US Visa Rule: Trump ने बढ़ाया भारतीयों का सिरदर्द, वीजा नियमों ला रहे अजीब शर्तें! अप्लाई करने से पहले देख लें
H1B Visa Rule Change: अगर आपका सपना US जाकर पढ़ाई करने या वहां जॉब करने का है, तो आपके लिए एक बड़ी अपडेट है। ट्रंप सरकार ने अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर ली है। सरकार कुछ नए और कड़े नियम लाने वाली है, जिससे विदेशी प्रोफेशनल्स, स्टूडेंट्स और कंपनियों के लिए US का रास्ता मुश्किल हो सकता है। चूंकि अमेरिका जाने वाले लोगों में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसलिए इस बड़े बदलाव का सीधा असर भारतीय युवाओं, H-1B वीजा होल्डर्स, L-1 वीजा और स्टूडेंट वीजा वाले लोगों पर पड़ने वाला है।
क्या ये नियम लागू हो चुके हैं?
राहत की बात बस इतनी है कि ये तमाम प्रस्ताव अभी केवल US होमलैंड सिक्योरिटी (DHS), लेबर डिपार्टमेंट (DOL) और स्टेट डिपार्टमेंट (DOS) के 'Unified Regulatory Agendas' का हिस्सा हैं। इनमें से कोई भी बदलाव फिलहाल लागू नहीं हुआ है। लेकिन इस एजेंडे से प्रशासन की मंशा पूरी तरह साफ है। अगर ये प्रस्ताव फाइनल मुहर के बाद कानून की शक्ल लेते हैं, तो वीजा के लिए एलिजिबिलिटी के पैमाने बेहद कड़े हो जाएंगे, कागजी कार्रवाई का बोझ बढ़ेगा और अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखना काफी महंगा सौदा साबित होने वाला है।

अगस्त में बदल सकते हैं नियम?
अमेरिकी कंपनियां विशेष योग्यता वाले विदेशी प्रोफेशनल्स को अपने यहाँ नियुक्त करने के लिए H-1B वीजा का सहारा लेती हैं, जिसके लिए हर साल 85,000 वीजा का एक सालाना कैप निर्धारित रहता है। अब खबर यह है कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) इसी साल अगस्त में एक नया प्रस्ताव पेश करने की तैयारी में है, जिसका मकसद इस पूरे प्रोग्राम की शर्तों को और ज्यादा सख्त बनाना है। इस नए नियम के तहत यूनिवर्सिटीज और कुछ चुनिंदा रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन्स को मिलने वाली कैप छूट के दायरे को छोटा किया जा सकता है।
थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट मॉडल पर वार
सबसे बड़ा झटका उन भारतीय IT और कंसल्टिंग कंपनियों को लग सकता है जो थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट मॉडल पर चलती हैं, यानी अपने कर्मचारियों को अमेरिका में किसी अन्य क्लाइंट की लोकेशन पर काम करने के लिए भेजती हैं। नए प्रपोजल के मुताबिक, कंपनियों को अब कागजों पर यह पुख्ता सबूत देना होगा कि कर्मचारी के साथ उनका मालिक और कर्मचारी का वास्तविक रिश्ता है। इतना ही नहीं, यह भी साबित करना अनिवार्य होगा कि कर्मचारी क्लाइंट की साइट पर जाकर कोई सामान्य काम नहीं, बल्कि बेहद स्पेशलाइज्ड काम संभाल रहा है, जिसके लिए ढेरों अतिरिक्त दस्तावेज नत्थी करने होंगे।
कंपनियों पर बढ़ेगी फीस की मार
पैसा और पाबंदियां, दोनों मोर्चों पर घेराबंदी की तैयारी है। DHS एक मौजूदा सप्लीमेंटल फीस के दायरे को और व्यापक बनाने जा रहा है। अभी तक यह अतिरिक्त फीस केवल नए H-1B पिटीशन दाखिल करने या एम्प्लॉयर बदलने के वक्त ही वसूली जाती थी, लेकिन नए नियमों के बाद वीजा एक्सटेंशन के आवेदनों पर भी इसे लागू करने की योजना है। इसका सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जिनके पास अमेरिका में 50 से अधिक कर्मचारी हैं और उनके कुल वर्कफोर्स का आधे से ज्यादा हिस्सा H-1B या L-1 वीजा धारकों का है।
सैलरी का नया गणित भी समझिए
उधर, अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट (DOL) भी पीछे नहीं है। वह विदेशी कर्मचारियों की स्पॉन्सरशिप कॉस्ट को बढ़ाने के लिए न्यूनतम तय वेतन के ऊंचे स्लैब तय करने पर विचार कर रहा है। प्रपोजल मंजूर हुआ तो शुरुआती एंट्री-लेवल सैलरी को सीधे 17वें परसेंटाइल से बढ़ाकर 34वां परसेंटाइल करना होगा, जबकि ऊपरी स्तर के वेतन स्लैब में भी बढ़ोतरी की जाएगी।
लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस और ग्रीन कार्ड का झंझट
इसके अलावा, ग्रीन कार्ड की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम माने जाने वाले 'PERM लेबर सर्टिफिकेशन' की प्रक्रिया को भी रीवाइज़ किया जा रहा है। भर्ती के मानकों (recruitment standards) को कड़ा करने के साथ-साथ, अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी से जुड़े नियमों और एंटी-डिस्क्रीमिनेशन (भेदभाव विरोधी) उपायों को और सख्त किया जाएगा। यही वजह है कि अमेरिका में लंबे समय से लंबित ग्रीन कार्ड बैकलॉग और इस ताजा अनिश्चितता को देखकर कई भारतीय प्रोफेशनल्स अब ब्रिटेन (UK) जैसे देशों का विकल्प तलाशने लगे हैं, जहाँ स्थायी निवास (PR) की राह थोड़ी अधिक स्पष्ट है।
ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस भी खतरे में
पढ़ाई के लिए अमेरिका का रुख करने वाले छात्र भी इस नए एजेंडे के निशाने पर हैं। साल 2024-25 में भारत से रिकॉर्ड 3.6 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंचे थे, जिसने भारत को वहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बना दिया। फिलहाल व्यवस्था यह है कि जब तक छात्र अपने कोर्स की शर्तों को पूरा कर रहे हैं, वे Duration of Status के तहत अमेरिका में बने रह सकते हैं। मगर DHS अब छात्रों और एक्सचेंज विजिटर्स के लिए इस व्यवस्था को खत्म कर एक 'फिक्स्ड पीरियड ऑफ स्टे' (रहने की निश्चित समय-सीमा) तय करने की योजना बना रहा है, जिसके खत्म होने पर पढ़ाई जारी रखने के लिए बार-बार एक्सटेंशन की गुहार लगानी होगी। साथ ही, फरवरी 2027 तक Optional Practical Training (OPT) और Curricular Practical Training (CPT) के नियमों की भी समीक्षा होनी है, जिसके जरिए छात्रों को वहां काम का अनुभव मिलता है।
OPT और CPT पर भी कसेगा शिकंजा
चिंताओं की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। ट्रंप प्रशासन एम्प्लॉयमेंट ऑथराइजेशन डाक्यूमेंट्स (EAD) के नियमों में भी बदलाव ला रहा है। इसी महीने आने वाले एक अंतिम नियम के जरिए EAD के उस ऑटोमैटिक एक्सटेंशन को समाप्त कर दिया जाएगा, जो अक्टूबर 2025 में एक अंतरिम व्यवस्था के तहत शुरू हुआ था।
H-4 स्पॉउसेस पर सीधा असर
इस फैसले की सीधी मार H-4 वीजा होल्डर्स पर पड़ेगी, जो मुख्य रूप से H-1B प्रोफेशनल्स के पति या पत्नी हैं और अमेरिका में रहकर जॉब कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश भारतीय हैं जो अपने ग्रीन कार्ड के इंतजार में वहां दिन काट रहे हैं। भले ही रिन्यूअल के लिए एक्सपायरी से 180 दिन पहले आवेदन करने की छूट है, लेकिन यदि सरकारी स्तर पर प्रोसेसिंग में जरा भी देरी हुई, तो नया कार्ड हाथ में आने तक ये लोग कानूनी रूप से काम करने का अधिकार खो देंगे।
क्या है भविष्य?
इमिग्रेशन लॉ फर्म Fragomen के अटॉर्नी मिच वेक्सलर के मुताबिक, "यह ताजा रेगुलेटरी एजेंडा असल में वर्तमान प्रशासन की प्राथमिकताओं का एक रोडमैप मात्र है।" चूंकि ये अभी केवल प्रस्ताव हैं, इसलिए इन्हें कानून बनने से पहले एक लंबी औपचारिक प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें ड्राफ्ट नियमों का प्रकाशन, जनता से सुझाव/आपत्तियां मंगाना और अंतिम मंजूरी शामिल है। कड़े कानूनी दांव-पेंच और अदालती चुनौतियों का सामना करना भी अभी बाकी है। फिर भी, अमेरिका जाने की चाह रखने वालों को अब एक ज्यादा खर्चीले और अनिश्चित इमिग्रेशन दौर के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।
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