'हमला हुआ तो समय नहीं मिलेगा', BrahMos Missile से Pakistan के छूटे पसीने! CISS की रिपोर्ट में साफ दिखा डर
BrahMos Threat Pakistan: भारत के ब्रह्मोस मिसाइल प्रोग्राम की तेजी से बढ़ती क्षमता ने पाकिस्तान में नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्ट्रैटेजिक स्टडीज (CISS) ने एक नई रिपोर्ट में कहा है कि भारत और रूस के बीच बढ़ता मिसाइल को-ऑपरेशन साउथ एशिया के लिए ठीक नहीं है। खासतौर पर BrahMos-NG, भविष्य की BrahMos-II हाइपरसोनिक मिसाइल और 800 किलोमीटर रेंज वाले संभावित नए वर्जन को लेकर पाकिस्तान के रणनीतिक विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं। जानेंगे क्या है पूरा मामला।
क्यों खास है ब्रह्मोस?
ब्रह्मोस मिसाइल पहले ही दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। यह भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च की जा सकने वाली यह मिसाइल भारत की डिफेंस स्ट्रेटजी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि अब भारत केवल मौजूदा ब्रह्मोस तक सीमित नहीं है। नई पीढ़ी की मिसाइलों पर तेजी से काम चल रहा है, जिससे इसकी मारक क्षमता और ऑपरेशनल लचीलापन दोनों बढ़ने वाले हैं।

BrahMos-NG क्या है और क्यों है खास?
सबसे ज्यादा चर्चा BrahMos-NG यानी नेक्स्ट जेनरेशन ब्रह्मोस को लेकर हो रही है। यह मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में हल्की और अधिक कॉम्पैक्ट होगी। इसके छोटे आकार और कम वजन की वजह से इसे ज्यादा लड़ाकू विमानों पर तैनात किया जा सकेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, BrahMos-NG को भारतीय वायुसेना के स्वदेशी Tejas Mk1A और भविष्य के अन्य फाइटर जेट्स के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि एक विमान एक साथ कई मिसाइलें लेकर उड़ान भर सकेगा। इससे भारतीय वायुसेना की आक्रमण क्षमता और बढ़ सकती है।
किस बात से ज्यादा बिलबिला रहा पाक?
पाकिस्तानी थिंक टैंक की सबसे बड़ी चिंता BrahMos-II को लेकर है। यह भारत और रूस के सहयोग से विकसित की जा रही हाइपरसोनिक मिसाइल है। हाइपरसोनिक हथियारों की खासियत यह होती है कि वे मौजूदा सुपरसोनिक मिसाइलों से कहीं अधिक गति से उड़ान भरते हैं। पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतनी हाई स्पीड टारगेट तक पहुंचने का समय काफी कम कर सकती है। इसके साथ ही मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए ऐसी मिसाइलों को रोकना भी बेहद मुश्किल हो सकता है। यही कारण है कि हाइपरसोनिक तकनीक को भविष्य के कॉम्प्टीशन के लिए अहम माना जा रहा है।
CISS ने क्यों जताई क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता?
CISS का कहना है कि ज्यादा गति, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और ऑपरेशनल लचीलेपन का मेल दक्षिण एशिया की सिक्योरिटी एनालिसिस को प्रभावित कर सकता है। थिंक टैंक के मुताबिक, अगर इस तरह की हाईटेक प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमताएं तेजी से बढ़ती हैं, तो किसी भी संकट या सैन्य तनाव के दौरान राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय बचेगा। आसान भाषा में कहें तो- हमला हुआ तो टाइम कम बचेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य के संघर्षों में नेताओं को खतरे का आकलन और जवाबी कार्रवाई पहले की तुलना में कहीं तेजी से करनी पड़ सकती है।
800 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन भी चर्चा में
रिपोर्ट में उन खबरों का भी जिक्र किया गया है जिनमें ब्रह्मोस के 800 किलोमीटर तक मार करने वाले वर्जन की बात कही गई है। CISS का मानना है कि लंबी दूरी की ऐसी मिसाइलें भारत को हाई-वेल्यूड वाले टारगेट पर अधिक सटीक हमले करने की क्षमता दे सकती हैं। थिंक टैंक के मुताबिक, बढ़ती रेंज और बेहतर सर्वाइवेबिलिटी भविष्य में दक्षिण एशिया की सैन्य योजनाओं और रणनीतिक सोच को प्रभावित कर सकती है।
दुनिया भर में चल रही है हाइपरसोनिक हथियारों पर बहस
पाकिस्तान की यह चिंता केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। दुनिया भर में सैन्य विशेषज्ञ हाइपरसोनिक और हाई-स्पीड प्रिसिजन स्ट्राइक हथियारों के प्रभाव पर चर्चा कर रहे हैं। माना जाता है कि ऐसे हथियार चेतावनी का समय कम कर देते हैं, मौजूदा रक्षा प्रणालियों को चुनौती देते हैं और क्राइसिस मैनेजमेंट के पारंपरिक तरीकों को बदल सकते हैं। इसी वजह से पाकिस्तान को डर सता रहा है।
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