Bangladesh Election 2026 में भारत विरोधी एजेंडा चलाकर ढाका पर कब्जा चाहते हैं पाकिस्तान-चीन, क्या करेगा भारत?
Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में 12 फरवरी को प्रधानमंत्री पद के लिए मतदान होगा। जिसमें जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी में सीधी टक्कर है। जबकि शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को बैन किया गया है, इसलिए उनके नेता इस बार चुनाव में कम ही देखने को मिलेंगे। BNP की कमान खालिदा जिया के गुजरने के बाद उनके बेटे तारिक रहमान संभाले हुए हैं और वही पार्टी से पीएम पद का चेहरा भी हैं।
दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी का चेहरा अमीर शफीकुर रहमान और पार्टी के महासचिव मिया गुलाम परवर हैं। इसके अलावा इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश (IAB) जैसे छोटे दल भी इस बार चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। आइए जानते हैं इस चुनाव में भारत को लेकर कौन सी पार्टी और नेता क्या कह रहे हैं।

भारत की पसंद: अवामी लीग या बीएनपी?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर JIB चुनाव जीतती है तो भारत राजनीतिक और सुरक्षा दोनों नजरियों से चिंतित होगा। वहीं, बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार भारत के लिए अपेक्षाकृत "आरामदायक" होगी। उन्होंने बताया कि आज की बीएनपी का जमात के साथ गठबंधन नहीं है और पार्टी ने भारत के साथ संवाद की इच्छा भी जाहिर की है।
भारत टूटे रिश्ते जोड़ने को तैयार
एक्सपर्ट का कहना है कि भारत बांग्लादेश के साथ टूटे रिश्तों को फिर से जोड़ने के लिए तैयार रहेगा। हालांकि भारत चाहता था कि अवामी लीग सत्ता में बनी रहे, लेकिन अब वह यह भी मानता है कि अवामी लीग फिलहाल एक प्रभावी राजनीतिक ताकत नहीं रहेगी। इसलिए भारत बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार को स्वीकार करने और उसके साथ काम करने के लिए तैयार है।
भारत दोनों पक्षों से संपर्क में
चुनावी सर्वे बताते हैं कि जमात और बीएनपी के बीच कड़ी टक्कर है। इसी वजह से भारत दोनों से संपर्क बनाए हुए है। इस महीने जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने बताया कि दिसंबर में एक भारतीय राजनयिक उनसे मिले थे। वहीं, ढाका में भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने 10 जनवरी को बीएनपी नेता तारिक रहमान से मुलाकात की।
पाकिस्तान-बांग्लादेश रिश्तों में आई गर्माहट
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों में तेजी से सुधार हुआ है। 2024 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अंतरिम नेता यूनुस से दो बार मुलाकात की।सितंबर 2024 में पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने ढाका का दौरा किया, जिसका मकसद 1971 के बाद से टूटे रिश्तों को "पुनर्जीवित" करना था।
भारत क्या चाहता है?
विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश के आगामी चुनाव भारत के लिए बेहद अहम हैं। दक्षिण एशिया की राजनीति में यह चुनाव सिर्फ ढाका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर नई दिल्ली, इस्लामाबाद और बीजिंग तक जाएगा।
अमेरिकी विश्लेषक माइकल कुगेलमैन का कहना है कि भारत की उम्मीद है कि चुनाव के बाद ऐसी सरकार बने, जो भारत के साथ संवाद के लिए तैयार हो और उन ताकतों के प्रभाव में न हो, जो भारत को अपने हितों के लिए खतरा मानती हैं। उनके मुताबिक, भारत चाहता है कि बांग्लादेश में स्थिर और व्यावहारिक नेतृत्व आए, जो दोनों देशों के संबंधों को वापस से पटरी पर ला सके।
'भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता'
इंडिपेंडेंट यूनिवर्सिटी के विश्लेषक रिजवान का कहना है कि चाहे कोई भी सरकार बने, भारत से बिगड़ते रिश्तों को नजरअंदाज करना लगभग नामुमकिन होगा। भले ही सरकार में JIB या अन्य इस्लामी दल शामिल हों, फिर भी भारत की भूमिका अहम बनी रहेगी।
रिजवान के मुताबिक, भारत और बांग्लादेश के बीच गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों, व्यापार, खाद्य सुरक्षा, सांस्कृतिक रिश्तों और मानवीय संबंधों जैसे कई साझा हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोई भी सरकार भारत को अलग करके आगे नहीं बढ़ सकती।
चुनाव के पहले आदर्शवाद, चुनाव के बाद प्रैक्टिकल
चुनाव के दौरान वोट पाने के लिए भारत के खिलाफ तीखी और भावनात्मक बयानबाज़ी करना आसान होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही दल एक ताकतवर और प्रभावशाली पड़ोसी से व्यवहार करते समय अपने लोकलुभावन रुख को बदल लेते हैं। उनके मुताबिक, सत्ता की जिम्मेदारी आते ही आदर्शवाद की जगह व्यवहारिक राजनीति हावी हो जाती है।
'पड़ोस पहले' नीति और भारत का नजरिया
भारत की विदेश नीति लंबे समय से "पड़ोस पहले" सिद्धांत पर आधारित रही है। इसका मतलब है कि भारत अपनी सुरक्षा और स्थिरता के लिए अपने पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहता है। इसी नीति के तहत भारतीय नीति-निर्माताओं ने बार-बार जोर दिया है कि बांग्लादेश के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध पूरे उपमहाद्वीप के लिए जरूरी हैं।
जयशंकर का बांग्लादेश को संदेश
पिछले महीने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बांग्लादेश को उसके आगामी चुनावों के लिए शुभकामनाएं दी थीं। उन्होंने कहा था कि भारत को उम्मीद है कि हालात शांत होने के बाद इस क्षेत्र में पड़ोस की भावना और मजबूत होगी। जनवरी की शुरुआत में जयशंकर पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री और बीएनपी नेता खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में ढाका भी पहुंचे थे।
खालिदा जिया के परिवार से संपर्क
जयशंकर ने सोशल मीडिया पर बताया कि उन्होंने भारत की ओर से खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान को संवेदनाएं दीं। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्हें भरोसा है कि बेगम खालिदा जिया की सोच और मूल्य भारत-बांग्लादेश साझेदारी के विकास का मार्गदर्शन करेंगे। यह बयान भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति को दर्शाता है।
1971 का इतिहास और आज की सच्चाई
1947 में भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान दो हिस्सों में बना था, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान आज का बांग्लादेश था। 1971 में भारत के समर्थन से बांग्लादेश ने स्वतंत्रता हासिल की।इस दौरान पाकिस्तानी सेना पर अत्याचार, लाखों मौतों और करीब 2 लाख महिलाओं के कथित बलात्कार के आरोप लगे। बांग्लादेश आज भी पाकिस्तान से औपचारिक माफी की मांग करता है।
यूनुस सरकार और पाकिस्तान की नई रणनीतिविश्लेषकों के अनुसार, यूनुस की अंतरिम सरकार पाकिस्तान के साथ आर्थिक रिश्ते बढ़ाने की कोशिश कर रही है। फरवरी में दोनों देशों ने 1971 के बाद पहली बार सीधा व्यापार शुरू किया।पिछले हफ्ते 14 साल बाद सीधी उड़ानें भी शुरू की गईं, जिन्हें 2012 में सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया था।
पाकिस्तान का असली मकसद क्या है?
रिजवान का कहना है कि पाकिस्तान मुख्य रूप से रक्षा और सांस्कृतिक कूटनीति के जरिए बांग्लादेश के साथ रिश्ते मजबूत करना चाहता है। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह बड़े निवेश दे सके। इस रणनीति का मकसद भारत की पूर्वी सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाना है। इसलिए वह अपनी फेवरट पार्टी जमात ए इस्लामी को सत्ता में देखना चाहता है।
भारत-विरोधी भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश
एक्सपर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान बांग्लादेश में बढ़ती भारत-विरोधी और इस्लामी भावनाओं का फायदा उठाकर 1971 की जनसंहार वाली विरासत को पीछे धकेलना चाहता है। साथ ही, वह बांग्लादेश-चीन-पाकिस्तान त्रिपक्षीय व्यवस्था का सबसे बड़ा समर्थक रहा है, हालांकि ढाका ने अब तक इस पर आपत्तियां जताई हैं।
पाकिस्तान किसे सत्ता में देखना चाहता है?
पाकिस्तान दोनों प्रमुख दलों के सत्ता में आने से संतुष्ट रहेगा ऐसा कहना मुश्किल है। लेकिन पाकिस्तान के संबंध जमात ए इस्लामी के दखल के बाद सुधरे हैं। साथ ही पाकिस्तान की नीति जमात ए इस्लामी से काफी हद तक मेल खाती है। लिहाजा जमात की जीत उसे सबसे ज्यादा पसंद आएगी। अगर बीएनपी सत्ता में आती है, तो भी पाकिस्तान उससे तालमेल रखेगा, लेकिन वह यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि बीएनपी भारत के साथ बहुत नजदीकी न बढ़ाए।
बीएनपी बनाम जमात: विदेश नीति का फर्क
अगर जमात सत्ता में आती है, तो वह इस्लामाबाद से करीबी रिश्तों के बावजूद नई दिल्ली से भी टकराव से बचेगी। वहीं, बीएनपी की नीति साफ है-"पहले बांग्लादेश"। इसका मतलब है किसी एक विदेशी शक्ति के साथ झुकाव के बजाय संतुलित विदेश नीति अपनाना।
चीन-बांग्लादेश रिश्ते क्यों मजबूत हैं?
दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। बांग्लादेश के साथ उसके सैन्य और आर्थिक रिश्ते मजबूत होते जा रहे हैं। हसीना के शासनकाल में कई आर्थिक समझौते हुए और यूनुस सरकार के तहत भी चीन से करीब 2.1 अरब डॉलर का इन्वेस्टमेंट, लोन और ग्रांट मिला है।
चीन किसे समर्थन देगा?
चीन का कोई स्पष्ट पसंदीदा नहीं है। वह चुनाव जीतने वाली सरकार को समर्थन देगा और बाकी दलों से भी संवाद बनाए रखेगा। चीन की सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि बांग्लादेश में बनने वाली सरकार पर अमेरिकी प्रभाव न बढ़े।
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