Iran War Impact: दोबारा शुरू हुई अमेरिका-ईरान जंग, भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होने समेत 5 बड़े खतरे मंडराए
Iran War Impact On India: मिडिल ईस्ट में जून 2026 में हुआ अमेरिका-ईरान शांति समझौता टूटने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सीजफायर खत्म करने और दोनों तरफ से हुए मिसाइल हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। यह जियो-पॉलिटिकल संकट केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसका असर दुनियाभर समेत भारत पर भी पड़ेगा। भारत के लिए इस जंग के दोबारा छिड़ने के कई मायने जिन्हें हम एक-एक कर समझेंगे।
पेट्रोल-डीजल-गैस की किल्लत या महंगाई
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 प्रतिशत से अधिक लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इस स्थिति का असर स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज पर पड़ेगा, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी गुजरता है। यदि ईरान इस जलमार्ग की नाकेबंदी करता है, तो भारत के लिए सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे देशों से आने वाले तेल की खेप रुक जाएगी या कम से कम सप्लाई में अड़चन तो बड़े स्तर पर आ ही जाएगी।

पेट्रोल-डीजल-गैस महंगा होने से क्या होगा?
सप्लाई बाधित होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। ऐसे में भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ेंगे। माल ढुलाई महंगी होने से देश में डोमेस्टिक इन्फ्लेशन (महंगाई) का दबाव बढ़ेगा, जिससे आम आदमी की जेब और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति दोनों प्रभावित होंगी।
दूसरा रास्ता भी हो सकता है डिस्टर्ब
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के साथ-साथ यदि यमन के हूती विद्रोही लाल सागर और बाब अल-मंडब स्ट्रेट में जहाजों को निशाना बनाते हैं, तो स्वेज नहर का पूरा व्यापारिक मार्ग प्रभावित हो जाएगा। भारत का यूरोप, अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका के साथ होने वाला व्यापार इसी रूट पर निर्भर है। ये रास्ता बंद होने पर जहाजों को पूरे अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाकर (केप ऑफ गुड होप होकर) जाना पड़ेगा। इस लंबे रूट के कारण यात्रा का समय 12 से 15 दिन बढ़ जाएगा। नतीजतन, शिपिंग कंपनियां अपना फ्रेट चार्ज (भाड़ा) 200 से 300 प्रतिशत तक बढ़ा सकती हैं। साथ ही, युद्ध क्षेत्र होने के कारण जहाजों का 'वॉर रिस्क इंश्योरेंस' (बीमा प्रीमियम) महंगा हो जाएगा, जिससे आयात-निर्यात की लागत बढ़ जाएगी।
अपना सामान बेचने में भी होगा नुकसान
गल्फ कॉपरेशन काउंसिल (GCC) के देश भारत के बड़े व्यापारिक साझेदारों में से हैं। युद्ध की स्थिति में द्विपक्षीय व्यापार का ढांचा प्रभावित हो जाएगा। भारत बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों को बासमती चावल, चाय, फल-सब्जियां, टेक्सटाइल, केमिकल्स और इंजीनियरिंग सामान बेचता है। इन देशों का नागरिक और आर्थिक ढांचा प्रभावित होने से वहां इन सामानों की मांग घट जाएगी और बंदरगाहों पर काम रुकने से भारत का एक्सपोर्ट कम हो जाएगा।
इससे भारतीय मैन्युफेक्चरिंग करने वाले और किसानों को नुकसान होगा। भारत खाड़ी देशों से न केवल तेल, बल्कि भारी मात्रा में फर्टिलाइजर्स (खाद), प्लास्टिक उत्पाद, सल्फर और कीमती धातुएं मंगवाता है। साथ ही, खाद की सप्लाई रुकने या महंगी होने का सीधा असर भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
क्या है भारत की सबसे बड़ी चिंता?
आर्थिक पहलुओं से इतर, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानवीय है। खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन) में लगभग 85 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं। ये प्रवासी हर साल लगभग 40 से 50 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा (रेमिटेंस) भारत भेजते हैं, जो देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बनाए रखने में भूमिका निभाती है। युद्ध के कारण इन देशों में आर्थिक मंदी आने या बुनियादी ढांचे के नष्ट होने से भारतीयों के रोजगार प्रभावित होंगे, जिससे रेमिटेंस का यह प्रवाह गिर जाएगा।
यदि कुवैत और बहरीन की तरह अन्य नागरिक इलाकों पर भी मिसाइल और ड्रोन हमले तेज होते हैं, तो भारत सरकार पर अपने नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने (Evacuation) का कूटनीतिक और वित्तीय दबाव आएगा, जो एक चुनौती होगी।
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