12 साल में दुनियाभर के कितने मंदिरों को भारत ने दोबारा बनाया? मुस्लिम देशों में भी चलाया ऑपरेशन

World Temple Restoration: इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी महज एक सामान्य विदेश दौरा नहीं थी। यह भारत की बदलती विदेश नीति का एक सीधा संकेत है, जहां अब व्यापार, रक्षा समझौतों और कूटनीतिक बैठकों के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहरों को भी तरजीह दी जा रही है। पिछले 12 सालों में सरकार ने विदेशों में स्थित प्राचीन हिंदू और बौद्ध मंदिरों को दोबारा बनाने, उन्हें ठीक कराने या नए सिरे से बनाने पर खासा जोर दिया है, जो वैश्विक मंच पर देश की सॉफ्ट पावर को बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है।

एशिया में कितने मंदिरों की करवाई मरम्मत?

दक्षिण-पूर्व एशिया में यह काम जमीन पर साफ दिखता है। वियतनाम के माई सन सैंक्चुअरी में प्राचीन चंपा साम्राज्य के शैव मंदिरों को बचाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 2014 के समझौते के बाद लंबा वक्त लगाया। कंबोडिया के अंगकोर वाट, ता प्रॉम और प्रीह विहार जैसे बड़े परिसरों के रिनोवेशन में भी भारतीय टीम शामिल रही है। हाल ही में, यानी साल 2024 में लाओस के करीब एक हजार साल पुराने शिव मंदिर वाट फू के संरक्षण का काम भी भारत ने पूरा किया है।

World Temple Restoration

क्या सिर्फ हिन्दू मंदिरों को ही किया ठीक?

इस नीति में केवल हिंदू मंदिरों को ही तवज्जो नहीं मिली है। 2016 में म्यांमार में आए भूकंप के बाद वहां के बागन पुरातात्विक क्षेत्र के कई बौद्ध पैगोडा क्षतिग्रस्त हो गए थे। भारत ने अगले ही साल, यानी 2017 में द्विपक्षीय समझौता करके वहां के मशहूर आनंद मंदिर और 12 अन्य पैगोडा को दोबारा संवारने का जिम्मा संभाला।

नेपाल भूकंप के बाद बड़ा कदम

पड़ोसी देशों के साथ कूटनीति में भी साझा इतिहास को प्राथमिकता दी गई है। 2015 में नेपाल के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने वहां की सांस्कृतिक विरासत के लिए 5 करोड़ डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज का एलान किया। इसके जरिए ऐतिहासिक सेतो मछिंद्रनाथ मंदिर और बूढानीलकंठ धर्मशाला समेत कुल 28 सांस्कृतिक स्थलों का काम कराया गया।

मुस्लिम देश में भी मंदिरों का रिनोवेश

बांग्लादेश में ढाका का ऐतिहासिक रमना काली मंदिर, जिसे 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने नष्ट कर दिया था, उसे भारत की वित्तीय और तकनीकी मदद से दोबारा बनाया गया। इसका काम 2021 में पूरा हुआ था। इसके साथ ही नाट्य क्षेत्र के 300 साल पुराने जॉय काली माता मंदिर और आनंदमयी काली माता मंदिर के काम में भी सहयोग दिया गया। श्रीलंका के थिरुकेतीश्वरम मंदिर (जो पांच प्राचीन पंच ईश्वरम में से एक है) के लिए भी भारत सरकार ने 32.6 करोड़ श्रीलंकाई रुपये का अनुदान दिया था।

खाड़ी देशों के मंदिरों तक पहुंची कवायद

यह कूटनीति अब खाड़ी देशों तक भी पहुंच चुकी है। बहरीन की राजधानी मनामा में करीब दो सौ साल पुराने श्रीनाथजी मंदिर के पुनर्विकास के लिए 42 लाख डॉलर की एक परियोजना का उद्घाटन खुद प्रधानमंत्री के स्तर पर किया गया था।

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क्या ये सिर्फ भारत के लिए किया?

इन तमाम प्रोजेक्ट्स को केवल पुरातात्विक या तकनीकी सहयोग के चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा। यह विदेश नीति का एक व्यावहारिक हिस्सा है, जो सीधे जनमानस से जुड़ता है। जब भारत किसी देश की राष्ट्रीय धरोहर को सहेजने में मदद करता है, तो दोनों देशों के आम नागरिकों के बीच एक स्वाभाविक भरोसा और आपसी सम्मान का रिश्ता कायम होता है।

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