क्या चीन का 'छोटा भाई' बन गया है रूस? दोस्ती या डिप्लोमेसी, भारत के पास अब विकल्प क्या हैं?
आधुनिक दुनिया एक बार फिर से अलग खेमों में बंटती नजर आ रही है और अब केन्द्र भारत और चीन बनता जा रहा है। भारत और चीन के तनावपूर्ण संबंध के बीच रूस और अमेरिका की राजनीति भी एशिया में आकर टिक गई है।
नई दिल्ली, नवंबर 13: अब वो दिन चले गये जब कम्युनिस्ट चीन ने सोवियत संघ के ताकतवर कम्यिुनिस्ट पार्टी के प्रमुख जोसेफ स्टालिन से मदद मांगी थी। और अब आज के दौर में मॉस्को और बीजिंग के बीच समान साझेदारी के बारे में बात करना काफी ज्यादा मुश्किल या यूं कहें, नामुमकिन हो चुका है और दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध स्थापित होने के 70 सालों के बाद अब यह पूरी तरह से साफ हो चुका है कि, रूस की तुलना में चीन काफी ज्यादा मजबूत हो चुका है, तो फिर सवाल ये उठता है क्या भारत के साथ रूस को अपने संबंधों को नये सिरे से लिखने की जरूरत है? भारत को अब रूस से अपने संबंध को विस्तार देने के लिए दोस्ती की बुनियाद पर आगे बढ़नी चाहिए या फिर आधुनिक डिप्लोमेसी का रास्ता ही भारत के लिए ठीक रहेगा?

चीन और रूस के आधुनिक संबंध
बात चीन और रूस के आधुनिक संबंधों की करें तो अब यह पूरी तरह से साफ हो चुका है कि रूस की तुलना में चीन काफी ज्यादा तकतवर स्थिति में पहुंच चुका है। अर्थव्यवस्था से लेकर रक्षा क्षेत्र तक, विश्व की हर व्यवस्था में चीन काफी ज्यादा ताकतवार देश के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धारणा को रक्षा मुद्दों पर भी लागू किया जा सकता है। ऐसा लगता है जैसे क्रेमलिन ने चीन के एक छोटे भाई की भूमिका स्वीकार कर ली है और चीन की भी कोशिश रहती है कि वो रूस की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सके, खासकर चीन में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में पहले पाकिस्तान और फिर रूस से क्लीन चिट लेकर पश्चिमी देशों की तरफ आक्रामक हो सके।

चीन का सबसे बड़ा निवेशक
रूस चीन के सबसे बड़े निवेश के लिए खुला है, और यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी पुष्टि शी जिनपिंग द्वारा हाल ही में मास्को की अपनी यात्रा के दौरान किए गए कई समझौतों से हुई थी। क्रेमलिन के दृष्टिकोण से चीन के साथ उसके जितने मजबूत आर्थिक संबंध होंगे, बीजिंग के साथ साझेदारी की नींव उतनी ही मजबूत होती जाएगी और विश्लेषकों का कहना है कि, पुतिन का अंतिम लक्ष्य पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ गठबंधन बनाना है, ताकि अमेरिका के खिलाफ वो गठबंधन खड़ा हो सके। हालांकि, अभी के लिए, दोनों देशों के बीच सहयोग मुख्य रूप से चीन को रूसी हाइड्रोकार्बन के निर्यात पर आधारित है और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस के प्रमुख गैस उत्पादन करने वाली कंपनी गजप्रोम को यमल प्रायद्वीप पर गैस जमा करने और चीन की बाजार में संभावना तलाशने के लिए निर्देश दिए हैं।

आर्थिक संबंधों में विविधता लाने की कोशिश
ऐसा महसूस किया जा रहा है कि, रूस चाहता है कि वो चीन के साथ अपने आर्थिक संबंधों को विस्तार दे और उसमें विविधता ला सके, ताकि रूस को केवल चीन के लिए कच्चे माल के संसाधन आधार के रूप में नहीं माना जाएगा। साइबेरिया प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का उत्पादन इस साल के अंत तक चालू हो जाएगी, लिहाजा अब रूस चाहता है कि वो चीन के बाजार में अभी पकड़ मजबूत कर चीन के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करे। पिछले कुछ सालों में रूस की आर्थिक स्थिति काफी डंवाडोल रही है और उसे किसी ऐसे पार्टनर की जरूरत है, जो उसे इस मुश्किल घड़ी में संभाल सके और चीन से बड़ा पार्टनर उसे कोई और मिलना मुश्किल है।

रूस के बाजार में चीन
रूस की अर्थव्यवस्था में चीन काफी अंदर तक घुस चुका है और रूस के अंदर चीन अलग अलग प्रोजेक्ट्स को विस्तार दे रहा है। उदाहरण के लिए जब चीन की 5जी टेक्नोलॉजी पर अमेरिका और भारत जैसे देशों ने प्रतिबंध लगा दिया है, उस वक्त भी रूस का बाजार चीन के लिए खुला हुआ है। इसके साथ ही मौजूदा वक्त में रूस की कोशिश की है कि चीन की वित्तीय सहायका से वो अपनी अर्थव्यवस्था में आ रही समस्याओं का समाधान खोज सके। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि, रूसी पक्ष अभी तक सिर्फ इस वजह से चीन के आर्थिक विस्तार को लेकर कोई चिंता नहीं दिखाता है, क्योंकि रूस का मानना है कि, चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी उतनी बड़ी नहीं है, जितना उसे अकसर दिखाया जाता है और यह रूसी हितों के लिए एक गंभीर खतरा नहीं है। साइबेरिया में भी शुद्ध चीनी निवेश अभी असरकारक नहीं है, लिहाजा रूस के लिए चीन के बाजार से अपने लिए आर्थिक फायदा निकालना मुनाफे का सौदा नजर आ रहा है।

रूस में चीन का प्रभाव
पिछले दिनों प्रकाशित एक रिसर्ट रिपोर्ट में कहा गया गया है कि, अभी भी चीन के लोगों के लिए रूस एक पसंदीदा जगह नहीं है और चीन के लोग एक 'संदूक' से निकलकर दूसरे 'संदूक' में नहीं जाना चाहते हैं, लिहाजा चीन के लोग अभी भी पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका में बसना चाहता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, पिछले 10 सालों में सिर्फ 20 हजार चीनी निवासियों ने ही रूस में बसने का फैसला लिया है। हालांकि, यूराल पर्वत के पास चीनी कंपनियों की व्यावसायिक गतिविधियों और अतिक्रमण की वजह से जब तनाव काफी बढ़ने लगा तो मॉस्को ने कुछ कानूनी कदम जरूर उठाए थे, लेकिन वो कदम विशुद्ध रूप से प्रतीकात्मक थे और चीन के विस्तार को रोकने में नाकाफी साबित हुए। विश्लेषकों का मानना है कि, रूस पूरी तरह से अभी चीन पर निर्भर हो चुका है और वास्तव में, रूस की सरकार चीन के साथ दीर्घकालिक और रणनीतिक पहलुओं में आर्थिक सहयोग को प्रतिबंधित करने में भी दिलचस्पी नहीं ले रही है।

रूस के कुछ हिस्सों में चीन का विरोध
रूस की सरकार भले ही बेफिक्र है, लेकिन रूस के जिन हिस्सों में चीन का प्रभाव बढ़ा है, वहां चीन विरोधी भावनाएं काफी तेजी से फैली हैं, जिसे रूस ने कानून बनाकर शांत करने की भले ही कोशिश की है, लेकिन लोगों में चीन विरोधी भावनाएं कम होने की जगह बढ़ती जा रही हैं। रूस के सुदूर पूर्व और साइबेरियाई क्षेत्र में लोंगों का चीन विरोधी रवैया अब 'खतरे' की तरफ बढ़ता जा रहा है। वहीं, अधिकारियों का रवैया चीनी निवेशकों के अनुकूल है, लिहाजा पिछले दिनों खत्म हुए स्थानीय चुनाव में क्रेमलिन समर्थक उम्मीदवारों को भारी हार का सामना करना पड़ा है। लेकिन, अभी भी रूस की सरकार इसे खतरे की घंटी नहीं मान रही है।

जल्द पनप सकता है विरोध
रूस की सरकार देश में चीन विरोधी भावनाओं को बेअसर करने की कोशिश कर रही है, लेकिन फिलहाल इसमें सफलता मिल नहीं रही है। वार्सव यूनिवर्सिटी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस में बैकाल झील पर स्थिति एक पानी की फैक्ट्री, जिसमें चीन की कंपनी का निवेश है, वो मुद्दा रूस का राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। इस बोतलबंद पानी की फैक्ट्री को बंद करवाने के लिए रूस में याचिका पर हजारों लोगों ने हस्ताक्षर किए। वहीं, देश की नामचीन हस्तियों ने चीन के ऊपर पर्यावरण का खुलेआम उल्लंघन करने के आरोप गाए। वहीं, दूसरी तरफ मॉस्को के अधिकारी स्थानीय अधिकारियों पर कड़ा नियंत्रण बनाते हुए रूसी-चीनी आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यानि, कुल मिलाकर देखा जाए तो रूस की सरकार भले ही चीन का 'छोटा भाई' बनने के लिए तैयार है, लेकिन क्या भविष्य में रूस की सरकार देश की जनता का विरोध बर्दाश्त करने लायक रहेगी।

भारत के लिए क्या है रास्ता?
रूस हमेशा से भारत का शुभचिंतक और मददगार रहा है, लेकिन परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं और भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है। लिहाजा, भारत के लिए सवाल ये है कि, कि क्या चीन के खिलाफ उसे रूस का साथ मिलेगा? अमेरिका के खिलाफ रूस ने भारत की मदद जरूर की है, लेकिन चीन के सवाल पर रूस बराबर की दूरी बना रहा है। तो फिर भारत के पास रास्ता क्या है, ये एक अहम सवाल है? हालांकि, रूस ने हथियारों की वो टेक्नोलॉजी चीन को देने से जरूर मना कर दिया है, जो भारत के पास है, लेकिन कब तक? ये एक बड़ा सवाल है। वहीं, अफगानिस्तान के मुद्दे पर रूस ने भारतीय हितों के खिलाफ ही काम किया है, तो फिर सवाल ये उठता है कि, रूस के साथ भारत को अपने संबंधों को दोस्ती की बुनियाद पर आगे बढ़ाना चाहिए या फिर डिप्लोमेसी के आधार पर भारत को नये सिरे से संबंधों के सिरे को खोजना चाहिए?












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