चीन के 'पालतू' होकर भी भारत के खिलाफ नहीं जा पाएंगे मालदीव के नये राष्ट्रपति, समझिए पूरा समीकरण

India Vs China in Maldives: चूंकि हिंद महासागर में प्रमुख शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है, इसलिए छोटे द्वीप राज्यों के लिए इसके कई परिणाम होते हैं, जिसमें बड़े देशों के साथ राजनीतिक गठबंधन के आधार पर जीते या हारे गए चुनाव भी शामिल हैं।

इस हफ्ते, मालदीव के निवर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह चुनाव हार गए हैं, जो भारत समर्थित राजनीति के लिए जाने जाते थे, लेकिन, उनके हारने के बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या मालदीव में अब भारत के लिए दरवाजे बंद हो गये हैं?

इस सवाल का जवाब है- नहीं।

India Vs China in Maldives

"इंडिया आउट" के अभियान के सहारे चुनावी कैम्पेन चलाने वाले राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद मुइज्जू को शायद भारत और चीन के बीच, मध्यमार्गी बनाना पड़ेगा और वो खुलकर चीन के पाले में खड़े नहीं हो सकते हैं।

पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से मालदीव, प्रमुख शक्तियों, मुख्य रूप से भारत और चीन के बीच भूराजनीतिक खींचतान और साज़िश का केंद्र रहा है। इसका, उसकी घरेलू राजनीति पर काफी असर पड़ा है। राष्ट्रपति सोलिह ने 2018 में, भ्रष्ट पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद यामीन के खिलाफ भारी जीत हासिल की थी, जिन्होंने देश को चीन की तथाकथित ऋण जाल कूटनीति का पोस्टर-चाइल्ड बना दिया था।

यामीन ने हाई प्रोफ़ाइल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एक श्रृंखला के लिए चीन से भारी-भरकम ऋण लिया, जिनमें सीक्रेट ऋण भी शामिल हैं। आखिरकार यामीन के भ्रष्टाचार का अत उनके जेल जाने से हुआ।

राष्ट्रपति सोलिह ने मालदीव जैसे युवा लोकतंत्र में भ्रष्टाचार विरोधी और लोकतांत्रिक संस्थानों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए मालदीव को सुशासन और कानून के शासन का एक मॉडल बनाया। विदेश नीति में, सोलिह ने बिना किसी शर्म के "इंडियन फर्स्ट" दृष्टिकोण अपनाया, और मालदीव के विशाल पड़ोसी को अपना प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भागीदार घोषित किया।

सोलिह ने ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य क्षेत्रीय भागीदारों के साथ मालदीव के संबंधों को भी बढ़ाया, जिसने हाल ही में मालदीव की राजधानी माले में एक दूतावास खोला है।

वहीं, साल 2018 के बाद से मालदीव को कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए भारत ने उसकी काफी मदद की और कोविड संकट के दौरान भी भारत ने मालदीव के लिए अपना दरवाजा खोल रखा था। इसके अलावा भारत ने घोषित बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए अरबों डॉलर देने का वादा किया है।

मोहम्मद मुइज्जू का 'इंडिया ऑउट कार्ड'

मोहम्मद मुइज्जू की जीत के पीछे कई कारण थे, जिसमें सबसे बड़ी वजह राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह की पार्टी में टूट था। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने पार्टी तोड़ दी थी, लेकिन सबसे बड़े कारकों में सोलिह की नई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं देने में नाकामी और भारत के साथ उनके करीबी रिश्ते को देखा गया।

मोहम्मद मुइज्जू ने कैम्पेन की शुरुआत में "इंडिया आउट" कार्ड से शुरू किया था, जिसे यामीन समर्थकों ने भारत के प्रभुत्व के बारे में व्यापक चिंताओं का लाभ उठाते हुए बढ़ाया।

मालदीव में भारतीय सेना की उपस्थिति के खिलाफ देश में माहौल बनाया गया। मालदीव में भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के साथ एक समुद्री गश्ती विमान और दो हेलीकॉप्टर दल तैनात है। ये दल मालदीव में निगरानी और चिकित्सा निकासी प्रदान करते हैं। लेकिन, कई लोगों का कहना है, कि भारत मालदीव में मौजूद होकर जासूसी कर रहा है।

मालदीव के जानकार लोगों में भी इस बात को लेकर बेचैनी है, कि भारतीय अधिकारी सोलिह सरकार के साथ अपने व्यवहार में सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल से परे चले गए। इसने भारत के साथ गुप्त सैन्य सौदों की अफवाहों को बढ़ावा दिया।

India Vs China in Maldives

मोहम्मद मुइज्जू पर क्या होगा दबाव?

17 नवंब को जब मोहम्मद मुइज्जू पदभार संभालेंगे, तो उन्हें भारत के साथ संबंधों को कम करने (संभवतः भारतीय सैन्य उपस्थिति को हटाने) और चीन के साथ संबंधों को उन्नत करने, जिसमें चीनी निवेश के लिए दरवाजे फिर से खोलने शामिल हैं, को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण दबाव का सामना करना पड़ेगा।

मोहम्मद मुइज्जू के ऊपर जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति यामीन को जेल से बाहर निकालने का दवाब होगा, हालांकि उनके पास यामीन को माफ करने की कानूनी शक्ति नहीं है, लेकिन वह संभावित रूप से यामीन की सजा को पलटने के लिए, सुप्रीम कोर्ट फिर से जा सकते हैं, हालांकि इसमें एक लंबी प्रक्रिया शामिल होगी।

राष्ट्रपति मुइज़ू को मालदीव की विदेश नीति के लिए आगे का रास्ता ढूंढना होगा। जबकि, उन्हें यामीन की पार्टी के समर्थन के आधार पर चुना गया है, लिहाजा उन्हें यामीन की उम्मीदों पर भी खड़ा उतरना होगा।

मालदीव के एक्सपर्ट्स का कहना है, कि राष्ट्रपति मुइज़ू, भारत के साथ ज्यादा सार्वजनिक दूरी बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन मालदीव की विदेश नीति की स्थिति में मौलिक बदलाव कर पाने की संभावना कम है।

भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही मुइज़ू को उनकी जीत पर बधाई दे चुके हैं। उन्होंने कहा, कि "भारत समय की कसौटी पर खरा उतरा, भारत-मालदीव द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और हिंद महासागर क्षेत्र में हमारे समग्र सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है"।

वहीं, माना जा रहा है, राष्ट्रपति मुइज्जू पहले ही भारतीय अधिकारियों से मुलाकात कर चुके हैं।

लिहाजा, मुइज़ू विदेश नीति और सुरक्षा में भारत के संबंधों को (शायद, मौन) प्रधानता देते हुए, भारत-चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच, खामोश रहने का रास्ता चुन सकते हैं। हालांकि, इस दौरान वो चीन के साथ आर्थिक संबंधों को बढ़ावा दे सकते हैं।

हिंद महासागर के कई देश यही करने की कोशिश कर रहे हैं। एक छोटे से देश के लिए ऐसा रास्ता कठिन और जोखिम भरा है और इसमें कई परस्पर विरोधी दबावों से निपटना होगा। दिल्ली को भी मालदीव की शर्तों पर खेल खेलने के लिए तैयार रहना होगा।

बड़ी शक्तियों के बीच खींचतान बढ़ने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई छोटे देशों, विशेषकर छोटे द्वीप देशों की स्थिरता पर असर पड़ेगा। जैसे-जैसे द्वीपीय राज्यों का महत्व बढ़ेगा, प्रमुख शक्तियों के साथ गठजोड़ संभवतः घरेलू राजनीति में एक बड़ा कारक बन जाएगा। जैसा कि मालदीव के चुनावों से पता चला है, अगर छोटे राज्यों में अच्छी तरह से प्रबंधन नहीं किया गया, तो बड़े देशों के साथ कथित गठबंधन, चुनावी जहर हो सकता है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+