जानिए दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति एफडब्ल्यू डी क्लार्क के बारे में सबकुछ, कैंसर से नहीं जीत पाए जंग

नई दिल्ली, 12 नवंबर। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति एफडब्ल्यू डी क्लार्क के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। गुरुवार को डी क्लार्क का निधन लंबी बीमारी के चलते हो गया। वो कैंसर से पीड़ित थे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी डी क्लार्क के निधन पर शोक प्रकट किया है। आपको बता दें कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद प्रणाली के खिलाफ लड़ाई में जो सबसे अहम नाम है वो नेल्सन मंडेला का है। उनके बाद या कहें उनके साथ ही डी क्लार्क का नाम भी इस लड़ाई में जोड़ा जाता है। अश्वेतों के अधिकारों के लिए लड़े डी क्लार्क को नेल्सन मंडेला के साथ ही नोबेल का शांति पुरस्कार भी मिला था। 85 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

वकालत की पढ़ाई की थी डी क्लार्क ने

वकालत की पढ़ाई की थी डी क्लार्क ने

FW de Klerk का जन्म साल 1936 में जोहान्सबर्ग में हुआ था। राजनीति में आने से पहले उन्होंने लॉ की पढ़ाई की थी और वकालत में ही प्रैक्टिस भी की थी। बाद में उन्होंने राजनीति का रूख किया और पहली बार 1978 में उन्हें आंतरिक मामलों का मंत्री बनाया गया। 1970 और 1980 के दशक के अंत में दक्षिण अफ्रीका को हिंसक अशांति का सामना करना पड़ा, क्योंकि सरकार ने अश्वेत अफ्रीकी मध्यम वर्ग के लोगों को खेती करने के लिए मामूली सुधारों की कोशिश की और देश के अन्य समूहों को हाशिए पर रख दिया। सरकार के इस कदम से देश में रंगभेद का फर्क बढ़ता चला गया।

1990 में चुने गए राष्ट्रपति

आपको बता दें कि डी क्लार्क दक्षिण अफ्रीका में नेशनल पार्टी के नेता थे। नेल्सन मंडेला के बाद उनका पार्टी में कद काफी ऊंचा था। क्लार्क ने दो फरवरी 1990 में दक्षिण अफ्रीकी संसद में एक संबोधन में घोषणा की थी कि मंडेला को 27 साल बाद जेल से रिहा किया जाएगा। इस घोषणा ने एक ऐसे देश में नई ऊर्जा का संचार किया, जिसे दशकों तक रंगभेद को लेकर उसकी क्रूर व्यवस्थाओं के कारण तिरस्कृत व प्रतिबंधित किया गया। डी क्लार्क को सितंबर 1990 में ही राष्ट्रपति चुना गया था।

1996 में राष्ट्रपति पद से दिया था इस्तीफा

1996 में राष्ट्रपति पद से दिया था इस्तीफा

एफडब्ल्यू डी क्लार्क की लीडरशीप में नेशनल पार्टी ने साल 1993 के चुनाव में बहुमत होते हुए भी अफ्रीकी नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ अलाइंस कर लिया। इसके बाद 1994 में दक्षिण अफ्रीका के पहले ऑल रेस इलेक्शन में अपनी पार्टी के अभियान का नेतृत्व किया, जिसमें एएनसी ने नई नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल किया। इसके बाद नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में बनी सरकार में वो शामिल हो गए और दूसरे उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने पद संभाला, लेकिन राजनीति की सेकेंड इनिंग उन्हें रास नहीं आई और 1996 में उन्होंने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। साल 1997 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया।

पॉलिटिक्स से संन्यास के बाद शुरू की थी संस्था

राजनीति छोड़ने के बाद डी क्लार्क ने एक फाउंडेशन की शुरुआत की। 2000 में उन्होंने एफडब्ल्यू डी क्लार्क फाउंडेशन और 2004 में ग्लोबल लीडरशिप फाउंडेशन को शुरू किया। इन फाउंडेशन के जरिए उन्होंने अपनी राष्ट्रपति की विरासत को आगे बढ़ाया। उन्होंने स्वेत अफ्रीकियों कल्चर और भाषा के बारे में आवाज उठाई। दरअसल, उस वक्त दक्षिण अफ्रीका के 11 आधिकारिक भाषाओं में अग्रेंजी काफी प्रभावी बन गई थी।

विवादों में भी रहे थे डी क्लार्क

विवादों में भी रहे थे डी क्लार्क

- उन्होंने साल 2010 में वर्तमान सरकार की आलोचना की थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस एक वक़्त पर नस्लीय समानता की विजेता थी, लेकिन आज नस्ल और वर्ग के हिसाब से एक बार फिर दक्षिण अफ्रीका के देश को विभाजित कर दिया है।

- 2016 की शुरुआत में केपटाउन में दिए एक भाषण में उन्होंने चेतावनी दी थी कि कई श्वेत दक्षिण अफ्रीकी "कम सुविधा वाले समुदायों की दुर्दशा से बेखबर थे" और "कई अश्वेतों का श्वेत दक्षिण अफ्रीकियों के प्रति रवैया कठोर और अधिक अडिग होता जा रहा है।" दक्षिण अफ्रीकी एक बार फिर लोगों को इंसानों के बजाय नस्लीय रूढ़िवादिता के रूप में देख रहे है। डी क्लार्क ने कहा था, "हमें नेल्सन मंडेला के सुलह और राष्ट्र-निर्माण के आह्वान को फिर से सुनने की जरूरत है।"

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