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तालिबान कर रहा है बड़े हमले, कब्जाए 50 बड़े शहरः यूएन

जिनेवा, 23 जून। अमेरिका और नाटो सेनाओं की अफगानिस्तान से जारी वापसी के बीच तालिबान ने देश के हिस्सों को कब्जाने के लिए हमले तेज कर दिए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि कई राज्यों की राजधानियों पर जल्दी ही तालिबान का कब्जा हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि है इससे हाल के दिनों में शांति स्थापना को लेकर हुई राजनीतिक प्रगति और लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.

Provided by Deutsche Welle

नाटो सेनाओं की 11 सितंबर तक अफगानिस्तान छोड़ देने की योजना है. इसका अर्थ यह होगा कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय सेना के हाथ में होगी. ऐसी खबरें आ रही हैं कि पिछले कुछ दिनों में तालिबान ने कई इलाकों में बड़े हमले किए हैं. अफगान अधिकारियों ने जानकारी दी है कि उत्तरी हिस्से में तालिबान तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपने पारपंरिक गढ़ से काफी बाहर निकल आया है.

तालिबान लड़ाकों ने मंगलवार को शीर खान बंदर पर कब्जा कर लिया, जो ताजिकिस्तान के साथ लगती सीमा पर अफगानिस्तान का एक अहम शहर है. इससे पहले वे उत्तरी प्रांत बगलान के नाहरीन और बगलान ए मरकजी जिलों को भी कब्जा चुके हैं.

50 जिलों पर कब्जाः यूएन

अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत डेबरा ल्योन्स कहना है कि मई से अब तक देश के 370 में से 50 जिलों पर तालिबान का कब्जा हो चुका है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को उन्होंने बताया, "जो जिले उन्होंने कब्जाए हैं वे प्रांतों की राजधानियों के इर्द गिर्द. इससे संकेत मिलता है कि तालिबान रणनीतिक जगह बना रहा है और विदेशी फौजों के पूरी तरह चले जाने के बाद इन राजधानियों पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है."

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ल्योन्स ने कहा कि हाल ही में जो कब्जे तालिबान ने किए हैं वे लड़ाई के दम पर किए हैं औऱ उसके इस तरह के बड़े सैन्य अभियान एक त्रासद बात होगी. उन्होंने कहा, "अफगानिस्तान में लड़ाई बढ़ने का मतलब नजदीक और दूर के बहुत से देशों की सुरक्षा को खतरा है."

अमेरिका ने कहा है कि देश से उसकी सेनाओं के चले जाने के बाद भी वह तालिबान पर निगाह रखेगा और आतंकवाद विरोधी हमले करता रहेगा. अमेरिका अधिकारियों ने कहा कि तालिबान पर सूचनाएं जुटाना और नजदीकी देशों से इलाके पर सैन्य हमले जारी रहेंगे.

हालांकि अमेरिका के लिए इलाके में नया सैन्य ठिकाना बनाने का काम मुश्किल हो सकता है क्योंकि इससे रूस और चीन के साथ तनाव बढ़ सकता है, जो मध्य एशिया में अहम भूमिका रखते हैं. अफगानिस्तान के कुछ पड़ोसी देश, जैसे कि पाकिस्तान पहले ही अमेरिकी सेनाओं को जगह देने से इनकार कर चुके हैं.

शांति पर खतरा

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने हा कि अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता की प्रक्रिया में योगदान के लिए उनका देश आर्थिक मदद और कूटनीति का भी इस्तेमाल करेगा.

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अमेरिका ने 11 सितंबर के आतंकवादी हमले के बाद 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया था और तालिबान को सत्ता से बाहर कर दिया था. दो दशक बाद तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच समझौते के लिए बातचीत चल रही है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेनाएं वापसी की तैयारी कर रही हैं.

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि वह 11 सितंबर से पहले हर हाल में अफगानिस्तान से सेनाओं की वापसी चाहते हैं. वापसी की प्रक्रिया पर चर्चा के लिए वह इसी हफ्ते अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने वाले हैं. कई मानवाधिकार कार्यकर्ता चिंतित है कि तालिबान यदि वापस अफगानिस्तान की सत्ता हासिल कर लेता है तो क्षेत्र में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में ही प्रगति खतरे में पड़ सकती है.

वीके (रॉयटर्स, एएफपी, डीपीए)

Source: DW

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