Iran After Khamenei: अंदर से टुकड़े-टुकड़े हो रहा ईरान! फौज से अलग जा रहे मोजतबा, अगस्त में क्या होगा बड़ा?

Iran Divided After Ali Khamenei: पिछले शुक्रवार जब ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार शुरू हुआ, तो मंच पर अलग ही नजारा था। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, न्यायपालिका प्रमुख गुलामहुसैन मोहसेनी और सीनियर IRGC जनरल्स महीनों बाद एक साथ एक स्टेज पर दिखाई दिए। लेकिन अब खबर आ रही है कि ये सब दुनिया को दिखाने के लिए एकता का एक नाटक था। दावा ये भी किया जा रहा है कि ईरान अंदर ही अंदर टूटने लगा है।

5 सवाल जो ईरान के अंदर से उठ रहे

ईरान में इस वक्त हर कोई पांच सवालों के जवाब चाहता है। पहला- इस्लामिक रिपब्लिक का असली मतलब क्या होना चाहिए? दूसरा- इसे कौन चलाएगा? और तीसरा- इसे कैसे शासित किया जाना चाहिए? जब तक खामेनेई जिंदा थे, ये सवाल सिर्फ ख्यालों में थे, लेकिन फरवरी में हुई उनकी हत्या के बाद अब सब कुछ बदल चुका है। सवाल ये भी है कि सुप्रीम लीडर का फैसला ही आखरी है क्या? उनके विचारों पर जब बहस होगी तो कौन लीडर बनेगा? सवाल ये भी उठ रहे हैं कि अगर ईरानियों को सिर्फ सुप्रीम लीडर की राय माननी है, तो संसद और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद क्यों हैं?

Iran Divided After Ali Khamenei

लाइव टीवी पर सेंसरशिप और कट्टरपंथियों की साजिश

दूसरा बड़ा वाकया पिछले महीने के अंत में हुआ। अमेरिका के साथ बातचीत में ईरान के चीफ नेगोशिएटर और स्पीकर गालिबाफ जब लाइव टीवी पर अमेरिका-ईरान MoU की शर्तें समझा रहे थे, तो स्टेट ब्रॉडकास्टर ने अचानक उनका लाइव टेलीकास्ट ही काट दिया। यह कोर्इ तकनीकी खराबी नहीं थी। दरअसल, महीनों से वहां का सरकारी मीडिया उन कट्टरपंथियों को बढ़ावा दे रहा है जो अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत के खिलाफ हैं और नेगोशिएटर्स पर लगातार हमले कर रहे हैं।

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5,500 से ज्यादा मौतें और जनता का भारी गुस्सा

तीसरा कड़वा सच यह है कि ईरान की मौजूदा सरकार और फौजी नेतृत्व अपनी ही जनता के बीच बेहद अनपॉपुलर है। भले ही अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध के कारण लोग अभी राष्ट्रवाद के नाम पर सरकार के साथ दिख रहे हों, लेकिन वे पुरानी बातें भूले नहीं हैं। युद्ध से कुछ हफ्ते पहले ही ईरान में दशकों का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था, जिसे सरकार ने क्रूरता से कुचला था और उसके लिए अली खामेनेई को ही जिम्मेदार माना गया था।

मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्रैकडाउन में 5,500 से अधिक लोग मारे गए और 41,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इससे इतर लोग गरीबी और कट्टरपंथी कानूनों के चलते गुस्से से भर चुके हैं। नतीजतन, शहरों में अब ड्रेस कोड की धज्जियां उड़ रही हैं, महिलाएं बिना हेडस्कार्फ के दिख रही हैं और कॉन्सर्ट्स समेत भीड़ जमा होना आम बात हो चुके हैं। जो बताता है कि ईरान की जनता सरकार से कितना अलग जा चुकी है।

कट्टरपंथियों से मोजतबा ने बनाई दूरी!

राजनीतिक स्तर पर, नए सुप्रीम लीडर मोजतबा अली खामेनेई ने कट्टरपंथियों के बजाय पेजेशकियान, गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के प्रोग्रेसिव और बदलाव करने वाले गुट का साथ दिया है। अमेरिका के साथ अंतरिम डील का रास्ता भी राष्ट्रपति पेजेशकियान की वजह से ही साफ हुआ था। जब मोजतबा फैसला लेने में देरी कर रहे थे, तो पेजेशकियान ने उनसे मिलकर साफ़ कह दिया कि देश की आर्थिक हालत बहुत खराब है, अमेरिकी नाकाबंदी ईरान को अपंग बना रही है और अगर डील रिजेक्ट हुई तो वे इस्तीफा दे देंगे।

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सेंट्रल बैंक के प्रमुख अब्दुलनासिर हेमाती ने भी मोजतबा को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि अगर नाकाबंदी नहीं हटी, तो अगस्त के अंत तक देश में जरूरी खाना और मेडिकल सप्लाइ पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इसी वजह से सीजफायर के लिए अमेरिकी शर्तों को माना गया था।

IRGC की नई चाल और ईरान का भविष्य

लेकिन कहानी में एक और बड़ा ट्विस्ट है या यूं कहें कि एक बड़ा किरदार है, IRGC। ईरान की सबसे ताकतवर फोर्स IRGC के जनरल्स का एक गुट, जो घरेलू स्तर पर सबसे शक्तिशाली ब्लॉक बनकर उभरा है, इस अमेरिका-ईरान समझौते को फ्लॉप करने की पूरी कोशिश कर रहा है। वे चाहते हैं कि बातचीत लंबी खिंचे और दोनों देश हिंसा के चक्रव्यूह में फंसे रहें। अब देखना यह होगा कि ईरान के इस अंदरूनी खेल में नेता जीतते हैं या फौज और जनता के हाथ क्या लगता है?

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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