Nobel Prize मिलते ही विवादों में क्यों घिरीं मारिया मचाडो? कहा जा रहा- 'हिटलर और तख्तापलट करने वाली'
मारिया कोरिना मचाडो को नोबल पुरस्कार (Nobel Prize) मिले 24 घंटे भी नहीं हुए कि उनका नाम विवादों से जुड़ने लगा है। यही नहीं, बल्कि नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति की नीयत पर भी सवाल उठ रहें।पोडेमोस के पूर्व नेता और सरकार के पूर्व उपराष्ट्रपति पाब्लो इग्लेसियस मारिया और नोबेल समिति दोनों पर निशाना साधा है।
जैसे ही दुनिया वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को उनके देश में लोकतंत्र बहाल करने के अहिंसक संघर्ष के लिए 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने का जश्न मना रही है, उनकी जीत ने राजनीतिक विरोधियों, वामपंथी टिप्पणीकारों और अंतर्राष्ट्रीय अधिकार समूहों से भी आलोचना को जन्म दिया है।

क्यों उठे सवाल?
विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को वेनेज़ुएला के लोगों के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने के उनके कामों के लिए सम्मानित किया गया। हालांकि, मचाडो की आलोचना उनके यूरोप में रूढ़िवादी राजनीतिक आंदोलनों से कथित संबंधों और अमेरिकी दक्षिणपंथी हितों के करीब होने के आरोपों पर भी की गई है।
वेनेज़ुएला की सुधर पाएगी स्थिति?
हालांकि मचाडो की नोबेल जीत का वैश्विक स्तर पर स्वागत किया जा रहा है, लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि यह निर्वासन में रह रहे वेनेज़ुएला वासियों की स्थिति सुधारने में सीमित प्रभाव डालेगी। कुछ आलोचकों का कहना है कि चूंकि वह अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और विदेशी दबाव का समर्थन करती हैं, इसलिए उन्हें "शांति" के लिए सम्मानित करना ठीक नहीं है।
मुस्लिम संगठनों का विरोध
अमेरिकी मुस्लिम नागरिक अधिकार समूह काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशन्स (CAIR) द्वारा इस फैसले की निंदा करने और नोबेल समिति से पुरस्कार रद्द करने का आह्वान करने के बाद विवाद और गहरा गया। इस बीच, वेनेज़ुएला की सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों ने इस पुरस्कार को "शर्मनाक" करार दिया और मचाडो पर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाने और विदेशी शक्तियों से मिलीभगत करने का आरोप लगाया।
इजरायल का समर्थन कर फंसी
CAIR ने अपने बयान में कहा कि मचाडो इज़राइल की लिकुड पार्टी की मुखर समर्थक हैं और उन्होंने यूरोप में मुस्लिम विरोधी फासीवादी नेताओं, जैसे गीर्ट वाइल्डर्स और मैरी ले पेन, के सम्मेलन में भाग लेकर "रिकोनक्विस्टा" जैसे विवादास्पद ऐतिहासिक संदर्भ का समर्थन किया था, जो 1500 के दशक में स्पेनिश मुसलमानों और यहूदियों के जातीय सफाए का प्रतीक था। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वर्तमान में लिकुड पार्टी से ही आते हैं।
"यह हिटलर को नोबेल देने जैसा"
पोडेमोस के पूर्व नेता और स्पेन के उपराष्ट्रपति रहे पाब्लो इग्लेसियस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "सच तो यह है कि कोरिना मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार देना, जो कई सालों से अपने देश में तख्तापलट करने की कोशिश कर रही हैं, वैसा ही है जैसे इसे ट्रंप या मरणोपरांत हिटलर को देना। अगले साल पुतिन और ज़ेलेंस्की इसे साझा कर लें। अगर यह पहले ही खत्म नहीं हो गया है" उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तीखी हो गई।
वेनेज़ुएला सांसदों की नाराज़गी
वेनेज़ुएला की नेशनल असेंबली के सदस्य और पोडेमोस पार्टी के उपाध्यक्ष विलियन रोड्रिगेज ने भी मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने रूसी समाचार एजेंसी TASS को बताया, "मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना अपमानजनक और शर्मनाक है।"
नोबेल समिति ने किया मचाडो के संघर्ष का समर्थन
नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने कहा कि मचाडो को "वेनेज़ुएला के लोगों के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने और तानाशाही से लोकतंत्र में शांतिपूर्ण संक्रमण" के लिए सम्मानित किया जा रहा है। वहीं, मचाडो ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वह अपनी जीत को वेनेज़ुएला के लोगों और डोनाल्ड ट्रंप को समर्पित करना चाहती हैं, जिन्होंने उनके उद्देश्य का समर्थन किया।
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बढ़ती बहस
मचाडो की इस जीत ने न केवल वेनेज़ुएला बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भी बहस को जन्म दिया है। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह निर्णय आने वाले महीनों में अमेरिका-लैटिन अमेरिका संबंधों पर असर डाल सकता है और नोबेल समिति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाएगा।
शांति का सम्मान या राजनीतिक विवाद?
जहां एक ओर नोबेल समिति ने मचाडो को लोकतंत्र और शांति की प्रतीक बताया, वहीं आलोचकों का कहना है कि यह सम्मान "राजनीतिक झुकाव और दोहरे मानकों" को उजागर करता है। फिलहाल, यह पुरस्कार वैश्विक मंच पर शांति बनाम राजनीति की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।
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