दरवाजे तक पहुंची आर्थिक मंदी, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में धड़ाम से गिरे कच्चे तेल के दाम, बच पाएगा भारत?
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, ये हफ्ता दुनियाभर के केन्द्रीय बैंकों के लिए काफी व्यस्त रहा है, क्योंकि दुनिया भर में कई देशों के केन्द्रीय बैंकों ने ब्याज दर बढ़ाए हैं।
नई दिल्ली, जुलाई 13: पूरी दुनिया के गंभीर आर्थिक संकट में पहुंचने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ गया है और मंदी की बढ़ती चिंताओं के कारण दुनियाभर में डिमांड कम हो गई है, जिसकी वजह से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें तीन महीने के निचले स्तर को छू गई है और माना जा रहा है, कि कच्चे तेल की कीमत में और भी गिरावट आएगी, जिससे आर्थिक मंदी का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।

औंधे मुंह गिरी कच्चे तेल की कीमत
पिछले तीन महीनों में यह पहली बार है जब कच्चे तेल की कीमतें इतने स्तर तक गिर गई हैं। इस रिपोर्ट को लिखे जाने तक, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चे तेल की कीमत 96.09 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। जब से यूक्रेन में संघर्ष शुरू हुआ है, तेल के सप्लाई चेन में भारी व्यवधान जारी है, जिससे कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है। यूक्रेन संघर्ष से पहले, कच्चा तेल लगभग 90 अमरीकी डॉलर प्रति बैरल था और फरवरी के अंत में एक सप्ताह से भी कम समय में बढ़कर 115 अमरीकी डॉलर हो गया था। वहीं, मार्च के अंत में कीमतों में मामूली गिरावट देखी गई, और यह अप्रैल की शुरुआत में USD 100 से नीचे चली गई। कच्चे तेल की कीमतों में आई लेटेस्ट गिरावट को संभावित मंदी की बढ़ती आशंकाओं के साथ-साथ विभिन्न केंद्रीय बैंकों द्वारा आक्रामक मौद्रिक नीति को सख्त करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ये कारक अनिवार्य रूप से कच्चे तेल की कमजोर मांग की ओर ले जा रहे हैं, और इस तरह उनकी कीमतों में गिरावट में योगदान दे रहे हैं, लिहाजा आर्थिक मंदी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

तेल की कीमतों में क्यों आई गिरावट?
चीन में नए सिरे से COVID मामले और ताजा लॉकडाउन की वजह से आर्थिक गतिविधियां काफी ज्यादा प्रभावित हुई हैं, जिन्हें भी तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। वहीं, बढ़ती महंगाई की चिंताओं के बीच, यूएस फेड ने अपनी लेटेस्ट बैठक में अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में 75 आधार अंकों की वृद्धि की (मार्च में 25 आधार अंक और मई में 50 आधार अंक की वृद्धि) की गई। कुल मिलाकर, अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने संचयी आधार पर 1.5 प्रतिशत अंक जुटाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी बैठकों में दरों में आक्रामक बढ़ोतरी जारी रहने की संभावना है, जिसकी वजह से खुद अमेरिका भी आर्थिक मंदी के भंवर में फंस सकता है। वहीं, भारत में, खुदरा महंगाई जून में लगातार छठे महीने भारतीय रिजर्व बैंक के 6 प्रतिशत के ऊपरी सहिष्णुता बैंड की वजह से अधिक रही है। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है और पिछले दिनों तेल की कीमतों में हुए इजाफे की वजह से भारत में महंगाई काफी बढ़ गई है।

दुनिया के कई केन्द्रीय बैंकों ने बढ़ाए ब्याज दर
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, ये हफ्ता दुनियाभर के केन्द्रीय बैंकों के लिए काफी व्यस्त रहा है, क्योंकि दुनिया भर में एक दर्जन से अधिक देशों के केन्द्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे हंगरी में 200 अंक,पाकिस्तान में 125 आधार अंक और अन्य आठ देशों में 50 या 100 के बीच अंक बढ़े हैं। वॉल स्ट्रीट पर मंदी के आह्वान जोर से गाए जा रहे हैं, लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था बनाने वाले कई घरों और व्यवसायों के लिए मंदी पहले से ही आ चुकी है। छोटे व्यवसाय के मालिकों, उपभोक्ताओं और अन्य लोगों के बीच की चिंताओं को तथाकथित मिसरी इंडेक्स द्वारा चित्रित किया गया है, जो बेरोजगारी और मुद्रास्फीति दर को दिखाते हैं। कोरोना वायरस के हर लहर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पटरी से उतानरे का काम किया। वहीं, साल 2022 की दूसरी छमाही को लेकर भी डर है, कि आपूर्ति तनाव प्रभावित हो सकती है और मजदूर वर्ग गंभीर प्रभावित होंगे।

क्या भारत को हो जाना चाहिए सतर्क?
ताजा आंकड़ों से पता चला है कि, भारत का व्यापार घाटा सिर्फ जून महीने में बढ़कर रिकॉर्ड 25.63 अरब डॉलर हो गया है, जो भारत सरकार के लिए बड़ा टेंशन है, क्योंकि भारत सरकार की कोशिश लगातार व्यापार घाटे को पाटने की रही है, ताकि देश का निर्यात बढ़ाने के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया जाए, लेकिन इस पहल में सरकार को बड़ा झटका लगा है। रिकॉर्ड व्यापार घाटे के पीछे की सबसे बड़ी वजह पेट्रोलियम, कोयले और सोने के आयात में भारी बढ़ोतरी को बताया जा रहा है, वहीं जून महीने में भारत के निर्यात में भारी गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे रुपये में और गिरावट आई है और बड़े करेंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) के बारे में चिंता बढ़ गई है। सोमवार को जारी भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है कि, जून में भारत का व्यापारिक निर्यात 16.8% बढ़कर 37.9 अरब डॉलर हो गया है, जो मई के मुकाबले 20.5% से कम था, जबकि भारत के आयात में 51% का उछाल आया है और जून महीने में भारत का आयात बढ़कर 63.58 अरब डॉलर हो गया है। वहीं, पिछले साल से तुलना करें, तो साल 2021 के जून महीने में भारत का व्यापार घाटा 9.61 अरब डॉलर था।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि, 1 जुलाई को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार 588.314 अरब डॉलर था। इसमें से विदेशी मुद्रा संपत्ति 524.745 अरब डॉलर थी, जबकि सोने में रखे गए भंडार का मूल्य 40.422 अरब डॉलर था। शेष राशि को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास स्पेशल ड्रॉविंग राइट्स और रिजर्व के रूप में रखा जाता है। भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले साल 3 सितंबर के बाद से लगातार कमी हो रही है और 3 सितंबर 2021 को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में 642.453 अरब डॉलर की राशि जमा थी, जिसमें अभी तक 55 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी है। वहीं, भारत के केंद्रीय बैंक ने फरवरी से अब तक मुद्रा की रक्षा के लिए 46 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं। लिहाजा, भारत को भी वक्त रहते सतर्क हो जाना चाहिए।

विदेशी कर्ज भी बढ़ा रही है भारत की परेशानी
भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले भारत पर विदेशी कर्ज में 47.1 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और इस वित्तीय वर्ष में भारत पर कुल विदेशी कर्ज बढ़कर 620.7 अरब डॉलर हो गया है। हालांकि, पिछले वित्तीय वर्ष से तुलना करें, तो विदेशी कर्ज हमारी कुल जीडीपी का 19.9 प्रतिशत रह गया था, जो उससे पिछले वित्त वर्ष यानि 2020-21 में 21.2 प्रतिशत था। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के ऊपर दीर्घकालिक कर्ज (मूल परिपक्वता एक साल से ज्यादा) 499.1 अरब डॉलर हो गया है, जो मार्च 2021 की तुलना में 26.5 अरब डॉलर ज्यादा है। जबकि, इस वित्तीय वर्ष में भारत पर अल्पकालिक कर्ज में 19.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो एक साल पहले 17.6 प्रतिशत था। लेकिन, अल्पकालिक कर्ज ने ही भारत सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी है, क्योंकि भारत को इस साल ही अल्पकालिक ऋण का भुगतान करना है।












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