निमिषा प्रिया को माफ नहीं करेगा पीड़ित परिवार, फांसी टली, पर उठी 'किसास' की मांग, क्या है ये कानून?
Nimisha Priya news Update: केरल की रहने वाली भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की फांसी को लेकर बीते दिनों जो खबर राहत की तरह आई थी, वह अब फिर संकट के साए में है। यमन की जेल में बंद निमिषा प्रिया को 16 जुलाई को फांसी दी जानी थी, लेकिन ऐन वक्त पर इसे स्थगित कर दिया गया।
इस फैसले से उनके परिवार और समर्थकों ने राहत की सांस ली थी, मगर पीड़ित के परिवार की नई मांग ने इस राहत को फिर से चिंता में बदल दिया है।

फांसी पर रोक, मगर कितनी देर की राहत?
फांसी की तारीख 16 जुलाई निर्धारित की गई थी, लेकिन 15 जुलाई को भारत के ग्रैंड मुफ्ती कंथापुरम ए.पी. अबूबक्कर मुसलियार ने जानकारी दी कि यमन के धर्मगुरुओं के साथ बातचीत के बाद फांसी को स्थगित कर दिया गया है। इस राहत भरी खबर से ऐसा लगा था कि निमिषा को माफी या बल्ड मनी (Diyah) के ज़रिए बचाया जा सकता है।
लेकिन अब जो जानकारी सामने आई हैं, उन्होंने पूरी स्थिति को उलझा दिया है। दरअसल, पीड़ित महदी के भाई अब्दुलफत्ताह महदी ने बीबीसी अरबी को दिए इंटरव्यू में कहा, "हमारे लिए सुलह की कोशिशें बेमानी हैं। हम अल्लाह की शरिया के मुताबिक 'क़िसास' (Qisas) की मांग करते हैं - यानी खून के बदले खून।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनका परिवार इस भयावह और लंबी कानूनी प्रक्रिया से टूट चुका है और अब सिर्फ इंसाफ चाहता है।
क्या है 'किसास' (Qisas)?
किसास, इस्लामी शरीयत कानून का एक सिद्धांत है, जिसके तहत हत्या जैसे अपराधों में "जैसे को तैसा" की सजा दी जाती है। क़ुरान में इसका उल्लेख है कि हत्या के मामले में तुम्हारे लिए प्रतिशोध (क़िसास) अनिवार्य कर दिया गया है - आज़ाद के बदले आज़ाद, गुलाम के बदले गुलाम, और स्त्री के बदले स्त्री"
हालांकि उसी आयत में यह भी कहा गया है कि अगर पीड़ित का परिवार माफ कर दे, तो बदले में ब्लड मनी (Diyah) - यानी आर्थिक मुआवजा लिया जा सकता है। निमिषा प्रिया के परिवार और सामाजिक संगठनों ने महदी के परिवार से संपर्क कर Diyah के तौर पर मुआवजा देने की पेशकश की थी। लेकिन अब्दुलफत्ताह महदी और उनके परिवार ने यह पेशकश ठुकरा दी है। उनका कहना है कि उन्हें न्याय चाहिए, सौदा नहीं।
भारत में प्रयास तेज?
बता दें कि निमिषा प्रिया पर साल 2017 में अपने यमनी बिजनेस पार्टनर तालाल अब्दो महदी की हत्या करने का आरोप है। 2020 में यमन की अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी। बताया जाता है कि निमिषा प्रिया ने महदी को एक इंजेक्शन के जरिए बेहोश किया और फिर उसकी हत्या कर दी। कथित रूप से महदी द्वारा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न झेल रही निमिषा ने यह कदम आत्मरक्षा में उठाया था, ऐसा उनके समर्थकों का कहना है।
निमिषा की मां और कई सामाजिक संगठन लगातार भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से अपील कर रहे हैं कि किसी भी तरह से यमन सरकार पर दबाव बनाया जाए या धार्मिक नेताओं के जरिए परिवार को समझाया जाए। ग्रैंड मुफ्ती कंथापुरम मुसलियार के हस्तक्षेप से थोड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन मौजूदा स्थिति बताती है कि यह लड़ाई अब और लंबी और जटिल हो सकती है।
निमिषा के पास क्या बचा है विकल्प?
निमिषा की फांसी अभी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित है - जिसका अर्थ है कि एक नई तारीख अभी तय नहीं हुई है। इस बीच अगर कोई राजनयिक या धार्मिक स्तर पर समाधान निकलता है और पीड़ित परिवार मन बदलता है, तभी निमिषा की जान बचने की संभावना है। वरना यमन की अदालत में 'क़िसास' की मांग के आगे कोई कानूनी विकल्प बचता नहीं दिखता।
निमिषा प्रिया का मामला केवल एक कानूनी केस नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवीयता, धार्मिक कानून और राजनयिक संबंधों का एक जटिल मिश्रण बन चुका है। जहां एक ओर भारतीय समाज में सहानुभूति और संवेदना है, वहीं यमन में कानून और पीड़ित परिवार का अपना दर्द भी है। अब देखना यह है कि क्या मध्यस्थता और कूटनीति एक भारतीय नर्स की जान बचा पाएगी या 'क़िसास' का कानून आखिरी फैसला सुनाएगा?












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