धर्म बदलने के लिए कोर्ट पहुंची महिला, बोली- सूअर का मांस खाती हूं, नहीं मानती इस्लाम
धर्मांतरण के एक मामले ने मलेशिया में खासा विवाद खड़ा कर दिया है। एक मुस्लिम महिला ने कहा है कि अपना धर्म बदलना चाहती है।
क्वालालंपुर, 29 मईः धर्मांतरण के एक मामले ने मलेशिया में खासा विवाद खड़ा कर दिया है। एक मुस्लिम महिला ने कहा है कि अपना धर्म बदलना चाहती है। महिला का कहना है कि भले ही उसे एक मुस्लिम माता-पिता ने जन्म दिया हो, लेकिन वह बौध धर्म को मानती है, उसने कभी इस धर्म का स्वीकार नहीं किया है। महिला की याचिका पर स्थानीय हाईकोर्ट 15 जून को सुनवाई करेगा।

अदालत ने निर्णय की तारीख तय की
महिला ने 4 मार्च को एक न्यायिक समीक्षा याचिका दायर की जिसमें शरिया कोर्ट ऑफ अलील, शरिया हाई कोर्ट, फेडरल टेरिटरीज इस्लामिक रिलीजियस काउंसिल और मलेशियाई सरकार को प्रतिवादी के रूप में लाया गया। वकील और अर्टानी जनरल की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दातुक अहमद कमाल शाहिद ने निर्णय की तारीख तय की।

मुस्लिम न होने की घोषणा करे कोर्ट
अपनी शिकायत के हिस्से के रूप में महिला ने कोर्ट से यह मांग की है कि अदालत इस बात की घोषणा करे कि वह मुस्लिम नहीं है। इसके साथ ही अपनी याचिका में महिला ने कोर्ट से यह तय करने की भी मांग की है कि शरिया कोर्ट के पास किसी व्यक्ति को इस्लाम धर्म से निकालने का अधिकार है या नहीं। जज ने याचिका पर दलीलों सुनने के बाद 15 जून को फैसला सुनाने के लिए तारीख दी है।

महिला की मां पर धर्म थोपने का आरोप
आपको बता दें कि महिला शरिया हाईकोर्ट ने जुलाई 2020 की याचिका पर दिसंबर 2021 में दिए फैसले उसके मुस्लिम धर्म छोड़ने को मान्यता देने से इनकार कर दिया था। महिला की मांग है कि दीवानी अदालत इस आदेश पर रोक लगाए। महिला का पक्ष रख रहे वकीलों का कहना है कि उसके माता-पिता के तलाक के बाद उसे माता ने ही पाला। वकील ने महिला की मां पर इस्लाम धर्म थोपने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।

कभी इस्लाम के उसूलों को नहीं माना
महिला ने अपनी याचिका में कोर्ट से कहा कि उसने कभी इस्लाम की शिक्षाओं को नहीं अपनाया। उसे इसमें विश्वास नहीं है। महिला ने अदालत को यह भी बताया कि वह नियमित रूप से सूअर का मांस और शराब का सेवन करती है। महिला अब चाहती है कि उच्च न्यायालय अब घोषित कर दे कि वह अब मुस्लिम नहीं है और उसे कन्फ्यूशीवाद और बौद्ध धर्म का पालन करने का अधिकार है। आपको बता दें कि इस्लाम में यह वर्जित है। हालांकि, बौद्ध धर्म में ऐसी कोई रोक नहीं है।
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