Khamenei funeral: 'खून बहेगा, बदला लेंगे', खामेनेई के जनाजे के बहाने शक्तिप्रदर्शन, ईरान का क्या है संदेश??

Khamenei funeral: ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा सिर्फ एक धार्मिक या राजकीय कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि यह दुनिया को राजनीतिक संदेश देने का मंच भी बन गई है। तेहरान में लाखों लोग काले कपड़े पहनकर सड़कों पर उतरे और "खून बहेगा" व "बदला लेंगे" जैसे नारे लगाए।

ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बयान और अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता की नई चर्चा इस पूरे घटनाक्रम को और अहम बना देती है। सवाल यह है कि क्या ईरान इस जनाजे के जरिए अपनी ताकत दिखाना चाहता है और इससे इजराइल-अमेरिका के साथ तनाव कितना बढ़ सकता है।

Khamenei funeral

जनाजा या दुनिया को संदेश? ईरान क्यों कर रहा है शक्ति प्रदर्शन

आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में लाखों लोगों की मौजूदगी ईरान के लिए सिर्फ शोक का विषय नहीं है। सरकार इस भीड़ के जरिए यह दिखाना चाहती है कि देश का नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन सत्ता व्यवस्था और जनता का समर्थन अब भी मजबूत है। ऐसे आयोजनों के जरिए ईरान अपने विरोधियों को यह संदेश देता है कि बाहरी दबाव या सैन्य कार्रवाई से उसकी राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था कमजोर नहीं होगी। यही वजह है कि इस यात्रा को बड़े स्तर पर आयोजित किया जा रहा है।

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'खून बहेगा, बदला लेंगे' के नारों का क्या मतलब है?

अंतिम यात्रा के दौरान लगे "खून बहेगा", "बदला लेंगे" और "अमेरिका मुर्दाबाद" जैसे नारे सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं माने जा रहे। इन नारों को ईरान समर्थक गुटों के लिए एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। इसका मकसद यह दिखाना है कि अगर भविष्य में किसी तरह का हमला या दबाव बनाया गया तो उसका जवाब दिया जाएगा। हालांकि अभी तक ईरानी सरकार ने किसी नए सैन्य अभियान का आधिकारिक ऐलान नहीं किया है।

ट्रम्प के बयान से क्यों बढ़ी नई बहस?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिका ने मानवता के आधार पर ईरान को अंतिम संस्कार के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि इसके बाद ईरान को अमेरिकी शर्तों पर आगे बढ़ना होगा। ट्रम्प का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका अंतिम संस्कार के बाद फिर से ईरान पर कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा सकता है।

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परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का सख्त रुख क्यों अहम है?

ईरान ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल फोर्डो, नतांज और इस्फहान स्थित परमाणु ठिकानों का निरीक्षण करने की अनुमति अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को नहीं देगा। इससे यह संकेत मिलता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर किसी तरह का बाहरी दबाव स्वीकार करने के मूड में नहीं है। यही मुद्दा अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है और आने वाले दिनों में तनाव बढ़ा सकता है।

क्या अंतिम संस्कार के बाद फिर शुरू होगी बातचीत?

कतर की ओर से संकेत दिया गया है कि अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी होने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता का अगला दौर शुरू हो सकता है। इसका मतलब है कि दोनों देशों के बीच बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। हालांकि बातचीत तभी आगे बढ़ पाएगी जब दोनों पक्ष कुछ मुद्दों पर नरमी दिखाएं। फिलहाल माहौल बेहद संवेदनशील बना हुआ है।

आगे क्या? इजराइल, अमेरिका और ईरान के रिश्तों पर नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम यात्रा के दौरान किया गया शक्ति प्रदर्शन घरेलू राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय रणनीति का भी हिस्सा है। ईरान एक तरफ अपने समर्थकों का मनोबल बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और इजराइल को यह संदेश देना चाहता है कि उस पर दबाव डालना आसान नहीं होगा। अब सबकी नजर इस बात पर है कि अंतिम संस्कार के बाद वार्ता आगे बढ़ती है या फिर क्षेत्र में तनाव और टकराव का नया दौर शुरू होता है।

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