क्या होते हैं प्लूटोनियम बम? इजरायल के दुश्मन के इस नये हथियार से कांपा अमेरिका, चीन और रूस खुश
उत्तर कोरिया अपनी राजधानी प्योंगयोंग से 60 मील दूर उत्तर में स्थित योंगब्योन रिएक्टर परिसर में प्लूटोनियम का उत्पादन करता है और ऐसी जानकारी है कि, उत्तर कोरिया के पास उसकी जरूरत से काफी ज्यादा मात्रा में प्लूटोनियम है
नई दिल्ली, सितंबर 09: यूनाइटेड नेशंस की संस्था IAEA ने बताया है, कि ईरान के पास 60% समृद्ध यूरेनियम की मात्रा 55.6 किलोग्राम (122.6 पाउंड) है। संयुक्त राष्ट्र के इस संस्था का कहना है कि, इसका मतलब है कि ईरान 90% समृद्ध यूरेनियम का 25 किलोग्राम (55 पाउंड) तक उत्पादन करने में सक्षम है, जो परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन, यूएन रिपोर्ट में कहा गया है कि, असली कहानी और भी चिंताजनक हो सकती है। क्योंकि, अंग्रेजी में एक बहुत पुरानी कहावत है, कि बिल्ली के खाल निकालने के एक से ज्यादा तरीके होतें हैं और इसी तरह से परमाणु बम बनाने के भी एक से ज्यादा तरीके हो सकते हैं।

क्या हो सकता है ईरान का प्लान?
यूनियन ऑफ कंसर्नड साइंटिस्ट्स ने कहा है कि, अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के कम से कम 15 किग्रा (33 पाउंड) के साथ एक विखंडन-प्रकार के परमाणु हथियार का उत्पादन करना संभव हो सकता है। और इतने भर यूरेनियम से हिरोशिमा पर जितना बड़ा परमाण बम गिराया गया था, जिसका वजन 64 किलो था, उतने बड़े एक परमाणु बम का निर्माण हो सकता है और ईरान ने इतनी मात्रा में यूरेनियम जमा कर लिया है। अगर ईरान इतना बड़ा परणाणु बनाने में भी कामयाब हो, तो फिर वो एक परमाणु संपन्न देश बन जाएगा, जो अमेरिका के लिए सबसे खतरनाक बात होगी। लेकिन अगर समृद्ध यूरेनियम-235 परमाणु बम बनाने का एक तरीका है, तो एक्सपर्ट्स का कहना है, कि इससे प्लूटोनियम बम बनाना भी संभव है और ईरान की कोशिश परमाणु बम बनाने से लेकर प्लूटोनियम बम बनाने की भी है। रिपोर्ट में ऐसी आशंका जताई गई है, कि ईरान के पास एक गुप्त प्लूटोनियम कार्यक्रम हो सकता है या फिर ईरान वैकल्पिक रूप से बाहर से प्लूटोनियम प्राप्त कर रहा है, ताकि प्लूटोनियम बम बनाया जा सके।

उत्तर कोरिया करेगा ईरान की मदद?
एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुकाबिक, उत्तर कोरिया अपनी राजधानी प्योंगयोंग से 60 मील दूर उत्तर में स्थित योंगब्योन रिएक्टर परिसर में प्लूटोनियम का उत्पादन करता है और ऐसी जानकारी है कि, उत्तर कोरिया के पास उसकी जरूरत से काफी ज्यादा मात्रा में प्लूटोनियम का उत्पादन करता है। वहीं, उत्तर कोरिया और ईरान ने मिलकर पूर्वी सीरिया के अल किबर में प्लूटोनियम उत्पादन करने वाले रिएक्टर का क्लोन तैयार किया था, जिसमें सीरिया भी मदद कर रहा था। हालांकि, 5-6 सितंबर 2007 में उस रिएक्टर को इजरायल के एक बेहद ही खतरनाक ऑपरेशन में नष्ट कर दिया गया था, लेकिन एक बार फिर से संभावना है, कि ईरान अपने प्लूटोनियम कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकता है। हालांकि, ईरान दावा करता है कि, साल 2015 में अमेरिका के साथ किए गये ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) समझौते के तहत उसने सभी प्लूटोनियम उत्पादन की सीमा को बंद कर दिया था। समझौते के तहत ईरान को अराक में प्लूटोनियम रिएक्टर के निर्माण को रोकना था और उसे कहा गया था, कि वो रिएक्टर के कोर को सीमेंट से भर दे, लेकिन क्या ईरान ने ऐसा किया, इस बात की जानकारी नहीं है।

ईरान का चौंकाने वाला दावा
अमेरिका की पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ परमाणु समझौते को रद्द कर दिया, जिसके बाद साल 2020 में ईरान के परमाणु ऊर्जा प्रमुख अली अकबर सालेही ने घोषणा की थी, कि जेसीपीओए-आवश्यक ऑप्टिक केवल दिखावे के लिए था। उन्होंने कहा कि, "जब उन्होंने हमें रिएक्टर ट्यूबों में सीमेंट डालने के लिए कहा, तो हमने कहा कि, ठीक है, हम ऐसा करेंगे, लेकिन हमने उन्हें ये नहीं बताया, कि हमारे पास ऐसे और भी ट्यूब हैं। नहीं तो वे हमें उन ट्यूबों में भी सीमेंट डालने के लिए कहते।" वहीं, ईरानी संसद की ऊर्जा समिति के एक सदस्य फ़ेरेडौन अब्बासी ने इस सप्ताह कहा है, कि ईरान को यूरेनियम को समृद्ध करने के अलावा एक प्लूटोनियम रिएक्टर का निर्माण करना चाहिए। जबकि, अब्बासी ने दावा किया कि, शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए प्लूटोनियम की आवश्यकता थी, फिर भी उनकी घोषणा को यह संकेत देने के लिए डिकोड किया जा सकता है कि, ईरान के पास पहले से ही एक सक्रिय प्लूटोनियम कार्यक्रम है।

ईरान को प्लूटोनियम की भी जरूरत
ऐसा महसूस हो रहा है कि, ईरान को अपना परमाणु शस्त्रागार का निर्माण करने के लिए उसे यूरेनियम के अलावा उसे प्लूटोनियम की भी जरूरत है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह, ईरान भी बमों के निर्माण के लिए लिए कभी भी पर्याप्त यूरेनियम को समृद्ध करने में सक्षम नहीं होगा। हिरोशिमा बम की कहानी हमें ईरान के कार्यक्रम के बारे में कुछ बता सकती है और यह स्पष्ट कर सकती है कि यह परमाणु हथियार बनाने के लिए यूरेनियम पर निर्भर नहीं है। 1945 में अमेरिका यूरेनियम और प्लूटोनियम-ईंधन वाले परमाणु हथियार दोनों विकसित कर रहा था। हिरोशिमा पर जो अमेरिकी बम गिरा, वह यूरेनियम बम था जबकि नागासाकी पर गिराया गया अमेरिकी बम प्लूटोनियम बम था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूएस मैनहट्टन परियोजना मुख्य रूप से यूरेनियम को समृद्ध कर रही थी। वहां संचालित तीन कार्यक्रमों में दो यूरेनियम संवर्धन संयंत्र (के -25 और वाई -12) और एक तरल थर्मल प्रसार संयंत्र (एस -50) था। Y-12 संयंत्र ने कैल्यूट्रॉन का उपयोग करके हथियार के ग्रेड समृद्ध यूरेनियम को निकालने के लिए विद्युत चुम्बकीय पृथक्करण का उपयोग किया था। वहीं, यह ध्यान देने योग्य है कि इराक ने भी यूरेनियम निकालने के लिए कैल्यूट्रॉन का इस्तेमाल किया और प्लूटोनियम उत्पादन के लिए एक परमाणु रिएक्टर बनाने की कोशिश की, हालांकि यह कभी भी परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में नहीं आया।

अमेरिका ने कैसे बनाया प्लूटोनियम बम
अमेरिका का ओक रिज K-25 संयंत्र यूरेनियम निकालने के लिए गैसीय प्रसार का उपयोग करने वाला एक विशाल परिसर था, जिसे बाद में संवर्धन के स्तर को बढ़ाने के लिए Y-12 संयंत्र में भेज दिया गया था। ओक रिज में, शिकागो विश्वविद्यालय में एनरिको फर्मी और उनकी टीम के काम के आधार पर एक प्रारंभिक ग्रेफाइट रिएक्टर भी था, जिससे शिकागो विश्वविद्यालय में एनरिको फर्मी ने काम किया था और फिर अंत में जातकर वॉशिंगटन राज्य के हनफोर्ड में एक विशालकाय प्लूटोनियम प्लांट की स्थापना की गई। मैनहट्टन प्रोजेक्ट के हथियार-ग्रेड यूरेनियम निर्माण कार्यक्रम के बारे में आज भी कुछ विवाद है। विवाद इस बात पर है कि क्या हिरोशिमा बम के लिए भी कभी पर्याप्त मात्रा में समृद्ध यूरेनियम नहीं था। यह निर्विवाद है कि, इतना कम समृद्ध यूरेनियम का उत्पादन हो पाया, कि उससे केवल एक बम ही बनाया गया। इसके अतिरिक्त, विखंडनीय सामग्री की कमी के कारण उस बम के प्रोटोटाइप का परीक्षण कभी नहीं किया जा सका।

क्या जापान भी बनाना चाहता था बम?
द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर के मारे जाने के बाद जर्मनी ने सरेंडर कर दिया था और मई 1945 में जर्मनी की एक पनडुब्बी यू-234 को समु्द्र के अंदर से अमेरिकी नेवी ने जब्त किया था और फिर उस पनडुब्बी को अमेरिकी नेवल बेस लाया गया। पनडुबब्बी के साथ उसके क्रू मेंबर्स भी गिरफ्तार किए जाने के बाद अमेरिकी नेवल बेस लाए गये और फिर वहां जाकर पनडुब्बी की तलाशी ली गई। इस दौरान यूएस नेवी को पनडुब्बी के अंदर से यूरेनियम के पैकेट्स मिले हैं और पता चला, कि यूरेनियम के उन पैकेट्स को जापान ले जाने का आदेश दिया गया था। हालांकि, पनडुब्बी के अंदर से मिले यूरेनियम का प्रकार क्या था, ये साफ नहीं किया गया। वहीं, बाद में चालक दल के कुछ सदस्यों का दावा है कि पनडुब्बी U-235 (समृद्ध यूरेनियम) के रूप में चिह्नित सीसा-संलग्न कंटेनरों को ले जा रही थी। अन्य प्रकार के यूरेनियम के लिए, लेड कंटेनरों की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि यूरेनियम रेडियोधर्मी नहीं होता। और कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि, जर्मनी की पनडुब्बी से मिले यूरेनियम को जल्दी से ओक रिज ले जाया गया और जिस बम को जापान के हिरोशिमा में इस्तेमाल किया गया, उस बम को बनाने में उस यूरेनियम का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, पनडुब्बी से यूरेनियम मिलने के बाद भी अमेरिका ने प्लूटोनियम की तरफ अपना ध्यान बढ़ाया, जिसका उत्पादन हनफोर्ड में किया जा रहा था। 1945 के अंत में अमेरिका के पास लगभग पांच बमों के लिए पर्याप्त प्लूटोनियम जम हो गया था और फिर वहां से परमाणु हथियारों के उत्पादन में तेजी आई।

कब तक परमाणु बम बना लेगा ईरान?
यूनाइटेड़ नेशंस की संस्था आईएईए को लगता है कि, ईरान संभवत: एक या दो वर्षों से कम के अंतराम में छोटे छोटे परमाणु बमों का निर्माण करने में सक्षम हो सकता है। यदि ये उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों की विस्फोटक शक्ति को प्रतिबिंबित करते हैं, तो उनका आकार लगभग हिरोशिमा और नागासाकी पर इस्तेमाल किए गए बमों के बराबर होगा। हालांकि, ईरान के पास ऐसे परमाणु बमों की संख्या कम होगी। लेकिन, क्या होगा अगर ईरान के पास प्लूटोनियम कार्यक्रम भी हो? इसके लिए एक रिएक्टर और प्लूटोनियम निष्कर्षण क्षमताओं की आवश्यकता होगी, लेकिन ये सभी ईरान की पहुंच के भीतर हैं। ईरान के हथियार कार्यक्रम के प्रमुख हिस्से भूमिगत हैं और निरीक्षण के लिए दुर्गम हैं, लिहाजा, ईरान के प्लूटोनियम कार्यक्रम को लेकर एक संभावना तो है ही और सबसे खतरनाक बात ये है, कि ईरान को एक और जगह से प्लूटोनियन की आपूर्ति होने की आशंका है और उस जगह का नाम है, उत्तर कोरिया, जिसे रोकने की क्षमता फिलहाल अमेरिका में भी नहीं है।

फिर ईरान हो जाएगा न्यूक्लियर ताकत
अगर ईरान का प्लूटोनियम कार्यक्रम कामयाब हो जाता है, तो फिर ईरान कम से कम 20 से 25 प्लूटोनियम बम बनाने की क्षमका तक पहुंच सकता है, जिसके बाद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान, पाकिस्तान के बाद दुनिया का दूसरा इस्लामिक देश होगा, जिसके पास परमाणु बम होगा और ईरान के परमाणु बमों की शक्ति उत्तर कोरिया के परमाणु बम जितने होंगे, लेकिन तबाही मचाने में समर्थ तो होंगे ही, लिहाजा इससे सबसे ज्यादा चिंतित देश इजरायल ही है, जिसने पिछले साल घोषणा की थी, कि वो ईरान को किसी भी हाल में परमाणु बम का निर्माण नहीं करने देगा, भले ही कुछ भी क्यों ना हो जाए, तो फिर क्या आने वाले वक्त में एक और ईरान-इजरायल युद्ध को देखने के लिए दुनिया को तैयार हो जाना चाहिए?
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