OI Explained: अपने गेम में बुरी तरह फंसे नेतन्याहू? थिओडोर हर्जल की नीति से भटकना कैसे पड़ रहा महंगा?

OI Explained: इजरायल के बनने के साथ ही उसकी सुरक्षा को लेकर हमेशा ज्यादा जोर दिया गया। पहले साल से लेकर अब तक इजरायल न जाने कितने युद्ध का हिस्सा रह चुका है और लगभग हर युद्ध एक बड़ी कामयाबी के साथ जीता। कभी अपनी शर्तें मनवाईं, कभी दुश्मन की जड़ काटी और कभी दुश्मन देश की जमीन भी अपने कब्जें में ली। लेकिन ये पहली बार है जब इजरायल अपनी ही डॉक्टरीन का शिकार होता दिख रहा है।

वर्तमान में ईरान के साथ चल रहे युद्ध में न तो उसे कुछ हासिल होता दिख रहा है और न ही उसके हिस्से में कोई जमीय या कामयाबी दिख रही है। उल्टा, इजरायली अब असुरक्षा के बीच जी रहे हैं और इसके लिए प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू को दोष दे रहे हैं।

OI Explained

थिओडोर हर्ज़ल का सपना और "द ज्यूइश स्टेट"

इजरायली नेताओं ने अक्सर थिओडोर हर्ज़ल के उस विजन का जिक्र किया है, जो उन्होंने 1896 में अपनी किताब "द ज्यूइश स्टेट" में रखा था। हर्ज़ल ने लिखा था कि "फिलिस्तीन हमारा ऐतिहासिक घर है," और यह जगह यहूदियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनेगी। उनका सपना था कि यहूदियों को एक ऐसा देश मिले, जहां वे बिना डर के रह सकें। उन्होंने ये भी कहा था कि यह राज्य सिर्फ यहूदियों की सुरक्षा के लिए नहीं होगा, बल्कि यह उनके कल्चर का भी प्रतिनिधित्व करेगा। उन्होंने पवित्र स्थलों की रक्षा और सभी धर्मों के सम्मान की बात भी कही थी।

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फिर भी क्यों बनी हुई है असुरक्षा?

आज, 70 साल बाद, इज़राइल एक मजबूत देश बन चुका है। उसकी अर्थव्यवस्था, सेना और संस्थाएं दुनिया में मजबूत मानी जाती हैं। इन उपलब्धियों के बावजूद, इज़राइल आज भी असुरक्षा के माहौल में जी रहा है। बार-बार के युद्ध, हिंसा और खतरे उसकी हकीकत बन चुके हैं। खासकर 7 अक्टूबर को हमास के हमले ने यह दिखा दिया कि मजबूत सैन्य ताकत भी हर खतरे को नहीं रोक सकती।

गाजा और लेबनान युद्ध ने बढ़ाई चिंता

हर्ज़ल का जो आदर्श था, वह हाल की घटनाओं और विचारधार में टकराव दिखता है। गाजा और लेबनान में लंबे समय से चल रहे सैन्य अभियानों में बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई है। इससे इज़राइल की छवि और उसके मूल विजन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

धार्मिक स्थलों पर विवाद ने बढ़ाया तनाव

इस साल कुछ घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी पैदा की। यरुशलम में कैथोलिक कार्डिनल को पाम संडे मनाने से रोका गया, और लेबनान में एक धार्मिक मूर्ति को नुकसान पहुंचाने की घटना सामने आई। इन घटनाओं ने हर्जल की उस बात को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें सभी धर्मों के सम्मान का जिक्र था।

यरुशलम: विवाद का केंद्र

हर्ज़ल ने यरुशलम को एक ऐसा शहर माना था, जहां सभी धर्मों को सुरक्षा मिले। लेकिन आज यह शहर राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पूर्वी यरुशलम को फिलिस्तीन का हिस्सा मानता है, जबकि इज़राइल उसे अपना बताता है।

युद्ध के बीच मनाया गया स्वतंत्रता दिवस

इस बार इज़राइल ने स्वतंत्रता दिवस ऐसे समय मनाया जब देश युद्ध की स्थिति में है। 7 अक्टूबर के हमले का असर अब भी लोगों पर दिख रहा है। जश्न के बीच सायरन और सैन्य गतिविधियां यह याद दिला रही हैं कि हालात सामान्य नहीं हैं। आरोप ये भी हैं कि 7 अक्टूबर से पहले इज़राइल को हमास की प्लानिंग के इंटेलिजेंस इनपुट मिले थे, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। यूनिट 8200 के एक अधिकारी ने चेतावनी भी दी थी, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। यह सिर्फ खुफिया नहीं, बल्कि सोच की भी विफलता थी।

हमले के बाद भी सुरक्षा में खामियां

हमले के बाद भी कई सुरक्षा कमजोरियां सामने आईं। मई 2024 में घुसपैठियों ने एक सैन्य अड्डे में प्रवेश कर जानकारी जुटा ली। इसके अलावा हजारों गोपनीय दस्तावेज ऑनलाइन लीक हो गए, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे। इज़राइल ने जवाब में दुश्मनों पर हमले करवाए, लेकिन इससे स्थायी समाधान नहीं निकला। गाजा और लेबनान में लंबे अभियानों के बावजूद यह साफ नहीं है कि आगे क्या होगा।

गाजा में अनिश्चित भविष्य

गाजा में युद्ध के बाद भी यह तय नहीं है कि वहां शासन कौन करेगा। दोबारा बसाने और बनाने को लेकर भी कोई रणनीति नहीं है। लिहाजा हमास को खत्म करने का लक्ष्य भी अधूरा नजर आता है। इज़राइल के हमलों के बावजूद हमास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सर्वे बताते हैं कि फिलिस्तीनियों का एक बड़ा हिस्सा अब भी हमास का समर्थन करता है। यानी समस्या सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है।

योम हाज़िकारोन: याद और बलिदान

स्वतंत्रता दिवस से पहले योम हाज़िकारोन मनाया जाता है, जिसमें सैनिकों और हमलों में मारे गए लोगों को याद किया जाता है। यह दिखाता है कि इज़राइल की आजादी कितनी बड़ी कीमत पर मिली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, माउंट हर्ज़ल कब्रिस्तान अपनी क्षमता के करीब पहुंच चुका है। 7 अक्टूबर के बाद 1200 से ज्यादा सैनिकों के शव दफनाए गए हैं। इससे युद्ध की कीमत साफ दिखाई देती है।

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क्या सैन्य ताकत ही समाधान है?

इज़राइल ने कई सैन्य सफलताएं हासिल की हैं, लेकिन स्थायी शांति अब भी नहीं आई है। गाजा, लेबनान और पूरे क्षेत्र में राजनीतिक समाधान की कमी बनी हुई है। थिओडोर हर्ज़ल का सपना एक सुरक्षित और स्थिर राज्य का था। इज़राइल ने ताकत तो हासिल कर ली, लेकिन स्थायी सुरक्षा अब भी सवाल बनी हुई है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या मौजूदा रणनीति शांति लाएगी या और संघर्ष को जन्म देगी?

इस एनालिसिस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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