिषद याद दिलाना चाहती है कि इसके सभी सदस्यों ने यूएन चार्टर के तहत अपने अंतरराष्ट्रीय झगड़े शांतिपूर्ण तरीक़े से हल करने का ज़िम्मेदारी ली है. सुरक्षा परिषद शांतिपूर्ण हल खोजने की दिशा में यूएन महासचिव के प्रयासों का मजबूती से समर्थन करती है."
इस बीच दूसरे विश्वयुद्ध में नाज़ी जर्मनी पर रूस के विजय का जश्न मनाने के लिए हर साल 9 मई को होने वाले 'विक्ट्री डे' परेड पर सबकी निगाहें लग गई हैं.
लोग जानना चाहते हैं कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस मौक़े पर अपने अगले क़दम को लेकर क्या संकेत देते हैं.
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संयुक्त राष्ट्र का प्रयास
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ताज़ा बयान में यूएन प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस से उचित वक़्त पर इस बारे में परिषद को फिर से अवगत कराने का अनुरोध भी किया है.
मालूम हो कि यूएन महासचिव गुटेरेस ने पिछले हफ़्ते मॉस्को जाकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और कीएव में यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से मुलाक़ात की थी.
उनके वहां जाने के चलते संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस के संयुक्त अभियान का रास्ता साफ़ हुआ.
उसके बाद यूक्रेन के मारियुपोल और अज़ोवस्ताल स्टील प्लांट में फंसे क़रीब 500 लोगों को पिछले हफ़्ते निकाला जा सका.
सुरक्षा परिषद के बयान पर ताज़ा सहमति दोनों पक्षों के बीच बढ़े तनाव के बावजूद बनी है.
रूस जहां इसे 'विशेष सैन्य अभियान' कहता है, वहीं यूएन महासचिव गुटेरेस रूस की इस लड़ाई को 'बकवास' क़रार दिया है.
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रूस के ख़िलाफ़ प्रस्ताव
इससे पहले, यूक्रेन पर हमले के एक दिन बाद 25 फ़रवरी को रूस ने इस बारे में सुरक्षा परिषद में लाए गए एक प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया था.
उस प्रस्ताव में रूसी हमले की निंदा की जानी थी. उस प्रस्ताव पर मतदान से चीन, संयुक्त अरब अमीरात और भारत दूर रहे थे.
मालूम हो कि सुरक्षा परिषद से किसी प्रस्ताव को पास होने के लिए समर्थन में नौ वोट मिलने के साथ पांच स्थायी सदस्यों में से किसी का भी वीटो नहीं होना चाहिए.
वहीं 193 देशों की सदस्यता वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा ने रूस की निंदा करने वाले अब तक दो प्रस्ताव पारित किए हैं.
वहां किसी भी देश के पास वीटो की शक्ति नहीं है. हालांकि ऐसे प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते, पर इनका राजनीतिक महत्व ज़रूर होता है.
महासभा की ओर से पारित प्रस्ताव में यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस की कार्रवाई की निंदा करते हुए वहां 'गंभीर' मानवीय संकट पैदा करने के लिए उसकी आलोचना की गई.
उन प्रस्तावों मांग की गई कि रूसी सैनिक यूक्रेन में लड़ना बंद करके वहां से लौट आएं. साथ ही यूक्रेन के नागरिकों को सहायता देने के साथ उनकी सुरक्षा तय की जाए.
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रूस के 'विक्ट्री डे' परेड पर टिकी सबकी निगाहें
इस बीच दूसरे विश्वयुद्ध में नाज़ी जर्मनी पर रूस के विजय का जश्न मनाने के लिए हर साल 9 मई को होने वाले 'विक्ट्री डे' परेड पर सबकी निगाहें लग गई हैं.
लोग जानना चाहते हैं कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस मौक़े पर अपने अगले क़दम को लेकर क्या संकेत देते हैं.
ये परेड हर साल रूस की राजधानी मॉस्को के 'रेड स्क्वायर' पर होती है. लेकिन इस बार इस परेड का महत्व बढ़ गया है, क्योंकि रूसी सेना क़रीब दो महीने से यूक्रेन में लड़ रही है.
इस मौक़े को शानदार बनाने के लिए मॉस्को में पिछले कई दिनों से लड़ाकू विमान और टैंक अभ्यास में जुटे हुए हैं.
हमेशा की तरह इस बार भी वहां की सभी इमारतों और दुकानों पर झंडे फहराए जाने की तैयारी है. इमारतों की खिड़कियों को सुनहरे तारों से सजाया गया है. इसके लिए रूस में 9 मई को छुट्टी होती है.
हालांकि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को उम्मीद रही होगी कि 'विक्ट्री डे' के मौक़े पर वे यूक्रेन पर रूस की जीत का एलान करेंगे.
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यूक्रेन को अल्टीमेटम
लेकिन इस मामले में रूस की योजना अब तक कामयाब होती नहीं दिख रही. रूस तो डोनबास क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करने की अपनी हाल की घोषणा को भी पूरा करता नहीं दिख रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक और कभी पुतिन के लिए भाषण लिखने वाले अब्बास गैल्यामोव का कहना है, "पुतिन के समर्थक और उनके दुश्मन हर कोई इस मौक़े पर कुछ होने की उम्मीद कर रहे हैं. इन उम्मीदों ने एक वैक्यूम पैदा किया है, जिसे भरने की ज़रूरत है. यदि ऐसा नहीं हो पाता, तो पुतिन राजनीतिक रूप से हार जाएंगे."
ऐसे माहौल में पुतिन के अगला क़दम क्या होगा, इस सवाल ने अनुमानों और अफ़वाहों को तेज़ कर दिया है.
इस बीच क्रेमलिन ने उन रिपोर्टों को 'बकवास' बताते हुए ख़ारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि इस मौक़े पर रूस 'आधिकारिक' तौर पर यूक्रेन या पश्चिमी ताक़तों के ख़िलाफ़ युद्ध का एलान कर सकता है. बताया गया था कि रूस अपनी घटती सेना में भर्ती प्रक्रिया तेज़ करने की भी कोशिश कर सकता है.
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रूस कम से कम यूक्रेन में जीते गए इलाक़ों को अपनी जीत के रूप में पेश कर सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह युद्ध जल्द ही ख़त्म होने जा रहा है.
गैल्यामोव एक भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं कि हो सकता है कि इस मौक़े पर पुतिन यूक्रेन को अल्टीमेटम देकर कहें कि या तो बातचीत करें या परमाणु हमले का सामना करने के लिए तैयार रहे.
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'पुतिन को एक रास्ता चाहिए, जिससे वे निकल सकें'
"पुतिन पश्चिमी देशों को डराना चाहते हैं. वह उनके नेताओं को डराना चाहते हैं. वे इतना डर जाएं कि जेलेंस्की को कहना शुरू कर दें कि बहुत हो चुका आप अब रुक जाएं. पुतिन से बातचीत के लिए टेबल पर जाएं या कम से कम रूसी राष्ट्रपति की कुछ मांगों को मान लें. क्योंकि हम आपकी मदद के लिए तैयार हैं लेकिन आपकी वजह से मरने के लिए नहीं."
उनका मानना है कि पुतिन यूक्रेन पर हमला कर पछता रहे होंगे उन्हें अब एक रास्ता चाहिए, जिससे वह बिना कमजोर दिखे उससे निकल सकें.
लेकिन लोगों का इस बारे में क्या सोचना है. ओपिनियन पोल बताते हैं कि रूस में ज्यादातर लोग पुतिन के इस अभियान का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन अगर स्वतंत्र जनमत सर्वेक्षण एजेंसियां भी इस नतीजे पर पहुंची हैं कि पुतिन का विशेष सैन्य अभियान आत्मसम्मान और आत्मरक्षा का एक सम्मानजनक रास्ता है तो इस पर भी विश्वास करना समझदारी नहीं होगी.
निश्चित तौर पर रूस में कुछ लोगों की ओर से हमले के नैरेटिव का विरोध हो रहा है लेकिन कितना, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.
हमलों के शुरुआती हफ्तों में इस जंग का सड़कों पर जो विरोध हो रहा था वह भी अब इक्का-दुक्का प्रदर्शन तक सिमट गया है.
स्वतंत्र निगरानी समूह ओवीडी के मुताबिक अब तक 15 हजार प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए हैं. लेकिन इनमें से अधिकतर गिरफ्तारियां शुरुआती हमलों के खिलाफ प्रदर्शन के दिनों में हुई थीं.
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जन भावनाएं क्या हैं?
यूक्रेन पर हमले को लेकर जन भावनाएं क्या हैं, इसका कुछ-कुछ अंदाजा मॉस्को शहर में घूमने के दौरान लगा.
शहर के एक पैदल पथ से आगे खुले में कुछ ऐसी दुकानें दिखीं जिन पर अंग्रेजी में जेड (Z) लिखा था. कुछ दुकानों पर ऐसी टी-शर्ट बिक रही थीं, जिन पर यह अक्षर लिखा था.
हालांकि ज्यादातर लोग इससे खास प्रभावित नहीं दिख रहे थे.
लेकिन कुछ लोग उन ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों के इर्दगिर्द खड़े हो गए थे जिनमें मुसीबत में फंसे बच्चों के चेहरे दिख रहे थे. मैंने गौर किया कि एक महिला इस फोटो प्रदर्शनी को देखते हुए अपने आंसू पोछ रही थी.
इन तस्वीरों में ये दावा किया गया था कि ये डोनबास के बच्चे हैं. पुतिन की ओर से यह युद्ध छेड़ने का एक बहाना रहा है. दावा किया गया है कि वो पूर्वी यूरोप के रूसी भाषी लोगों को आजादी दिलाने के लिए युद्ध लड़ रहे हैं. उनका आरोप है कि यूक्रेन की सत्ता इन लोगों को कुचलने में लगी है.
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सरकारी टीवी पर पुतिन के समर्थन में बढ़ती आक्रामकता
पुतिन एक समांतर वास्तविकता को गढ़ने के लिए काफी आगे तक गए हैं. वे रूस को अपनी सुरक्षा करने वाला और एक पीड़ित देश के तौर पर पेश कर रहे हैं.
इसके साथ ही वो यूक्रेन और यूरोपीय देश को हमलावर बता रहे हैं.
रूस में सरकारी टीवी लंबे वक्त से पश्चिमी देशों को रूस से बदला लेने वालों के तौर पेश करता रहा है लेकिन जैसे-जैसे विक्ट्री डे सामने आ रहा है, यह नैरेटिव और आक्रामकता की ओर बढ़ती जा रही है.
टीवी प्रजेंटर रूस के इस नैरेटिव का जोर-शोर से समर्थन करते दिख रहे हैं कि पश्चिमी देश 'तीसरा विश्व युद्ध' कराने जा रहा है. वे इस युद्ध को जितना लंबा खींच सकें, खींचना चाहते हैं .
टीवी पर ये आक्रामकता काफी ताकतवर हथियार है. पिछले सप्ताह एक लोकप्रिय टॉक शो में प्रजेंटर ने ब्रिटेन को चेतावनी दी कि अगर रूस को भड़काया गया तो वह उसे परमाणु हथियारों के जरिये ध्वस्त कर देगा.
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पुतिन ने भी खुद कहा था कि उनका युद्ध यूक्रेन को नाजी मुक्त करने के लिए जरूरी है. उन्होंने यूक्रेन की सरकार को नियो नाजी कहा था. रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति यहूदी हैं लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि हिटलर के पूर्वज भी यहूदी रहे थे. इस बयान से पश्चिमी देशों में काफी गुस्सा देखा गया था.
इसलिए 9 मई पुतिन के लिए काफी अहम और ताकतवर दिन है. यह वह मौका है जब पुतिन नाजी जर्मनी के खिलाफ अपने लोगों के बलिदान की दर्दनाक यादों का फायदा उठा सकें. वह अपने अभियान के औचित्य पर समर्थन जुटा सकते हैं.
अपने देश के अतीत का इस्तेमाल कर मौजूदा दौर के कदम का औचत्य साबित कर सकते हैं.
मॉस्को में मिलिट्री परेड के रिहर्सल की टीवी कवरेज देख कर सिहरन पैदा होती है. इसमें एक बुजुर्ग महिला को दिखाया जा रहा है जो मिलिट्री ट्रक और गरजती मिसाइल लॉन्चरों को गुजरते देख रही है. वो महिला पहली विक्ट्री परेड को भी देख चुकी है. उन्होंने एक बच्ची के तौर पर युद्ध को देखा है. उन्होंने ये बात अपना इंटरव्यू ले रहे शख्स से कही.
इसके बाद वह वो उस जगह से थोड़ा आगे बढ़ी और मुड़ कर अपनी मुट्ठी उठा कर पुतिन के टैंकों का हौसला बढ़ाया. उनके चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी.
(यारोस्लावा किरयुखिना की रिपोर्टिंग के साथ )
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