क्या जासूसी ऑपरेशंस ने भारत सरकार को फंसाया? ऑस्ट्रेलियाई-US रिपोर्टों के बाद दिल्ली में बेचैनी
Indian Spy News: भारत की खुफिया अधिकारियों पर आरोप लगाए गये हैं, कि उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में जाकर ऑपरेशंस को अंजाम दिए हैं और ऑस्ट्रेलिया और अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में किए गये इसके खुलासे ने अचंभे में डाल दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया रिपोर्ट्स में भारतीय जासूसी अभियानों पर किए गये खुलासे ने नई दिल्ली में बेचैनी भर दी है, क्योंकि भारत के पश्चिमी देशों के साथ मजबूत स्ट्रैटजिक संबंध हैं और इन खुलासों ने उसमें खतरा आने की आशंका है।

नई दिल्ली की बेचैनी इस बात को लेकर है, कि खुफिया अभियानों के कथित खुलासे के बाद पश्चिमी भागीदारों से 'ठोस प्रतिक्रिया' मिल सकती है।
ऑस्ट्रेलिया में जासूसी नेटवर्क चलाने का दावा
मंगलवार को, ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (एबीसी) ने दावा किया है, कि "संवेदनशील डिफेंस प्रोजेक्ट और हवाई अड्डे की सुरक्षा के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया के व्यापार संबंधों पर वर्गीकृत जानकारी चुराने की कोशिश करते हुए पकड़े जाने के बाद, भारतीय जासूसों को ऑस्ट्रेलिया से बाहर निकाल दिया गया था।"
ऑस्ट्रेलियन और सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड ने दावा किया है, कि इस घटना के बाद दो भारतीय "जासूसों" को ऑस्ट्रेलिया छोड़ने के लिए कहा गया था।
एबीसी ने बताया है, कि "ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा खुफिया संगठन (ASIO) ने साल 2020 में जासूसी नेटवर्क का भांडाफोड़ किया था दावा किया था, कि विदेशी 'जासूसों के घोंसले' ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों पर नजर रखने के साथ साथ ऑस्ट्रेलिया के पूर्व और मौजूदा नेताओं के साथ भी घनिष्ठ संबंध विकसित कर रहा है।
जबकि, ठीक एक दिन पहले सोमवार को अमेरिका के वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में खालिस्तान समर्थक सिख अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश में शामिल खुफिया अधिकारी की पहचान जाहिर करने का दावा किया था और रिपोर्ट में उस जासूस के भारतीय खुफिया एजेंसी और भारत के शीर्ष अधिकारियों के साथ संबंध स्थापित करने की कोशिश की थी।
वाशिंगटन पोस्ट ने पन्नून की हत्या की साजिश रचने वाले भारतीय अधिकारी का नाम विक्रम यादव बताया था और दावा किया था, कि इस ऑपरेशन की जानकारी भारत के नेशनल सिक्योटिरी एडवाइजर अजित डोवाल को भी हो सकती है, हालांकि उसने कहा, कि इसके अभी तक कोई सबूत नहीं मिले हैं।
जासूसी रिपोर्ट्स पर भारत ने क्या कहा?
भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट पर कहा, कि रिपोर्ट एक "गंभीर मामले" पर "अनुचित और निराधार आरोप" लगाती है। उन्होंने संगठित अपराधियों, आतंकवादियों और अन्य लोगों के नेटवर्क पर अमेरिकी सरकार की तरफ से साझा की गई सुरक्षा चिंताओं की जांच के लिए उच्च स्तरीय पैनल की तरफ से "चल रही जांच" की ओर भी इशारा किया।
एबीसी के अनुसार, ASIO के डायरेक्टर जनरल माइक बर्गेस ने 2021 में अपने वार्षिक खतरे के आकलन में जासूसी नेटवर्क का "संकेत" दिया था, लेकिन उन्होंने यह खुलासा नहीं किया, कि इसके पीछे कथित तौर पर कौन सा देश है। एबीसी की रिपोर्ट के मुकाबिक, बर्गेस ने कथित तौर पर विस्तार से बताया था, कि कैसे जासूसों ने ऑस्ट्रेलियाई सरकार के सिक्योरिटी क्लीयरेंस अधिकारी की भर्ती की थी, जिसकी पहुंच "डिफेंस टेक्नोलॉजी के संवेदनशील जानकारी" तक थी।
भारत सरकार ने अभी तक एबीसी के खुलासे पर प्रतिक्रिया नहीं दी है, वहीं ऑस्ट्रेलियाई सरकार की तरफ से भी अभी तक एबीसी के इस सनसनीखेज खुलासे को उतना महत्व नहीं दिया जा रहा है। ऐसा लगता है, कि ऑस्ट्रेलिया सरकार भी चाहती है, कि इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर भारत से 'तूतू-मैंमैं' ना हो।
ABC की रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रिया
ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री पेनी वोंग से जब इस रिपोर्ट के बारे में पूछा गया, कि भारत सरकार "जासूसों के घोंसले" के पीछे है, तो उन्होंने बुधवार को कहा, कि "आपको मेरा जवाब सुनकर आश्चर्य नहीं होगा, कि हम खुफिया मामलों पर टिप्पणी नहीं करते हैं।"
उन्होंने आगे कहा, कि "लेकिन, लोकतंत्र के बारे में सिद्धांत के स्तर पर, मुझे लगता है कि आपने मुझे और हमारे दूसरे मंत्रियों को कई मौकों पर हमारे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के महत्व पर जोर देते हुए सुना होगा। हमने यह सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया है, कि हम अपने लोकतंत्र की लचीलापन बनाए रखें, जिसमें किसी भी विदेशी हस्तक्षेप का सामना करना शामिल है और उससे निपटने के लिए हमारे पास कानून हैं।"
इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा, कि "हम ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को गहराई से महत्व देते हैं। यह एक ताकत है, और हम अपने लोकतंत्र में लोगों की निरंतर भागीदारी का स्वागत करते हैं।"
ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री ने अपने बयान में एक बार भी भारत का जिक्र नहीं किया और ना ही मामले को सनसनीखेज बनाने की कोशिश की, जिससे यही पता चलता है, कि ऑस्ट्रेलिया नहीं चाहता है, कि कनाडा के भारत के साथ जिस तरह के तनावपूर्ण संबंध हुए हैं, वो ऑस्ट्रेलिया के साथ हो और एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ऑस्ट्रेलिया ने गंभीर डिप्लोमेसी का सबूत दिया है और हो सकता है, कि ऑस्ट्रेलिया सरकार ने 2020 में अंदरूनी तौर पर भारत सरकार से बात की होगी और मामले को सुलझा लिया होगा। यही वजह है, कि उस घटना के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया गये, तो उनका स्वागत किसी रॉकस्टार की तरह किया गया।
वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है, कि साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक (जिसमें विदेश और गृह मंत्रालय हैं) में यह भावना साझा की गई है, कि पश्चिमी एजेंसियां क्वाड समूह में एक प्रमुख भागीदार भारत के साथ अब "एक लाल रेखा खींचने" की कोशिश कर रही हैं।
ये तमाम रिपोर्ट्स उस वक्त बाहर आ रही हैं, जब भारत में चुनाव चल रहे हैं, जो नई दिल्ली के इस विश्वास को बल देता है, कि उसके पश्चिमी साझेदार उत्सुक हैं, कि चुनाव के बाद बनने वाली अगली सरकार विदेशों में अपने कार्यों के बारे में ज्यादा "संवेदनशील" होगी।
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