केतन को किसने मारा धक्का? मंगेतर सिया, प्रेमी चेतन ने नार्को टेस्ट से किया मना,कैसे खुलेगा खूनी साजिश का राज!
Siya Goyal Chetan Chaudhary Lie Detector Test: पुणे के जाने-माने रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की मौत का मामला अब एक बेहद उलझी हुई मर्डर मिस्ट्री बन चुका है। पुणे पुलिस सच उगलवाने के लिए केतन की मंगेतर सिया गोयल और उसके प्रेमी चेतन चौधरी दोनों का पॉलीग्राफ (लाई-डिटेक्टर या नार्को टेस्ट) टेस्ट कराने के लिए कोर्ट से इजाजत मांगी थी। लेकिन कोर्ट में सिया गोयल और चेतन चौधरी ने नार्को टेस्ट कराने से साफ मना कर दिया। लोनावला की वडगांव मावल सेशंस कोर्ट ने कहा कि ऐसे टेस्ट के लिए आरोपी की सहमति जरूरी है, इसलिए बिना सहमति के इजाजत नहीं दी जा सकती।
इसके बाद कोर्ट ने पुलिस की अर्जी खारिज करते हुए सिया और चेतन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में यरवदा जेल भेज दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब दोनों ने पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए मना कर दिया है, तो पुलिस इस मर्डर केस को कैसे साबित करेगी? साथ में ये भी समझेंगे कि आखिर पॉलीग्राफ टेस्ट होता क्या है और कैसे काम करता है। जिससे आपको समझ आएगा कि सिया और चेतन ने इसे कराने से क्यों मना किया।

अब आगे क्या? पुलिस कैसे कसेगी सिया और चेतन पर शिकंजा
लाई-डिटेक्टर टेस्ट का रास्ता बंद होने के बाद अब लोनावला पुलिस पूरी तरह से पारंपरिक और डिजिटल फॉरेंसिक जांच पर निर्भर है। पुलिस के पास अब इस केस को मजबूत करने के लिए तीन बड़े रास्ते बचे हैं।
- डिजिटल सबूतों को डिकोड करना: जो चैट और बातचीत डिलीट की गई थी, उसे साइबर एक्सपर्ट्स की मदद से पूरी तरह डिकोड किया जाएगा। अगर उन कोड वर्ड्स का संबंध सीधे केतन को पहाड़ी पर बुलाने और धक्का देने से जुड़ता है, तो यह कोर्ट में सबसे बड़ा तकनीकी सबूत बनेगा।
- फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट: सिया के पास से बरामद दूसरे सीक्रेट फोन और वारदात के वक्त पहने गए कपड़ों पर मौजूद मिट्टी या अन्य कणों की फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट बेहद अहम होगी।
- परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence): चूंकि पुलिस ने मर्डर के रिहर्सल वाली जगह और पासपोर्ट ठिकाने लगाने वाली जगह का पंचनामा कर लिया है, इसलिए इन कड़ियों को जोड़कर कोर्ट के सामने पूरी क्रोनोलॉजी रखी जाएगी।

डिलीट डेटा और सीक्रेट फोन: पुलिस के हाथ लगे नए सबूत
भले ही आरोपियों ने लाई-डिटेक्टर टेस्ट के लिए मना कर दिया हो, लेकिन लोनावला ग्रामीण पुलिस के हाथ कुछ ऐसे डिजिटल सुराग लगे हैं जो इस केस का रुख बदल सकते हैं। लोनावला ग्रामीण पुलिस के जांच अधिकारी असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर (API) मनोज पवार ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने दोनों आरोपियों के मोबाइल फोन से डिलीट किया जा चुका डेटा वापस रिकवर कर लिया है।
लोनावला रूरल पुलिस ने 03 जुलाई को कोर्ट को बताया कि उन्होंने आरोपियों के सेलफोन से डिलीट किया हुआ डेटा रिकवर कर लिया है और कोडेड कम्युनिकेशन के सबूत मिले हैं, जिससे इन्वेस्टिगेटर इस साजिश में किसी तीसरे व्यक्ति के शामिल होने की संभावना की जांच कर रहे हैं। जो चेतन का दोस्त हो सकता है।
पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि उन्होंने सिया का छिपाया गया एक दूसरा सेलफोन भी रिकवर किया है और उसे फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जा सकता है। रिकवर किए गए डेटा का एनालिसिस अभी भी चल रहा है। कोडेड बातचीत को डिकोड करने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि क्या किसी और ने भी आरोपी, सिया और चेतन की क्राइम प्लानिंग करने या उसे अंजाम देने में मदद की थी।

मर्डर का रिहर्सल और गायब पासपोर्ट का पंचनामा
सरकारी वकील राजश्री विरकुड ने अदालत में दलील दी कि पुलिस रिमांड के दौरान इस मामले में बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। पुलिस ने उस जगह का पूरा पंचनामा तैयार कर लिया है, जहां सिया और चेतन ने केतन को रास्ते से हटाने के लिए बाकायदा मर्डर का रिहर्सल किया था।
केस के इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर, असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर मनोज पवार ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने चेतन द्वारा बताए गए घटनाओं के सीक्वेंस को वेरिफाई किया है और उस ट्राउजर को जब्त कर लिया है जिसे उसने क्राइम के दौरान कथित तौर पर पहना था। पुलिस ने उस जगह का पंचनामा किया जहां सिया ने कथित तौर पर अपना पासपोर्ट फेंका था और क्राइम के समय पहने हुए उसके कपड़े भी जब्त कर लिए।
पुलिस ने उस जगह का भी पंचनामा पूरा किया जहां आरोपी ने कथित तौर पर मर्डर प्लान की रिहर्सल की थी। असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर राजश्री विरकुड ने कहा कि सिया और चेतन की पुलिस कस्टडी के दौरान केस में काफी प्रोग्रेस हुई है। उन्होंने कहा कि दोनों ने अपनी बातचीत के दौरान जिस कोडेड भाषा का इस्तेमाल किया, उससे किसी तीसरे व्यक्ति के शामिल होने का पता चल सकता है।

आरोपी मना कर दें तो क्या जबरन हो सकता है टेस्ट? जानें सुप्रीम कोर्ट का नियम
अक्सर फिल्मों या खबरों में हम देखते हैं कि पुलिस सच का पता लगाने के लिए नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट की मांग करती है। लेकिन भारत के कानून में इसके लिए बेहद सख्त नियम हैं। साल 2010 में 'सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य' के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस के. जी. बालकृष्णन की बेंच ने साफ फैसला दिया था कि आरोपी की मर्जी (सहमति) के बिना उसका कोई भी लाई-डिटेक्टर या नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकता।
- अधिकारों की सुरक्षा: कोर्ट ने माना था कि किसी के दिमाग में जबरन घुसना उसकी व्यक्तिगत आजादी और इंसानी सम्मान के खिलाफ है। संविधान का आर्टिकल 20(3) हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि उसे खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
- मना करने पर शक नहीं: अगर कोई आरोपी इस टेस्ट को कराने से मना करता है, तो पुलिस या अदालत इसे उसका गुनाह नहीं मान सकती।
- वकील की मौजूदगी जरूरी: अगर कोई आरोपी स्वेच्छा से टेस्ट के लिए तैयार भी हो जाता है, तो मजिस्ट्रेट के सामने उसकी लिखित सहमति होनी चाहिए और उस दौरान उसके वकील का वहां होना जरूरी है।
कितना भरोसेमंद होता है पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट?
वैज्ञानिक और कानूनी बिरादरी में इन टेस्ट की विश्वसनीयता को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी नेशनल रिसर्च काउंसिल ने अपनी एक रिपोर्ट में साफ कहा था कि पॉलीग्राफ टेस्ट की सटीकता सिक्का उछालने जैसी है, यानी इसे 100% सही नहीं माना जा सकता।
आइए समझते हैं कि ये दोनों टेस्ट काम कैसे करते हैं:
| टेस्ट का नाम | कैसे काम करता है? | वैज्ञानिक कमियां |
| पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) | इसमें शरीर पर सेंसर और इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। जब शख्स से सवाल पूछे जाते हैं, तो उसका ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, सांस की गति और पसीने के उतार-चढ़ाव को मापा जाता है। माना जाता है कि झूठ बोलते समय ये चीजें बदल जाती हैं। | अगर कोई शातिर अपराधी है या अपनी भावनाओं पर काबू रखना जानता है, तो वह इस मशीन को आसानी से धोखा दे सकता है। |
| नार्को टेस्ट (Narcoanalysis) | इसमें आरोपी को 'सोडियम पेंटोथल' नाम की दवा का इंजेक्शन दिया जाता है, जिसे 'ट्रुथ सीरम' भी कहते हैं। इससे इंसान अर्ध-बेहोशी की हालत में चला जाता है, जहां उसकी कल्पना शक्ति खत्म हो जाती है और वह झूठ नहीं गढ़ पाता। | अर्ध-बेहोशी में इंसान जो बोलता है, उसे कोर्ट में सीधे सबूत नहीं माना जाता क्योंकि उस स्थिति में व्यक्ति होश में नहीं होता। |
एक स्थापित नियम यह भी है कि अगर कोई आरोपी स्वेच्छा से टेस्ट करवाता है और उस दौरान वह किसी मर्डर वेपन (हथियार) या सबूत के छिपे होने का पता बताता है, तो उसका बयान तो मान्य नहीं होगा, लेकिन पुलिस द्वारा उस जगह से बरामद किया गया सामान कोर्ट में ठोस सबूत माना जाएगा।

इन बड़े केसों में भी हो चुका है इन टेस्ट का इस्तेमाल
जांच एजेंसियां अक्सर पेचीदा मामलों में सुराग ढूंढने के लिए कोर्ट से इन टेस्ट की मांग करती रही हैं। हाल के सालों में ऐसे कई बड़े मामले सामने आए हैं:
- आरजी कर मेडिकल कॉलेज केस (2024): कोलकाता के चर्चित मामले में मुख्य आरोपी संजय रॉय और पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था।
- हाथरस केस (2020): सीबीआई की मांग पर इस मामले के चार आरोपियों ने अपनी सहमति दी थी, जिसके बाद उनका टेस्ट हुआ था।
- आरुषि-हेमराज मर्डर केस: नोएडा के इस बेहद चर्चित दोहरे हत्याकांड में डॉक्टर राजेश तलवार, नुपुर तलवार और उनके कंपाउंडर कृष्णा का भी फॉरेंसिक टेस्ट कराया गया था।
- अभिषेक घोसालकर मर्डर (2024): इस केस में सीबीआई ने तीन संदिग्धों के टेस्ट की मांग की थी, जिसमें से दो राजी हुए थे और एक ने इनकार कर दिया था।
चेतन अग्रवाल हत्याकांड का खुलासा कैसे हुआ?
इस पूरी कहानी की शुरुआत 18 जून को हुई थी। 25 साल के केतन अग्रवाल, जो एक रियल एस्टेट फर्म के डायरेक्टर थे, मावल तालुका के लोहागढ़ किले की एक ऊंची पहाड़ी (क्लिफ) से नीचे गिर गए, जिससे उनकी मौत हो गई। शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे दुर्घटनावश हुई मौत (Accidental Death) के रूप में दर्ज किया था। लेकिन जब पुलिस ने गहराई से कड़ियां जोड़नी शुरू कीं, तो उनके होश उड़ गए।
जांच में सामने आया कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी हत्या थी। पुलिस ने इस मामले में केतन की मंगेतर सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी को 23 जून को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का दावा है कि सिया ने पहले से तय एक खास इशारा (कोड सिग्नल) चेतन को दिया, जिसके तुरंत बाद केतन को पहाड़ी से नीचे धक्का दे दिया गया। दोनों आरोपी 3 जुलाई तक पुलिस रिमांड पर थे।














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