Trump Shocks UN: मोदी-यूएन को ट्रंप का तगड़ा झटका, 66 संगठनों को कहा- 'बाय-बाय', बनाएंगे अपना Metaverse?
America: ट्रम्प प्रशासन ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को अलग करने का बड़ा फैसला लिया है। इनमें यूनाइटेड नेशन्स की यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड और इंटरनेशनल क्लाइमेट फोरम से जुड़ी संस्थाएं भी शामिल हैं। यह कदम अमेरिका की वैश्विक भूमिका में बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है, साथ ही बताता है कि ट्रंप का अब यूएन से भी मोह भंग होने लगा है।
फंडिंग भी होगी बंद
बुधवार, 7 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इस आदेश के तहत 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, एजेंसियों और आयोगों के लिए अमेरिकी समर्थन को निलंबित कर दिया गया है। यह फैसला उन निर्देशों के बाद लिया गया, जिनमें ट्रम्प प्रशासन ने सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों, खासकर यूनाइटेड नेशन्स से जुड़े निकायों में अमेरिका की भागीदारी और फंडिंग की समीक्षा करने को कहा था।

यूनाइटेड नेशन्स से जुड़ी संस्थाएं निशाने पर
इस बड़े फैसले की कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई। हालांकि, एक अमेरिकी अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर इस फैसले की जानकारी दी। इससे साफ होता है कि प्रशासन इस कदम को बिना ज्यादा चर्चा के लागू करना चाहता था। जिन संस्थाओं को निशाना बनाया गया है, उनमें से ज्यादातर यूनाइटेड नेशन्स से जुड़ी एजेंसियां, आयोग और सलाहकार पैनल हैं। ये संस्थाएं जलवायु परिवर्तन, श्रम अधिकार और सामाजिक मुद्दों पर काम करती हैं। ट्रम्प प्रशासन का आरोप है कि ये संगठन विविधता और "वोक" (जागरूकता) पहलों को बढ़ावा देते हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग की सख्त टिप्पणी
अमेरिकी विदेश विभाग ने बयान जारी कर कहा कि ट्रम्प प्रशासन के अनुसार ये संस्थाएं अपने काम के दायरे में अनावश्यक हैं। विभाग ने इन्हें मिसमैनेजमेंट, गैर-ज़रूरी, फिजूलखर्ची करने वाली और खराब तरीके से संचालित बताया। बयान में यह भी कहा गया कि ये संस्थाएं अमेरिका के एजेंडे के खिलाफ काम करने वाले तत्वों से प्रभावित हैं और देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता और आर्थिक समृद्धि के लिए खतरा बन सकती हैं।
जलवायु संगठनों से अमेरिका की दूरी
ट्रम्प और उनके सहयोगियों ने जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को दूर करने की नीति अपनाई है। इसी के तहत अमेरिका ने यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) से भी खुद को अलग कर लिया है।
पेरिस समझौते की नींव रखने वाला UNFCCC
1992 में बना UNFCCC समझौता 198 देशों द्वारा साइन किया गया था। इसका मकसद विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्तीय सहायता देना था। बाद में यही समझौता पेरिस जलवायु समझौते का आधार बना। ट्रम्प, जो जलवायु परिवर्तन को "धोखा" मानते हैं, ने सत्ता संभालते ही इस समझौते से दूरी बना ली थी।
मोदी के बनाए भारत-फ्रांस ग्रुप ISA भी छोड़ा
अमेरिका ने भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) से भी खुद को अलग कर लिया है। इस गठबंधन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 30 नवंबर 2015 को पेरिस में यूनाइटेड नेशन्स जलवायु सम्मेलन के दौरान लॉन्च किया था।
जबरन गर्भपात के आरोप और सच्चाई
यूनाइटेड नेशन्स की जनसंख्या एजेंसी, जो दुनियाभर में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं देती है, लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी के निशाने पर रही है। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में भी इस एजेंसी की फंडिंग में कटौती की थी। ट्रम्प और अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने आरोप लगाया था कि यह एजेंसी चीन जैसे देशों में "जबरन गर्भपात प्रथाओं" में शामिल है। हालांकि, जनवरी 2021 में जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद इस एजेंसी के लिए फंडिंग फिर से बहाल की गई।
WHO, UNRWA और UNESCO से पहले ही किया किनारा
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रम्प प्रशासन ने ऐसे कदम उठाए हों। इससे पहले अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए यूनाइटेड नेशन्स एजेंसी (UNRWA), यूनाइटेड नेशन्स मानवाधिकार परिषद और UNESCO से भी समर्थन वापस ले चुका है।
यूनाइटेड नेशन्स के लिए तगड़ा झटका
ट्रम्प प्रशासन ने 'ए-ला-कार्टे' यानी अपनी पसंद के अनुसार चुनने वाली नीति अपनाई है। इसका मतलब है कि वही संस्थाएं और कार्यक्रम चुने जाएंगे जो ट्रम्प के एजेंडे और अमेरिकी हितों से मेल खाते हों। यह फैसला रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों तरह की पिछली सरकारों की नीति से बड़ा बदलाव है। इस कदम के चलते यूनाइटेड नेशन्स को अपने कर्मचारियों और कार्यक्रमों में कटौती करनी पड़ी है।
USAID फंड कटौती से परियोजनाएं बंद
कई स्वतंत्र गैर-सरकारी संगठनों ने बताया है कि अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) के जरिए मिलने वाली विदेशी सहायता में कटौती के कारण उनकी कई परियोजनाएं बंद हो गई हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के सहयोग के बिना जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी प्रगति करना मुश्किल होगा। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जकों और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
अमेरिका की वापसी से बाकी देशों को बहाना मिलेगा
ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के अध्यक्ष और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉब जैक्सन ने कहा कि अमेरिका की वापसी "दूसरे देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं और कार्रवाई में देरी करने का बहाना देती है।" ट्रम्प का यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब उनका प्रशासन सैन्य कार्रवाई कर चुका है या ऐसी धमकियां दे चुका है, जिससे सहयोगी और विरोधी दोनों देश चिंतित हैं। इनमें वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने की बात और ग्रीनलैंड पर कब्जे की मंशा शामिल है।
किन संगठनों में अमेरिका बना रहेगा सक्रिय
इनमें अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ, अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे संस्थान शामिल हैं। प्रशासन का कहना है कि यहां अमेरिकी करदाताओं के पैसे का सही इस्तेमाल होगा।
और भी संस्थाओं को कहने नमस्ते
जिन अन्य संगठनों से अमेरिका बाहर निकलेगा, उनमें कार्बन फ्री एनर्जी कॉम्पैक्ट, यूनाइटेड नेशन्स विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति और अंतरराष्ट्रीय उष्णकटिबंधीय लकड़ी संगठन जैसे कई नाम शामिल हैं।
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