महातिर मोहम्मद की श्रीलंका संकट पर चेतावनी- सतर्क नहीं रहे तो सब फँसेंगे
थाईलैंड ने 1997 के जुलाई महीने में अपनी मुद्रा का एक दशक से ज़्यादा समय के बाद अवमूल्यन किया था. थाईलैंड ने ऐसा निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से किया था.
थाईलैंड ने पहले अपनी मुद्रा बाट को दुरुस्त रखने के लिए अरबों डॉलर खर्च किया, मगर बाद में सरकार को हथियार डालने पड़े और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के सामने झुकना पड़ा.
तब थाईलैंड की मुद्रा में 15 फ़ीसदी का अवमूल्यन किया गया था. यानी डॉलर की तुलना में 15 फ़ीसदी जानबूझकर कमज़ोर किया गया था.
एशियाई मौद्रिक नीति में इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था. इससे पहले थाईलैंड ने 1984 में अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया था.
लेकिन यह संकट केवल थाईलैंड का ही नहीं था. 1997 में जिन देशों को 'टाइगर इकॉनमी' कहा जाता था- दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस; सबकी वही हालत थी.
इन देशों की सालाना वृद्धि दर छह से नौ फ़ीसदी थी. लेकिन 1997 के आख़िर पाँच-छह महीनों में इन देशों के शेयर बाज़ार और मुद्रा भारी गिरावट आई. 1998 जनवरी आते-आते कई देशों की मुद्रा में 70 फ़ीसदी तक की गिरावट आई.
एशिया के वित्तीय संकट की शुरुआत भी 'ऐसेट बबल्स' से हुई थी. इसका मतलब छोटी अवधि में नाटकीय रूप से हाउसिंग, गोल्ड और स्टॉक का बढ़ना होता है. इसमें हर कोई बिना किसी तार्किक वजह के संपत्तियों की ख़रीदारी करता है.
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आख़िरकार यह बुलबुला फूटता है और क़ीमतें धड़ाम से नीचे आती हैं.
इन इलाक़ों में निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही थी. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ रहा था. इसका नतीजा यह हुआ कि हॉन्ग कॉन्ग और बैंकॉक में रीयल एस्टेट की क़ीमतों में उछाल आया. कॉरपोरेट ख़र्च बढ़ रहा था और यहाँ तक कि पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्टर प्रोजेक्ट में भी निवेश किया गया.
इसका नतीजा यह हुआ कि बैंकों से भारी क़र्ज़ लिए गए. क़र्ज़ की सुलभता के कारण निवेश की गुणवत्ता अक्सर प्रभावित होती है.
आईएमएफ़ इस ट्रेंड को लेकर चिंतित था. उसने मेक्सिको की मुद्रा पेसो के धराशायी होने के बाद चेतावनी दी थी. लेकिन आईएमएफ़ की चेतावनी किसी ने नहीं सुनी थी.
लेकिन यूएस फेडरल रिज़र्व ने महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की. इसका असर निवेश पर सीधा पड़ा. नतीजा यह हुआ कि एशियाई अर्थव्यवस्था में निवेश में भारी कमी आई.
नतीजे बेहद ख़तरनाक थे. सोमप्रासोंग लैंड डेवेलपर डिफॉल्ट कर गया. थाईलैंड की बड़ी वित्तीय कंपनी फाइनैंस वन 1997 में दिवालिया हो गई.
मुद्रा के कारोबारियों ने थाई मुद्रा बाट को निशाना बनाया. इसे वहाँ की सरकार रोक नहीं पाई और आख़िरकार अवमूल्यन करना पड़ा. उपभोक्ता खर्च करने की स्थिति में नहीं थे. जल्द ही बाक़ी एशियाई देशों की मुद्रा इस ज़द में आई.
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टला नहीं है संकट
मलेशिया की रिंग्गिट, इंडोनेशिया की मुद्रा रुपियाह और सिंगापुर का डॉलर भी नहीं बच पाया. इन मुद्राओं में अवमूल्यन किया गया और इससे महंगाई बढ़ी. इसका असर जापान और दक्षिण कोरिया तक पहुँचा.
मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने कहा है कि 1997 में एशिया का वित्तीय संकट फिर से दस्तक दे सकता है.
1997 के एशियाई वित्तीय संकट के 25 साल पूरे होने पर महातिर मोहम्मद ने एशिया निक्केई को दिए इंटरव्यू में कहा है कि यह संकट फिर से दस्तक दे सकता है क्योंकि चीज़ें बदली नहीं हैं.
महातिर मोहम्मद ने कहा, ''जब यहाँ कई लोग अब भी मुद्रा बाज़ार की होड़ में शामिल हैं, ऐसे में नियम और नैतिकता की बात पीछे छूट जाती है. आप शायद मुद्रा की क़ीमत कम करना चाहते हैं लेकिन दूसरे लोग इसकी क़ीमत बढ़ाना चाहते हैं. यहाँ लोग एक दूसरे को काटते रहते हैं.''
पिछले 25 सालों में मुद्रा बाज़ार गुब्बारे की तरह फूला है. बैंक फ़ॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स के सर्वे के अनुसार, 2019 में औसत फॉरन एक्सचेंज ट्रेडिंग एक दिन में 6.6 ट्रिलियन डॉलर का था. यह 90 के दशक के मध्य से पाँच गुना ज़्यादा था.
महातिर मोहम्मद 1981 से 2003 तक मलेशिया के प्रधानमंत्री रहे थे. उन्होंने कहा है कि करेंसी ट्रेडर्स अब भी बहुत मज़बूत हैं और ये किसी ख़ास मुद्रा को कमज़ोर बनाने का काम करते रहते हैं. महातिर ने कहा कि ये विकसित अर्थव्यवस्था जैसे ब्रिटेन और इटली से काम करते हैं और सालों से मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करते रहते हैं.
1997 के संकट में मलेशिया उन देशों में एक था, जो इस संकट की चपेट में था. वहाँ की मुद्रा रिंग्गिट में 50 फ़ीसदी की गिरावट आई थी. मलेशिया के स्टॉक मार्केट इंडेक्स 75 फ़ीसदी गिरा था और बाज़ार से विदेशी मुद्रा निवेशकों ने निकाल लिया था.
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आईएमएफ़ के पास सरेंडर
पहले मलेशिया ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से सलाह ली थी. सरकारी ख़र्चों में कटौती की गई थी और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गई थी. ऐसा विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिहाज से किया गया था.
महातिर मोहम्मद कहते हैं, ''अगर आप आईएमएफ़ और विश्व बैंक के पास जाते हैं तो उनकी एकमात्र दिलचस्पी क़र्ज़ अदायगी को लेकर होती है. उन्हें इसकी कोई फ़िक्र नहीं होती है कि देश में राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर क्या होगा. ये ख़ुद ही देश की आर्थिक नीति बनाना चाहते हैं. इसका मतलब है कि हमें उनके सामने सरेंडर करना होता है.''
महातिर मोहम्मद इसी महीने 97 साल के हुए हैं और अब भी सक्रिय राजनीति से दूर नहीं हुए हैं.
महातिर मोहम्मद आईएमएफ़ को लेकर अपने पूर्व डेप्युटी अनवर इब्राहिम जो कि बाद में विरोधी बन गए से टकराते रहे हैं. महातिर मोहम्मद की कैबिनेट में अनवर मंत्री रहे थे और वह पश्चिमी समाधान की वकालत करते रहे हैं.
महातिर ने एशिया निक्केई से कहा कि श्रीलंका का वर्तमान क़र्ज़ संकट एशिया की दूसरी सरकारों के लिए चेतावनी है कि वे ज़िम्मेदार वित्तीय नीतियां बनाएं या तो निर्मम आईएमएफ़ के हाथों का खिलौना बनने के लिए तैयार रहें.
श्रीलंका सबके लिए सबक
श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली हो चुका है और उसके पास आयात बिल चुकाने के लिए भी पैसे नहीं हैं. लोग खाने-पीने और अन्य ज़रूरी सामानों की किल्लत से जूझ रहे हैं. श्रीलंका ने विदेशी क़र्ज़ चुकाना बंद कर दिया है और अभी आईएमएफ़ की शरण में नए क़र्ज़ के लिए है.
महातिर मोहम्मद कहते हैं कि ख़राब मौद्रिक प्रबंधन और बेसअसर निवेश नीति के कारण श्रीलंका की यह हालत हुई है. महातिर ने कहा कि श्रीलंका में जो कुछ भी हो रहा है, वे हमारे लिए सबक हैं.
महातिर ने कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत है और वह किसी भी वित्तीय संकट से निकलने के साथ निकालने में सक्षम है.
मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि एशिया के विकासशील देशों को सतर्क रहने की ज़रूरत है. महातिर मोहम्मद ने कहा, ''करेंसी ट्रेडर्स चीन में मनमानी नहीं कर सकते हैं लेकिन अन्य विकासशील देशों को सतर्क रहने की ज़रूरत है.''
महातिर मोहम्मद की यह टिप्पणी तब आई है, जब अमेरिकी मुद्रा डॉलर पिछले 20 सालों में सबसे ऊंचाई पर है और पूरे एशियाई देशों की मुद्राएं कमज़ोर हुई हैं. ऐसे में महंगाई बढ़ रही है और डॉलर क़र्ज़ बोझ भी बढ़ रहा है.
महातिर ने कहा कि मुद्रा में थोड़ा उतार-चढ़ाव आम बात है. उन्होंने कहा, ''पाँच प्रतिशत ऊपर-नीचे होना स्वीकार्य है क्योंकि इससे पता चलता है कि बाज़ार में गति है. लेकिन 50 प्रतिशत के अवमूल्यन से लोग ग़रीब होते हैं और यह मंज़ूर नहीं है.''
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