Bangladesh Election Hindu Candidate: बांग्लादेश चुनाव में कितने हिंदू उम्मीदवार? चौंकाने वाले आंकड़े
Bangladesh General Election 2026: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले माहौल काफी तनावपूर्ण है। 13वें जातीय संसद चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जिसमें कुल 1,981 उम्मीदवार मैदान में हैं। लेकिन इस चुनावी चमक-धमक के बीच अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
पिछले दो महीनों में 10 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या और लगातार होते हमलों ने डर पैदा कर दिया है। चुनाव में अल्पसंख्यकों की भागीदारी भी बेहद सीमित है, जहां 298 सीटों पर मात्र 80 अल्पसंख्यक उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

Hindu Candidate In Bangladesh Election: चुनावी मैदान में अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार 22 राजनीतिक दलों ने 68 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि 12 निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। कुल उम्मीदवारों में 10 महिलाएं भी शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि कम्युनिस्ट पार्टी (CPB) ने सबसे ज्यादा 17 अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे हैं। वहीं, पहली बार जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टी ने भी एक हिंदू उम्मीदवार, कृष्णा नंदी को टिकट दिया है। हालांकि, अवामी लीग के बाहर होने से चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।
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Hindus in Bangladesh: हिंदुओं पर हमले और सुरक्षा का डर
चुनाव की तारीख नजदीक आते ही बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों का पैटर्न फिर से उभर आया है। 'हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल' ने आरोप लगाया है कि ये हमले सोची-समझी साजिश के तहत हो रहे हैं। मनिंद्र कुमार का कहना है कि पुलिस और प्रशासन इन घटनाओं को रोकने में नाकाम रहा है। हालांकि सरकार इन्हें निजी रंजिश बताकर टाल रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय खुद को डरा हुआ और असुरक्षित महसूस कर रहा है।
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केवल वोट बैंक बनकर रह गया समुदाय?
अल्पसंख्यक नेताओं का मानना है कि केवल नाममात्र की भागीदारी से उनके हालात नहीं सुधरेंगे। निर्मोल रोजारियो के अनुसार, जब तक अल्पसंख्यकों को राजनीति में फैसले लेने की ताकत नहीं मिलेगी, तब तक उनके अधिकारों की रक्षा नामुमकिन है। राजनीतिक दल उन्हें केवल 'वोटर' के तौर पर देखते हैं, न कि असली 'लीडर' के रूप में। इस बार के चुनाव में 298 क्षेत्रों में सिर्फ 80 कैंडिडेट होना यह दर्शाता है कि मुख्यधारा की राजनीति में उनकी पहुंच अभी भी बहुत कम है।
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चुनावी रैलियां और राजनीतिक साजिश
चुनाव प्रचार के दौरान बीएनपी (BNP) के तारिक रहमान और जमात के शफीकुर रहमान ने पुरानी हिंसा और 'वोट चोरी' का मुद्दा उठाकर माहौल को गरमा दिया है। तारिक रहमान ने धार्मिक आधार पर वोट मांगने वाली पार्टियों की आलोचना की, तो जमात नेता ने 'फासीवाद' की वापसी की चेतावनी दी। इन बड़े नेताओं के बीच चल रही राजनीतिक जंग में अल्पसंख्यक समुदाय पिस रहा है। वे डरे हुए हैं कि चुनाव के दिन या उसके बाद हिंसा का शिकार कहीं उन्हें ही न होना पड़े।












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