Manmohan Singh Diplomacy: क्या भारत का 'मनमोहन डॉक्ट्रिन' कामयाब हुआ? 10 सालों में कैसी रही डिप्लोमेसी?
Manmohan Singh Passed Away in Delhi AIIMS: भारत के 14वें प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का गुरुवार को नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया है। उन्हें देश के आर्थिक सुधारों का वास्तुकार माना जाता था। वे 92 वर्ष के थे। सिंह को गुरुवार शाम अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।
सूत्रों ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री को सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) दिया गया, लेकिन उन्हें होश में लाने के प्रयास नाकामयाब रहे। 26 सितंबर 1932 को पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में) के गाह गांव में जन्मे मनमोहन सिंह का जीवन सेवा, विद्वता और नेतृत्व का प्रतीक था। उन्होंने चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और बाद में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

92 साल के मनमोहन सिंह दो बार भारत के प्रधानमंत्री बने और इन 10 सालों में उन्होंने विदेश नीति के मोर्चे पर भारत को एक नया मोड़ दिया। आइये जानते हैं, कि 10 सालों अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल या फिर उससे पहले अलग अलग पदों पर रहते हुए उनके कार्यकाल के दौरान भारत की विदेश नीति कैसी रही?
कैसी थी मनमोहन सिंह के समय भारत की विदेश नीति? (How was India's foreign policy during the time of Manmohan Singh?)
हालांकि "मनमोहन डॉक्ट्रिन" नाम कभी भी लोकप्रिय नहीं हुआ, लेकिन इसने 21वीं सदी में भारत की विदेश नीति को इस तरह से परिभाषित किया, कि वह गुटनिरपेक्षता और घरेलू स्तर पर प्रतिबंधात्मक आर्थिक नीति के अपने प्रयोगों से मुक्त हो। अर्थशास्त्र "मनमोहन डॉक्ट्रिन" के केंद्र में रहा। अर्थशास्त्र, आखिरकार ये वही सब्जेक्ट था, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जिसका प्रोफेसर कहा जा सकता है।
उन्हें 1990 के दशक की शुरुआत में 'भुगतान संतुलन संकट' (आम तौर पर आर्थिक संकट के नाम से प्रसिद्ध) के बाद भारत के अधिक उदार अर्थव्यवस्था में परिवर्तन की देखरेख का श्रेय दिया जाता है।
हालांकि, मनमोहन सिंह की विदेश नीति जल्दी ही चरम पर पहुंच गई। सिंह और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के पहले कार्यकाल में भारत को कई सफलताओं के साथ 21वीं सदी में प्रवेश कराने में सफलता मिली।
2008 में वित्तीय संकट के बाद, भारत की वार्षिक जीडीपी वृद्धि 3.9 प्रतिशत रही। यह 2010 में 10.5 प्रतिशत के शिखर पर पहुंच गई, जो आखिरकार 2012 में 3.2 प्रतिशत पर आ गई। उसी दौरान, मुद्रास्फीति सूचकांक भी बढ़े हैं।
आर्थिक मामलों को अगर अलग रखा जाए, तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत की भू-राजनीतिक स्थिति में काफी बदलाव आया।
- इस मोर्चे पर सबसे बड़ी सफलताओं में से एक, भारत का परमाणु सामान्यीकरण था, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उसके असैन्य परमाणु समझौते और उसके तुरंत बाद न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) से छूट हासिल करने में परिलक्षित हुआ।
- 1998 में अपने परमाणु परीक्षण के बाद लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, भारत का वैश्विक रूप से स्वीकृत परमाणु हथियार वाले देशों की श्रेणी में शामिल होना जश्न मनाने का कारण था। सिंह ने, अमेरिकी सौदे के लिए अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया, लेकिन भारत की वैश्विक स्थिति और परमाणु ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अमेरिका से अहम समझौता किया।
लेकिन, बाद में देखने को मिला, कि अमेरिका के साथ भारत के मेल-मिलाप और उसके परमाणु सामान्यीकरण से हासिल हुए मौके कुछ हद तक बर्बाद हो गए हैं।
जैसा कि सी. राजा मोहन ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखा है, भारत में 2010 के परमाणु दायित्व कानून ने अकेले ही दशक की शुरुआत में भारत की प्रगति को कमजोर कर दिया। मनमोहन सिंह इस कानून को यूपीए की ओर से "आत्म-पराजय" कहते हैं।
सी. राजा मोहन ने लिखा है, कि इसने संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और फ्रांस सहित कई विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से रिएक्टरों की बिक्री को रोक दिया, क्योंकि यह निर्माताओं के लिए बीमा-अधिग्रहण को लगभग असंभव बना देता है। इन असफलताओं के बावजूद, अमेरिका, खास तौर पर ओबामा प्रशासन के तहत, भारत के साथ जुड़ने के लिए पहले से कहीं ज्यादा उत्सुक नजर आया।

चीन, अमेरिका के बीच भारत के कदम (Manmohan Singh Diplomacy)
चीन के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करने के लिए अमेरिका ने भारत को लुभाने की कोशिश की, जिसकी वजह से भारत में गुटनिरपेक्ष विचारधारा को फिर से आगे ले जाने के लिए अनुकूल परिस्थितियां भी बनी। सी राजा मोहन ने चतुराई से लिखा है कि "कांग्रेस नेतृत्व, अमेरिका के साथ संबंधों में असाधारण प्रगति से कभी भी बहुत सहज नहीं था।"
उन्होंने लिखा है, कि चीन के लिए खतरा बनने से बचने की कोशिश में, भारत ने चीन के साथ बहुत कम रणनीतिक लाभ के लिए अमेरिका के साथ अपने बढ़ते संबंधों की गति को धीमा कर दिया। चीन को नाराज नहीं करने की कोशिश में, भारत अमेरिका से वो लाभ हासिल नहीं कर पाया, जो कर सकता था।
पड़ोसी देशों से भारत ने कैसे बनाए संबंध?
एसडी मुनि, जो भारत के मशहूर डिप्लोमेट और प्रोफेसर रहे हैं, उन्होंने एक बार एक कार्यक्रम में कहा था, कि "मनमोहन सिंह पड़ोसी देशों की बात काफी करते थे, लेकिन इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा, कि 10 सालों तक प्रधानमंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे सबसे करीबी पड़ोसी देशों की एक भी यात्रा नहीं की।"
जाहिर तौर पर, इसकी वजह से मनमोहन सिंह पर सवाल उठते रहेंगे। खासकर इसलिए भी, क्योंकि लवो मनमोहन सिंह का ही कार्यकाल था, जब नेपाल में चीन ने 'घुसपैठ' करने की कोशिश की थी।
हालांकि, मोटे तौर पर देखा जाए, तो मनमोहन सिंह ने 2004 में अपनी विदेश नीति की पारी वहीं से शुरू की थी, जहां से उनके पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी ने छोड़ी थी। दूसरे शब्दों में, भारत की विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ। उन्होंने अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के मामले में वाजपेयी के रुख से अलग हटना नहीं चुना, जो भारत के विदेश संबंधों के लिए महत्वपूर्ण तीन देश हैं।
मनमोहन सिंह ने वास्तव में इनमें से प्रत्येक देश के साथ संबंधों के दायरे का विस्तार किया।
पाकिस्तान के मामले में, मनमोहन सिंह ने लगातार तीन सरकारों से बातचीत की और कई शांति प्रस्ताव पेश किए। चीन के मामले में, बीजिंग में दो अलग-अलग शासनों के तहत वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए कई विश्वास निर्माण उपाय शुरू किए गए।
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