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Hindenburg Research: हिंडनबर्ग ने खुद ही क्यों बंद कर ली दुकान,अमेरिका में सत्ता परिवर्तन से क्या है कनेक्शन?

Hindenburg Research: नेथन एंडरसन को आखिरकार खुद ही अपनी विवादित शॉर्ट-सेलिंग फर्म बंद करने की घोषणा करनी पड़ गई। 2017 में बनी उनकी हिंडनबर्ग रिसर्च अपनी करतूतों की वजह से दुनिया भर में बहुत ही ज्यादा कुख्यात हो चुकी थी। एक तरह से अपनी सनसनीखेज रिपोर्टों के नाम पर इसने खुद को डीप स्टेट की ओर से चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने का हथियार बना लिया था।

इसने धोखाधड़ी या अनैतिक व्यवहार में लिप्त होने के सनसनीखेज आरोप लगाकर बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनियों को न सिर्फ निशाना बनाया बल्कि, इसके दम पर वित्त बाजार में कोहराम मचाने का काम किया। हिंडनबर्ग रिसर्च का निशाना बनने वालों में निकोला कॉरपोरेशन और अडानी समूह जैसी हाई-प्रोफाइल कंपनियां भी शामिल थीं।

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Hindenburg Research: संभावित जांच के डर से एंडरसन ने बंद किया हिंडनबर्ग रिसर्च ?

हालांकि, इसे बंद करने के बारे में आधिकारिक रूप से निजी कारणों का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन जानकारों का मानना है कि अमेरिका में हो रहे सत्ता परिवर्तन की वजह से इसने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेने में ही भलाई समझी है। क्योंकि, इसने ग्लोबल मार्केट में जिस तरह से तबाही लाने का खेल खेला है, उसकी जांच बहुत ही ज्यादा संभावित थी।

Hindenburg Research: भारत-विरोधी सोरोस के लिए काम करने का लगता रहा है आरोप

कई विश्लेषकों ने बार-बार आगाह किया था कि हिंडनबर्ग रिसर्च,ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की तरह काम करता है। इसका मकसद अमेरिकी अरबपति और भारत-विरोधी जॉर्ज सोरोस के भू-राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए डीप स्टेट टूल के रूप में काम करना है। कहा जा रहा था कि स्वतंत्र जांच की आड़ में यह चुनिंदा देशों की वित्तीय अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर करता है, जिसका बाइडेन प्रशासन को भी लाभ मिलता रहा। इसकी रिपोर्ट की वजह से कई बार बाजारों में बहुत ही विषम परिस्थितियां पैदा हुई्ं और निवेशकों का भरोसा चकनाचूर होने लगा।

अडानी ग्रुप पर हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट भी उसी डीप स्टेट साजिश की हिस्सा माना जाता रहा है, जिससे भारत की एक अगुवा कंपनी को वित्तीय तौर पर बुरी तरह से हिलाने की कोशिश की गई। इसकी रिपोर्ट और उसकी टाइमिंग हमेशा संदेह के घेरे में रही है, क्योंकि इसकी वजह से खास अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई है। भारत को इसकी रिपोर्ट का खमियाजा ऐसे समय में भुगतना पड़ा जब वह ग्लोबल साउथ के एक अहम किरदार के रूप में बढ़ रहा था,लेकिन उसके वैश्विक विस्तार में अड़ंगा डालने का कम किया गया।

Hindenburg Research: ट्रंप के सत्ता संभालते ही बिगड़ सकता था हिंडनबर्ग का खेल?

अमेरिका में हो रहे राजनीतिक बदलाव से यह लगभग तय लग रहा है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक बाजारों को तहस-नहस करने की प्रवृत्ति रखने वाली संस्थाओं के खिलाफ अभियान शुरू हो सकता है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ऐसी स्वयंभू जांच संस्थाओं के कट्टर आलोचक रहे हैं।

Hindenburg Research: डीप स्टेट आकाओं को बचाने के लिए आनन-फानन में बंद कर दी दुकान?

यही वजह है कि ऐसा लग रहा कि खुद को ही खत्म करके हिंडनबर्ग रिसर्च अपने को डीप स्टेट के सरगनाओं को साठगांठ से बचाने और संभावित कानूनी कार्रवाइयों से बच निकालने का तरीका खोज रहा है। जानकारों का कहना है कि कंपनी के बंद हो जाने से इसके कामकाज के तरीके, इसे मिल रही फंडिंग और इसके पीछे किसके सियासी हाथ रहे हैं, उस तक पहुंचने में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने कई बार लोगों को ध्रुवीकृत करने की कोशिश की है। एक तरफ तो यह बड़े नामों और विशाल कॉरपोरेट्स को कथित तौर पर'बेनकाब'करने के नाम पर वाहवाही लूटने की कोशिश करता रहा। दूसरी तरफ शॉर्ट-सेलिंग जैसी रणनीति से बाजार में अस्थिरता को बढ़ाने और वित्तीय संकट पैदा करने का काम किया।

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