कौन थे DU के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा, निधन से 7 महीने पहले जेल से हुए थे बरी, दर्दनाक है पूरी कहानी

G N Saibaba Profile: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा का 12 अक्टूबर 2024 की देर रात निधन हो गया। निधन के सात महीने पहले ही जीएन साईबाबा माओवादियों से संबंधों के कारण 10 सालों तक जेल में रहने के बाद बरी हुए थे। मार्च 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने साईबाबा को माओवादियों से कथित संबंध के मामले में रिहा किया था। कोर्ट ने कहा था कि उनके खिलाफ आरोपों साबित नहीं हो पाए हैं।

57 वर्षीय साईबाबा का निधन गॉल ब्लैडर इन्फेक्शन और किडनियों के काम बंद करने की वजह से हुई। व्हीलचेयर पर बैठे साईबाबा का हैदराबाद के निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में इलाज चल रहा था, जहां उन्हें 10 दिन पहले खराब स्वास्थ्य के कारण भर्ती कराया गया था। उन्हें रात 8 बजे के आसपास दिल का दौरा पड़ा और रात 8:30 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

who was G N Saibaba

who was G N Saibaba: कौन थे जीएन साईबाबा? क्यों गए थे जेल, क्या था विवाद?

जीएन साईबाबा दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर थे। साईबाबा को 9 मई 2014 को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें और कई अन्य लोगों को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली पुलिस ने प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और उसके फ्रंटल ग्रुप रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के सदस्य होने के आरोप में हिरासत में लिया था।

🔴 कैसे जुड़ा जीएन साईबाबा का माओवादी से संबंध: असल में 2013 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पुलिस ने माओवाद से जुड़े महेश तिर्की, पी. नरोटे और हेम मिश्रा को गिरफ्तार किया था। इन्ही लोगों से पूछताछ में जीएन साईबाबा का नाम सामने आया।

साईबाबा पर अन्य आरोपियों जेएनयू के छात्र हेम मिश्रा और उत्तराखंड के पत्रकार प्रशांत राही की प्रतिबंधित संगठनों के सदस्यों के साथ बैठक आयोजित करने का आरोप था। 2015 में साईबाबा के खिलाफ UAPA के तहत केस दर्ज कर कार्यवाही शुरू की गई थी।

🔴 2017 में गढ़चिरौली कोर्ट ने जीएन साईबाबा दोषी ठहराया: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली कोर्ट ने साल 2017 में जीएन साईबाबा और पांच अन्य को आरोपियों को UAPA और भारतीय दंड संहिता के तहत दोषी करार दिया था। जिसमें जीएन साईबाबा को और अन्य चार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

जीएन साईबाबा ने गढ़चिरौली कोर्ट के फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। 14 अक्टूबर 2022 को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने जीएन साईबाबा को रिहा कर दिया था। लेकिन महाराष्ट्र सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को साईबाबा के बरी किए जाने के फैसले पर रोक लगाई।

🔴 2024 मार्च में बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया बरी: जेल में रहने के दौरान साईबाबा के परिवार और दोस्तों ने उनकी रिहाई के लिए दबाव डाला, इस बात पर जोर देते हुए कि उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ रहा है।

साईबाबा को 5 मार्च को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने बरी कर दिया था और 7 मार्च को नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनय जोशी और वाल्मीकि एसए मेनेजेस की खंडपीठ ने उन पर लगाई गई आजीवन कारावास की सजा को खारिज कर दिया और मामले में पांच अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया।

साईबाबा ने रिहाई के बाद कहा था- जेल में नहीं मिली दवाई

पीठ ने कहा कि वह सभी आरोपियों को बरी कर रही है क्योंकि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ उचित संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहा। जेल से रिहा होने के बाद साईबाबा ने कहा था, "मैंने जेल में बिताए 10 साल से कहीं ज्यादा खो दिए हैं"।

साईबाबा ने रिहाई के बाद आरोप लगाते हुए कहा था कि जेल में उन्हें दवाई नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा कि उनकी तबीयत खराब होने पर जो उनके लिए डॉक्टर दवाई देते थे, वो उन्हें दिया ही नहीं जाता था। उन्होंने कहा था कि वह बस सांस ले रहे हैं उनके शरीर का हर हिस्सा फेल हो चुका है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी वापस पाने की कानूनी लड़ाई

साईबाबा के करीबी सहयोगियों के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी नौकरी वापस पाने के लिए कानूनी रूप से भी सक्रिय रूप से लड़ रहे थे। मामले की आखिरी सुनवाई इस साल सितंबर में हुई थी।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक साईबाबा की देखभाल में परिवार की मदद करने वाले और उनकी रिहाई के लिए अभियान चलाने वाली रक्षा समिति का हिस्सा रहे, एक करीबी पारिवारिक मित्र दीपक कुमार ने कहा, ''वह हमेशा अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और मानवाधिकारों के लिए अपने काम पर वापस लौटने की बात करते थे। वह पढ़ाना भी चाहते थे। इस महीने की शुरुआत में उनका पित्ताशय निकाला गया था, सर्जरी सफल रही और वह ठीक हो रहे थे। जब मैंने उनसे आखिरी बार 6 अक्टूबर को बात की थी, तो वह ठीक लग रहे थे। उन्होंने मुझसे हाल ही में मेरे द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन के बारे में पूछा, लेकिन 7 अक्टूबर के आसपास उनका स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया।''

डीयू की पूर्व प्रोफेसर और परिवार की करीबी मित्र नंदिता नारायण ने कहा, "इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि वह बरी होने के बाद घर वापस आए थे और चीजें सामान्य हो रही थीं। वह एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे और उन्हें खोना बहुत दुखद है। हमें उनकी विरासत और उनके साहस को जीवित रखने की जरूरत है।''

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