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LPG-Oil Crisis: अभी और बढ़ेगा गैस-तेल का संकट? भारत पर भी मंडरा रहा खतरा! Trump ने मदद के लिए फैलाए हाथ

LPG-Oil Crisis: Donald Trump के प्रशासन को अमेरिका की बड़ी तेल कंपनियों ने चेतावनी दी है कि ईरान से जुड़ा बढ़ता तनाव दुनिया को तेल-गैस समेत कई दूसरी बड़ी मुसीबतों की ओर धकेल सकता है। कंपनियों का कहना है कि अगर हालात बिगड़े तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में बड़ी उठा-पटक देखने को मिल सकती है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज से बिगड़ा खेल

इस खतरे की सबसे बड़ी वजह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग मार्गों में से एक, Strait of Hormuz है। यह वही समुद्री रास्ता है जिसके जरिए खाड़ी देशों का बड़ा हिस्सा दुनिया तक तेल पहुंचाता है। अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो ग्लोबल एनर्जी सप्लाई पर सीधा असर पड़ सकता है।

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कितना तेल गुजरता है हॉर्मूज से?

अमेरिका की बड़ी तेल कंपनियों- ExxonMobil, Chevron और ConocoPhillips- के सीनियर अधिकारियों ने सरकार से मुलाकात में कहा कि मिडिल ईस्ट की अस्थिरता वैश्विक ईंधन आपूर्ति के लिए बड़ी मुसीबत बनती जा रही है।

भारत में कैसे पहुंचा LPG संकट?

एक्सपर्ट्स की मानें तो दुनिया के कुल तेल का लगभग पांचवां हिस्सा और बड़ी मात्रा में लिक्विड नैचुरल गैस (LNG) इसी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज से होकर गुजरती है। फिलहाल ईरान ने यहां से एक भी कार्गो शिप गुजरने पर पाबंदी लगा दी है और जो शिप निकलने की कोशिश कर रहे हैं उन पर ईरान हमले कर रहा है। इसलिए यहां पर आवाजाही अभी रुकी है, जिससे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक सप्लाई संकट पैदा हो सकता है। जिसका असर फिलहाल भारत के LPG सेक्टर में देखने को मिल रहा है।

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कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर के करीब

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी हैं। उद्योग से जुड़े नेताओं का कहना है कि अगर क्षेत्र में संघर्ष लंबा चलता है, तो कीमतें इससे भी ज्यादा बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर दुनिया भर की इकॉनोमी पर पड़ेगा- पेट्रोल और डीजल महंगा होगा, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी और इसका दबाव आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

महंगाई और आर्थिक मंदी का खतरा

एक्सपर्ट्स को डर है कि अगर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो पूरी दुनिया में महंगाई भी तेज हो सकती है। महंगाई बढ़ने से दुनिया की आर्थिक विकास दर धीमी पड़ सकती है और कई देशों में आर्थिक संकट या मंदी का खतरा भी बढ़ सकता है। इसका असर कई लोगों की जॉब पर भी पड़ सकता है।

अमेरिका क्या कर रहा?

इस स्थिति से निपटने के लिए अमेरिकी सरकार कई आपातकालीन उपायों पर विचार कर रही है। इनमें रणनीतिक तेल भंडार जारी करना, कुछ देशों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देना और तेल आयात के नए विकल्प तलाशना शामिल है। इसके अलावा अमेरिका कार्गो शिप और तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए सैन्य कदम उठाने पर भी विचार कर रहा है ताकि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के जरिए तेल की सप्लाई में कोई दिक्कत न आए।

जिस वेनेजुएला पर किया हमला, उसे भी मिलेगी आजादी?

अमेरिका उन देशों से भी तेल आयात बढ़ाने की योजना पर विचार कर रहा है जिनसे पहले संबंध सीमित थे। इसमें खास तौर पर Venezuela का नाम सामने आ रहा है। हालांकि इंडस्ट्री को करीब से देखने और जानने वालों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो ये उपाय बाजार को पूरी तरह स्थिर रखने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। यानी, हॉर्मूज को किसी भी कीमत पर खुलवाना ही पड़ेगा।

भारत, चीन और यूरोप पर भी पड़ेगा असर

अगर तेल आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट बनी रहती है, तो इसका असर दुनिया भर में आसानी से दिखेगा। खासकर उन देशों पर जो दूसरे देशों के तेल पर निर्भर हैं, जैसे India, China और यूरोप के कई देश। इन सभी को ये मार झेलनी होगी। इन देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं, महंगाई तेज हो सकती है और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

हॉर्मुज को सुरक्षित रखने के लिए गठबंधन की कोशिश

इस बीच ट्रंप प्रशासन एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका मकसद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज से तेल की बिना रुकावट आवाजाही को सुरक्षित रखना है। White House ने अपने सहयोगी देशों से आग्रह किया है कि वे कार्गो शिप और तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए इस मिशन में शामिल हों। इसके लिए खुद ट्रंप ने NATO देश और यहां तक की चीन से भी मदद करने के लिए कहा है।

ट्रंप का साथ नहीं देना चाहते कई देश

हालांकि अभी तक अन्य देशों की तरफ से इस प्रस्ताव पर उन सभी देशों का जवाब काफी हल्का है जिनसे ट्रंप ने मदद मांगी है। कई देश सीधे तौर पर इस युद्ध में शामिल होने से बचना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे वे युद्ध में और गहराई तक फंस सकते हैं। वहीं, कुछ देशों को ये डर भी सता रहा है कि कहीं ईरान फिर उनके खाड़ी देशों में बने सैन्य अड्डों को निशाना बनाना न शुरू कर दे।

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डर के साये में गठबंधन

सहयोगी देशों के बीच मतभेद, युद्ध के अंत को लेकर अनिश्चितता और जंग में फंसने के डर की वजह से मजबूत गठबंधन बनाना आसान नहीं दिख रहा। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स को चिंता है कि अगर अमेरिका अपने सैन्य अभियानों का विस्तार भी करता है, तब भी वैश्विक ऊर्जा संकट पूरी तरह खत्म नहीं हो पाएगा।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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