'अगर थोड़ी भी राष्ट्रीयता है तो', सैनिकों को देखकर Premanand Ji Maharaj ने कहा कुछ ऐसा, भर आएंगी आपकी भी आंखें
Premanand Ji Maharaj: देश आज अपना 77वां गणतंत्र दिवस पूरे हर्षोल्लास और देशभक्ति के रंग में डूबकर मना रहा है। राजपथ से लेकर गली-कूचों तक तिरंगा आन-बान-शान से लहरा रहा है, लेकिन इसी बीच धर्म नगरी वृंदावन से एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों में जोश भर दिया है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज देश के रक्षकों को अपने सामने पाकर भावुक हो उठे। अध्यात्म और राष्ट्रभक्ति के इस अनूठे संगम ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि एक सैनिक का त्याग कितना विशाल होता है। महाराज जी ने न केवल जवानों का गर्मजोशी से स्वागत किया, बल्कि उनके सेवा भाव को 'ईश्वरीय तपस्या' का दर्जा देकर पूरे देश को एक गहरा संदेश दिया।

आश्रम में जब पहुंचे सरहद के रखवाले
26 जनवरी के पावन अवसर पर भारतीय सेना के कुछ जवान प्रेमानंद महाराज का आशीर्वाद लेने उनके आश्रम पहुंचे। जैसे ही पीतांबर धारी महाराज की दृष्टि वर्दीधारी जवानों पर पड़ी, वातावरण पूरी तरह भावनात्मक हो गया। महाराज ने सैनिकों के प्रति जो सम्मान दिखाया, उसने वहां मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम कर दीं। उन्होंने जवानों का खुले दिल से स्वागत करते हुए स्पष्ट किया कि एक संत के लिए राष्ट्र की रक्षा करने वाले किसी देवता से कम नहीं हैं।
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गणतंत्र दिवस का वास्तविक दर्शन
प्रेमानंद महाराज ने इस अवसर पर राष्ट्र के प्रति अपनी दृष्टि साझा की। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस महज झंडा फहराने, मिठाइयां बांटने या परेड देखने का औपचारिक दिन नहीं है।
आभार का दिन: यह दिन उन वीर जवानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का है जो हर पल सीमाओं पर अडिग रहते हैं।
आजादी की नींव: महाराज के अनुसार, हमारी आजादी और देश की संप्रभुता का महल इन्हीं सैनिकों के बलिदान की नींव पर टिका हुआ है।
'सैनिक की ड्यूटी एक महा-तपस्या'
महाराज ने सैनिकों की भूमिका को सामान्य रोजगार से कोसों दूर बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सेना की सेवा कोई साधारण नौकरी नहीं है। उन्होंने कहा, "जहां देश उन्हें खड़ा कर देता है, वहां वे अपने प्राणों की बाजी लगाकर डटे रहते हैं। यह केवल ड्यूटी नहीं, बल्कि एक कठोर तपस्या है जो विरले ही कर पाते हैं।"
हमारी सुखद नींद और सैनिकों का त्याग
अक्सर हम अपने घरों में जो सुरक्षा और सुकून महसूस करते हैं, उसकी कीमत सैनिक चुकाते हैं। महाराज ने कहा कि चाहे शून्य से नीचे का तापमान हो या रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी, जवान हर मुश्किल हालात को हंसते-हंसते गले लगाते हैं। उनकी मुस्तैदी के कारण ही सवा सौ करोड़ देशवासी चैन की नींद सो पाते हैं।
समाज के लिए महाराज का कड़ा संदेश
प्रेमानंद महाराज ने समाज से एक विशेष अपील करते हुए कहा कि सैनिकों को कभी भी 'सरकारी कर्मचारी' के नजरिए से न देखा जाए। जो व्यक्ति अपने परिवार, बच्चों और व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर केवल राष्ट्रहित में जीता है, वह सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी है। उन्होंने कहा कि सैनिकों का सम्मान करना किसी भी नागरिक का एहसान नहीं, बल्कि उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।
संत और सैनिक, राष्ट्र के दो मजबूत स्तंभ
महाराज ने संत और सैनिक के बीच एक सुंदर समानता स्थापित की, उन्होंने कहा, ठसंत अपनी आध्यात्मिक साधना और ज्ञान से समाज को सही दिशा दिखाते हैं और आंतरिक शांति प्रदान करते हैं। सैनिक अपने शौर्य और बलिदान से देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं और बाहरी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। दोनों का ही उद्देश्य निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करना है।"
निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा
आज के युग में जहां प्रेम अक्सर स्वार्थ और 'लेन-देन' पर आधारित होता है, महाराज ने सैनिकों को सच्चे प्रेम की मिसाल बताया। एक सैनिक बिना किसी बदले की भावना के, बिना कुछ मांगे, केवल अपने तिरंगे और मिट्टी के लिए खड़ा रहता है। यही वह 'निस्वार्थ प्रेम' है जिसे अध्यात्म में सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
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