Britain PM: 2016 के एक फैसले ने कैसे हिलाई ब्रिटेन की सत्ता? 10 साल में बदले 7 PM, कौन रहा सबसे कम दिन?

Britain PM: ब्रिटेन की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। बीते दिन प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अपने पद से इस्तीफा दे चुके है। इसके साथ ही लंदन स्थित 10 डाउनिंग स्ट्रीट को जल्द ही नया प्रधानमंत्री मिलने वाला है। स्टार्मर के इस्तीफे ने न सिर्फ उनके राजनीतिक सफर पर विराम लगाया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि ब्रिटेन पिछले कई सालों से गहरे राजनीतिक संकट से जूझ रहा है।

साल 2016 में हुए ब्रेक्सिट जनमत संग्रह के बाद से अब तक केवल दस सालों में ब्रिटेन सातवें प्रधानमंत्री की ओर बढ़ रहा है। इतना तेज सत्ता परिवर्तन ब्रिटिश राजनीति में पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

Britain PM

कभी स्थिर राजनीति की मिसाल था ब्रिटेन

एक समय था जब ब्रिटेन की राजनीति स्थिरता की पहचान मानी जाती थी। पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर और टोनी ब्लेयर जैसे नेताओं ने कई सालों तक देश का नेतृत्व किया और लंबा कार्यकाल पूरा किया। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। पिछले चार सालों के भीतर ब्रिटेन पांचवें प्रधानमंत्री का स्वागत करने की स्थिति में पहुंच गया है। इससे साफ है कि देश के भीतर नेतृत्व का संकट लगातार गहराता जा रहा है और राजनीतिक स्थिरता कमजोर पड़ती जा रही है।

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पार्टी का भरोसा खोने के बाद स्टार्मर ने छोड़ी कुर्सी

डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर मीडिया को संबोधित करते हुए कीर स्टार्मर ने स्वीकार किया कि वह अपनी ही लेबर पार्टी के भीतर जरूरी समर्थन खो चुके हैं। हालांकि 2024 के आम चुनाव में लेबर पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की थी और भारी बहुमत हासिल किया था, लेकिन सरकार बनने के बाद स्टार्मर अपनी लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ बनाए रखने में सफल नहीं रहे। उनकी मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब उनके रणनीतिक सलाहकार पीटर मैंडेलसन का नाम विवादों में आने लगा। दोषी अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साथ उनके पुराने संबंधों को लेकर विपक्ष और मीडिया ने लगातार सवाल उठाए। इससे लेबर पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा।

एंडी बर्नहैम बन सकते हैं ब्रिटेन के अगले प्रधानमंत्री

राजनीतिक उथल-पुथल के बीच 56 साल के एंडी बर्नहैम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में सामने आए हैं। ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर बर्नहैम ने हाल ही में मेकरफील्ड उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी की है। पार्टी के भीतर उन्हें लगातार समर्थन मिल रहा है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर उनके पक्ष में बयान दिए हैं। यही वजह है कि उन्हें अगला लेबर नेता और संभावित प्रधानमंत्री माना जा रहा है।

ब्रेक्सिट से शुरू हुआ था राजनीतिक भूचाल

ब्रिटेन के मौजूदा राजनीतिक संकट की शुरुआत 23 जून 2016 को हुए ब्रेक्सिट जनमत संग्रह से मानी जाती है। इसी दिन ब्रिटिश जनता ने यूरोपीय संघ (EU) से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया था। उस फैसले के बाद देश में लगातार राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली। सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद थेरेसा मे को अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ा और अंततः उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा।

एक-एक कर कई प्रधानमंत्री सत्ता से बाहर हुए

थेरेसा मे के बाद बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री बने, लेकिन तमाम नैतिक और राजनीतिक घोटालों के कारण उन्हें भी पद छोड़ना पड़ा। उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं लिज ट्रस की आर्थिक नीतियां बाजारों को पसंद नहीं आईं। नतीजा यह हुआ कि उनका कार्यकाल केवल 49 दिनों में समाप्त हो गया, जो ब्रिटिश इतिहास के सबसे छोटे प्रधानमंत्री कार्यकालों में से एक है। इसके बाद भारतवंशी नेता ऋषि सुनक प्रधानमंत्री बने। उन्होंने देश में स्थिरता लाने की कोशिश की, लेकिन 2024 के आम चुनाव में अपनी पार्टी की हार नहीं रोक सके। अब कीर स्टार्मर भी सत्ता से विदा हो रहे हैं। इससे साफ है कि ब्रेक्सिट के बाद शुरू हुई राजनीतिक अस्थिरता अब तक खत्म नहीं हुई है।

क्या ब्रिटेन फिर से यूरोपीय संघ में लौटना चाहता है?

ब्रेक्सिट के लगभग दस साल बाद अब ब्रिटेन में लोगों की सोच बदलती दिखाई दे रही है। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार करीब 52 प्रतिशत ब्रिटिश नागरिकों का मानना है कि यूरोपीय संघ छोड़ना एक गलती थी। इन लोगों का कहना है कि ब्रिटेन को दोबारा यूरोपीय संघ में शामिल होने पर विचार करना चाहिए। वहीं लगभग 33 प्रतिशत लोग इस विचार के खिलाफ हैं और ब्रेक्सिट के फैसले का समर्थन करते हैं। हाल ही में लंदन की सड़कों पर हजारों लोगों ने यूरोपीय संघ के झंडों के साथ मार्च निकालकर EU में वापसी की मांग भी उठाई थी।

इमिग्रेशन और अर्थव्यवस्था अब भी सबसे बड़ी चुनौती

ब्रिटेन के सामने आज भी दो सबसे बड़े मुद्दे हैं- अर्थव्यवस्था और इमिग्रेशन। साल 2023 में देश में कुल शुद्ध प्रवासन (Net Migration) का आंकड़ा 9 लाख से अधिक पहुंच गया था। हालांकि अगले साल यह संख्या घटकर 1.71 लाख पर आ गई, लेकिन प्रवासन का मुद्दा अभी भी राजनीतिक बहस के केंद्र में बना हुआ है। बड़ी संख्या में लोग चाहते हैं कि सरकार इमिग्रेशन पर और सख्ती से कंट्रोल करें। दूसरी ओर आर्थिक विकास की रफ्तार कमजोर बनी हुई है, जिससे रोजगार, निवेश और सरकारी खर्चों पर भी दबाव बढ़ रहा है।

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क्या नया प्रधानमंत्री ला पाएगा स्थिरता?

कीर स्टार्मर का इस्तीफा केवल एक प्रधानमंत्री का पद छोड़ना नहीं है। यह उस गहरे संकट का प्रतीक है जिससे ब्रिटेन पिछले कई सालों से गुजर रहा है। ब्रेक्सिट का असर आज भी देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर साफ दिखाई देता है। कमजोर आर्थिक प्रदर्शन, दबाव में सार्वजनिक सेवाएं, बढ़ती राजनीतिक ध्रुवीकरण और बदलता सामाजिक माहौल नए प्रधानमंत्री के सामने बड़ी चुनौतियां बनकर खड़े हैं। अब सवाल यह है कि डाउनिंग स्ट्रीट का अगला निवासी देश को राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता दे पाएगा या फिर ब्रिटेन में नेतृत्व परिवर्तन का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। इसका जवाब आने वाले महीनों में सामने आएगा।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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