Middle East: 104 साल पहले कैसे हुआ मिडिल ईस्ट का बंटवारा, तीन समझौतों ने फैलाई हिंसा!

Middle East: मिडिल ईस्ट, यानी मध्य पूर्व। तेल, टकराव और तमाम तहजीबों की धरती की। किसी जमाने में यहां वैभव बरसता था तो फिर ऐसा क्या हुआ कि मिडिल ईस्ट आज इतना अशांत है। आज हम जिस मिडिल ईस्ट को धुएं के गुबारों में फंसा दे रहे हैं, पहले इसका स्वरुप आज से बिलकुल अलग था। मिडिल ईस्ट में फैली अशांति के यूं तो कई कारण हैं लेकिन संस्कृति, रीति रिवाज, धार्मिक मान्यता, रहन-सहन जैसे कई मतभेद हैं जो यहां तनाव के वजह अलग-अलग समय में बनते रहे हैं। लेकिन हम आपको ले चलते हैं सीधा 104 साल पहले जब अंग्रेज इस बंटवारे की नींव खोद रहे थे।

104 पहले का मिडिल ईस्ट

मिडिल ईस्ट कोई एक देश नहीं, बल्कि देशों का समूह है, जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका के संगम पर बसा है। इसमें आज के सऊदी अरब, इराक, सीरिया, लेबनान, इज़राइल, जॉर्डन, ईरान, तुर्की, कुवैत, बहरीन, क़तर, ओमान, यमन, लीबिया, साइप्रस, इजिप्ट और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश आते हैं। हालांकि प्रथम विश्व युद्ध से पहले मिडिल ईस्ट में इन में से अधिकांश देश एग्जिस्ट ही नहीं करते थे। तब मिडिल ईस्ट के एक बड़े हिस्से पर ऑटोमन साम्राज्य का कब्जा था।

Middle East

ब्रिटिशों का बंटवारा

1915-1916 में, ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी मैकमहॉन और अरब नेता शरीफ हुसैन के बीच एक गोपनीय पत्राचार हुआ - जिसे "McMahon-Hussein Correspondence" कहा जाता है। इसमें ब्रिटेन ने वादा किया कि अगर अरब लोग ऑटोमन के खिलाफ लड़ेंगे, तो युद्ध के बाद उन्हें एक स्वतंत्र अरब राष्ट्र मिलेगा। ब्रिटेन ने अरबों को आज़ादी का सपना दिखाकर उन्हें ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में अपने साथ शामिल कर लिया. जैसे ही प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ, ब्रिटेन और फ्रांस ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन और फ्रांस के मध्य यूरोप में एक अजीब समझौता हुआ , इसमें मिडिल ईस्ट के नए नक़्शे को तैयार करने के लिए 3 समझौते किये गए।

3 समझौते जिनसे पैदा हुए कई देश

पहला 'साइक्स-पिकॉट' समझौता यह 3 जनवरी 1916, को हुआ। इस समझौते में यह तय हुआ कि युद्ध के बाद हर साथी सदस्य को अरब देशों में हिस्सा मिलेगा। एंटोलिया यानि कि तुर्कों का हिस्सा, सीरिया और लेबनान फ्रांस के अधीन रहेंगे। वहीं, मिडिल ईस्ट का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी हिस्सा यानी इराक और सऊदी अरब ब्रिटेन को मिलेगा। जबकि फिलिस्तीन को इंटरनेशनल एडमिनिस्ट्रेशन में रखा गया था। इसके अलावा बचे हुए इलाके को रूस और इटली को देने का फैसला किया गया।

हैशमाइट समझौता

दूसरा 'ब्रिटिश एम्पायर और हैशमाइट परिवार का समझौता' - 14 जुलाई 1915 से लेकर 10 मार्च 1916 तक ब्रिटिश अफसर सर हेनरी मैक्मोहन और सऊदी अरब के हैशमाइट परिवार के शरीफ हुसैन इब्न अली हाशिमी के बीच यह समझौता हुआ. इसमें तय किया गया कि हैशेमाइट ऑटोमन अंपायर के खिलाफ लड़ेंगे। युद्ध में जीत के बाद उन्हें ऑटोमन साम्राज्य की जमीन का कुछ हिस्सा दिया जाएगा। इस सौदे में सीमाओं का बंटवारा स्पष्ट नहीं किया गया था। हालांकि यह समझौता ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुए समझौते का उल्लंघन था।

बालफोर एग्रीमेंट

तीसरा और समझौता बालफोर एंग्रीमेंट- जर्मन के सताए हुए यहूदी कई सालों से एक अलग देश की मांग कर रहे थे। यहूदी विचारकों और नेताओ के मुताबिक फिलिस्तीन यहूदियों के पुर्खों की जमीन है। इसी आग में घी डाला ब्रिटने ने, दरअसल 2 नवंबर 1917 को ब्रिटेन के विदेश सचिव आर्थर जेम्स बालफोर ने यहूदियों के संगठन को एक लेटर भेजा। जिसमें वादा किया गया था कि ब्रिटिश सरकार फिलिस्तीन में यहूदी लोगों के लिए एक अलग देश बनाएगी. प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ तो ऑटोमन साम्राज्य बिखर गया, और 1920 में बना मिडिल ईस्ट का नया नक्शा। जिसमें 24 जुलाई 1923 को हुई लोहजान की संधि में स्विटजरलैंड में तुर्की और सभी एलाइड देशों (ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान, रोमानिया, सर्बिया, और युगोस्लाविया) के बीच एक समझौता हुआ। और ये वही समझौता था जिसने मौजूदा मिडिल ईस्ट के नक़्शे को ग्लोब पर उकेरा था। हालांकि, इस समझौता में कई जमीनी विवादों और मतभेदों को नजरअंदाज किया गया। इसके चलते आज तक मिडिल ईस्ट में पूर्ण तरीके से स्थिरता नहीं आ पाई है। कभी ईराक-ईरान लड़ते हैं, तो कभी ईजरायल और अरब तो, कभी यमन और सऊदी अरब, कभी यमन और इजरायल और कभी ईरान और इजरायल। मौजूदा वक्त में मिडिल ईस्ट के युद्धों में अमेरिका की भी दिलचस्पी रही है, कभी वह सीधे लड़ा तो कभी दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक चलाई।

तेल की राजनीति और नए मठाधीश

खैर, प्रथम विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद फ्रांस के पास आया सीरिया और लेबनान, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन के खाते में गए इराक, जॉर्डन और फिलिस्तीन। जबकि बाकी हिस्से विवादों में रहे लेकिन कभी ब्रिटेन तो कभी दूसरे यूरोपीय देशों का इन पर असर रहा। इतना की यहां रहने वाले लोगों में भी मतभेद देखे जाते। 1920 के बाद मिडिल ईस्ट से सामने आए तेल के भंडारों को लेकर नए सिरे से झगड़े शुरू हुए. मिडिल ईस्ट के तेल पश्चिमी देशों की निगाह थी, लिहाजा ब्रिटिश और अमेरिकी कंपनियों ने यहां जड़ें जमाना शुरु कर दिया। अब ये क्षेत्र सिर्फ जियो पॉलिटिक्स के नजरिए से ही नहीं, बल्कि ऊर्जा, कमाई और राजनीति का भी केंद्र बन गया। तेल की खोज और उत्पादन ने मिडिल ईस्ट को अमीर बनाया लेकिन यहां दौलत, सत्ता और तानाशाही के लिए संघर्ष और विदेशी हस्तक्षेप दोनों जारी रहे। जो भी नया मठाधीश बनता कुछ दिनों में बदल दिया जाता, फिर एक नया मठाधीश आता। ये क्रम लंबे समय तक चलता रहा।

कुर्दों का छीछालेदर

ईरान और तुर्किये में कुर्द समुदाय का टकराव तनाव के मुख्य कारण के रूप में सामने आया। ईरान कहता कि कुर्द तुर्किए के हिस्से से आए हैं जबकि ईरान इन्हें तुर्किए का धड़ा बताता। हालात ये थे कुर्दों को खुले मन से कोई नहीं अपनाना चाहता था। पहले से भेदभाव झेल रहे कुर्द ईस बात पर और भड़क गए कि मिडिल ईस्ट के बंटवारे में उनके लिए कोई देश नहीं रखा। जिस इलाके में कुर्द रहते थे, उसे तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया में बांट दिया गया, जबकि उनकी संस्कृति और भाषा बाकि देशों से अलग थी। लिहाजा कुर्द इन इलाकों में माइनॉरिटी बन गए और उनकी संस्कृति को तब से लेकर आज तक ये चारों देश दबाने में लगे हैं। हाल में तुर्किए और ईरान में इसे लेकर संघर्ष भी देखने को मिला। कुल मिलाकर उनका लंबे समय से छीछालेदर होते आया है।

इराक का कुवैत-इराक से कुवैत

इसके अलावा कुवैत जो पहले इराक का हिस्सा हुआ करता था उसे 1961 में अंग्रेजों ने एक अलग नया देश बना दिया। ये बटवारा करीब 67 साल बाद युद्ध की वजह बना। लेकिन जब इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता आई तो उन पर कुवैत को वापस इराक में मिलाने की सनक सवार हो गई। नतीजतन 1990 में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने कुवैत को फिर अपना हिस्सा बनाने के लिए उस पर हमला कर दिया। इस पर अक्षय कुमार की फिल्म एयरलिफ्ट भी बन चुकी है।

लेबनान का सिविल वॉर

ठीक, कुवैत जैसी ही स्थिति लेबनान में भी देखी जाती है। सीरिया के सिविल वॉर के बाद हुई लोहजान की संधि के तहत सीरिया को तोड़कर लेबनान नाम का एक अलग देश बना दिया गया। इससे पहले यहां पर भी फ्रांस का ही कब्जा था। उन दिनों लेबनान में अधिकतर ईसाई लोग रहा करते थे। इसके बावजूद लेबनान बनाने के लिए फ्रांस ने कुछ मुस्लिम इलाकों को भी उसमें जोड़ दिया। जिसके कारण वहां 3 तरह की आबादी शिया, सुन्नी और ईसाई हो गए। जिससे वहां तनाव के हालात बने रहते और तनाव हुआ भी, जिसने लेबनान को 1975 से लेकर 1990 तक सिविल वॉर की जद में रखा।

इजरायल की नींव

बालफोर एग्रीमेंट के तहत जिसमें यहूदियों को नया मुल्क देने का वादा ब्रिटिश सरकार ने किया था, अब उसकी मांग तेज हो चुकी थी, खासकर जर्मनी में यहूदियों पर हिटलर के अत्यारों के बाद। लिहाजा ब्रिटिश सरकार ने यहूदियों को फिलिस्तीन में बसाना शुरू कर दिया। 1919 से 1923 तक लगभग 35 हजार यहूदी, फिलिस्तीन में आकर बस चुके थे, उन्होंने इस जमीन को नया नाम इजरायल दे दिया था। नाम तो पहले से तय था तो देश की मांग और बुलंद हुई। इधर फिलिस्तीन में रहने वाले अरब मुस्लिम उनसे चिढ़ने लगे, क्यों ये हमारी जमीन पर चले आए। उधर उनका कहना था कि ये उनके पूर्वजों की जमीन है। कुछ सालों में यहूदियों में मतभेद चरम पर पहुंचा और एक नए राष्ट्र का उदय हुआ।

इजरायल बनाम फिलिस्तीन

यहूदी राष्ट्र इजरायल। 1948 में, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के आधार पर इज़राइल को मान्यता भी मिल गई। जिसमें फिलिस्तीन दो टुकड़ों में बंट गया। एक फिलीस्तीन और दूसरा इजरायल, जबकि इसका तीसरा और सबसे विवादित हिस्सा यरुशलम यूएन की निगरानी में चला गया। अब एक हिस्सा इजरायल हो चुका था और दूसरा फिलीस्तीन। यहां भी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जैसा बंटवारा हुआ। लाखों फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाल दिया गया, और यहां से एक और नए झगड़े का बीज बोया गया। 1948, 1967, 1973 में इजरायल के अरब देशों के साथ युद्ध हुए। लेकिन नतीजा हर बार इजरायल के ही पक्ष में रहा।

'Six Day War'

1967 में हुए 'Six Day War' (6 दिवसीय युद्ध) में इजरायल को ही फायदा हुआ, उसने इजिप्ट की कमर तोड़ दी, जॉर्डन को भी घुटनों पर ला दिया और बाकी देशों के भी अरमान ठंडे कर दिए। इस युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ फिलिस्तीन को, उसका नक्शा और सिकुड़ गया। सिकुड़ क्या गया फिलिस्तीन कई हिस्सों में टूट गया। पहला गाजा पट्टी और दूसरा वेस्ट बैंक में बसी कॉलोनियां जो दिन प्रतिदिन और सिकुड़ती जा रही हैं। इजरायल और ताकतवर होता जा रहा है जबकि सीरिया, यमन, इराक और लेबनान में सिविल वॉर जैसे हालात बने रहना अब सामान्य बात है। इतनी सामान्य कि अब इन्हें लेकर अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में खबरें भी नहीं छपतीं। आज मिडिल ईस्ट में कई देश हैं, कई भाषाएं हैं, कई धर्म हैं - लेकिन इतिहास की एक साझा पीड़ा है। कहने को संघर्ष कभी खत्म नहीं होगा लेकिन चाहें तो साथ में रहकर, एक दूसरे की संस्कृति, रीति-रिवाज और परम्पराओं का सम्मान करते हुए साथ में रह सकते हैं जैसे कि भारत में लोग रहते हैं, अमेरिका में लोग रहते हैं। लेकिन किसी को जंग में ही मजा आ रहा तो उसका कोई विकल्प नहीं है।

इस रिसर्च पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में बताएं।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+