Surat Couple Euthanasia: परिवार में 9 की मौत, अब इच्छा-मृत्यु मांग रहे माता-पिता, BJP नेता का बड़ा रोल?
Surat Couple Euthanasia: सूरत में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। 73 वर्षीय श्यामभाई कपूरजी गहलोत और उनकी 68 वर्षीय पत्नी मधुबेन गहलोत ने इच्छामृत्यु की मांग की है। परिवार के 9 लोगों की मौत के बाद श्यामभाई पूरी तरह टूट चके हैं।
सूरत नगर निगम (SMC) के अधिकारियों और स्थानीय राजनीतिक हलकों द्वारा कथित उत्पीड़न, बार-बार दुकानों की सीलिंग और लंबे कानूनी संघर्ष ने उन्हें आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया है। उनका कहना है कि हमें जीने की कोई इच्छा नहीं बची है। अगर न्याय नहीं मिल सकता, तो मौत ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने जिला कलेक्टर तेजस परमार (IAS) को सौंपे ज्ञापन में लिखा है। साथ ही BJP नेता पर गंभीर आरोप लगएा हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्यों मांग रहे इच्छा-मृत्यु?

Surat Couple Euthanasia Reason: 7 नवंबर 2016 का वह हादसा
श्यामभाई कपूरजी गहलोत (Shyambhai Kapurji Gehlot) और मधुबेन गहलोत (Madhuben Gehlot) राजस्थान के पाली से सूरत आए थे। यहां उन्होंने लगभग 50 साल बिताए। पांडेसरा के जलाराम नगर में उनका घर है। दंपति का इकलौता बेटा, बहू, पोते-पोतियां, बेटी, दामाद और एक अन्य रिश्तेदार- कुल नौ सदस्य 7 नवंबर 2016 को एक सड़क दुर्घटना में जान गंवा बैठे। एक ही झटके में पूरा परिवार चला गया। बच गए सिर्फ श्यामभाई और मधुबेन। तब से वे दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए हैं। कोई संतान नहीं, कोई सहारा नहीं। दुकानों से मिलने वाला किराया ही उनकी एकमात्र आय थी। इस घटना के बाद भावनात्मक रूप से टूटे दंपति ने जीवन को संभाला, लेकिन आर्थिक सुरक्षा का आखिरी सहारा भी अब छिनता जा रहा है।
संपत्ति विवाद की शुरुआत: 11 छोटी दुकानें सील, 5 साल की कानूनी लड़ाई के बाद राहत
2006 में दंपति ने रांचोदनगर, बामरोली क्षेत्र में 11 छोटी व्यावसायिक दुकानें खरीदीं। 2008 में यह क्षेत्र सूरत नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आ गया। दंपति का दावा है कि उन्होंने नियमित रूप से टैक्स चुकाया। 2021 में तत्कालीन कार्यकारी अभियंता ने बिना किसी पूर्व सूचना के इन दुकानों को सील कर दिया। कारण? कथित अग्नि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन। छोटी दुकानों पर बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स वाले नियम लागू करने की कोशिश की गई।
परिवार ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया। लगभग पांच साल की कानूनी लड़ाई लड़ी। अग्निशमन विभाग की रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि छोटी दुकानों पर बड़े प्रतिष्ठानों वाले सख्त प्रावधान लागू नहीं होते। कोर्ट ने राहत दी। 31 जनवरी 2026 को दुकानें दोबारा खुलीं। लेकिन राहत क्षणिक साबित हुई।
दोबारा सीलिंग और बढ़ता उत्पीड़न, BJP नेता से जुड़े
30 मई 2026 को, खुलने के महज कुछ महीनों बाद, दुकानों को फिर सील कर दिया गया। दंपति का आरोप है कि यह वर्तमान कार्यकारी अभियंता के निर्देश पर हुआ। कोई लिखित नोटिस, कोई स्पष्टीकरण, कोई औपचारिक कारण नहीं बताया गया। श्यामभाई का कहना है कि अधिकारियों ने उन्हें बार-बार एक स्थानीय भाजपा नेता से मिलने का दबाव डाला। संपत्ति पर कब्जे के प्रयास भी हुए। स्पष्टीकरण मांगने पर लिखित जवाब नहीं मिला। वर्षों की इस लड़ाई ने उन्हें थका दिया। ज्ञापन में उन्होंने लिखा कि लगातार हो रहे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न को अब और सहन नहीं किया जा सकता।
भारत में इच्छामृत्यु: कानूनी और नैतिक पहलू क्या?
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु (active euthanasia - दवा देकर मौत) अवैध है। हालांकि, निष्क्रिय इच्छामृत्यु (passive euthanasia - जीवन रक्षक उपचार हटाना) को सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के Common Cause मामले में मंजूरी दी थी। 2023 में दिशा-निर्देशों को और स्पष्ट किया गया।
दंपति सक्रिय इच्छामृत्यु मांग रहे हैं, जो फिलहाल कानूनी रूप से संभव नहीं है। फिर भी उनकी अपील ने चर्चा छेड़ दी है। क्या प्रशासनिक उत्पीड़न और न्याय की कमी वृद्धों को मौत की ओर धकेल रही है? गुजरात जैसे राज्यों में संपत्ति विवाद, निगम की कार्रवाइयां और छोटे व्यापारियों की दिक्कतें आम हैं। कई मामलों में बिना नोटिस सीलिंग, लंबी कानूनी लड़ाई और आर्थिक बर्बादी देखी गई है।
दाने-दाने को मोहताज पति-पत्नी
श्यामभाई कपूरजी गहलोत और मधुबेन गहलोत सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। दुकानों का किराया उनकी आय का आधार था। हादसे के बाद कोई अन्य आय स्रोत नहीं बचा। वे कहते हैं कि दुकानों की आय उनके जीवन-यापन के लिए पर्याप्त थी। अब वह भी बंद। कानूनी खर्च, मानसिक तनाव और अकेलापन, सब कुछ ने उन्हें हताशा की अंतिम सीमा पर पहुंचा दिया है। जिला कलेक्टर तेजस परमार को सौंपे ज्ञापन में उन्होंने विस्तार से अपनी पीड़ा बताई है। प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स में यह खबर तेजी से फैल रही है।
श्यामभाई और मधुबेन की जिंदगी अब सिर्फ दो बुजुर्गों की कहानी नहीं रही। यह सिस्टम की विफलता की कहानी है, जहां एक परिवार पहले भावनात्मक रूप से टूटा, फिर आर्थिक रूप से बर्बाद हुआ और अब मौत की गुहार लगा रहा है।












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