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कारगिल में भी जोर पकड़ रहा है मंदिर निर्माण का मुद्दा, क्यों हो रहा है विरोध ? जानिए

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लेह, 24 मई: मंदिर निर्माण और उसका विरोध लद्दाख तक पहुंच चुका है। मामला कारगिल का है, जहां एक मंदिर निर्माण का स्थानीय लोग जोरदार विरोध कर रहे हैं। लेकिन, अब मंदिर बनाने के समर्थन में भी मांग जोर पकड़ने लगी है, जो राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग पर भी हावी होता नजर आ रहा है। यह मामला बौद्ध मंदिर से जुड़ा है। जिस जगह पर पुराने कारगिल में अल्पसंख्यक बौद्ध समुदाय मंदिर बनाना चाहते हैं, उसका उपयोग 6 दशकों से भी अधिक समय से वे करते आ रहे हैं। वहां पर एक गेस्ट हाउस है, जो खासकर बौद्धों के लिए ही बना हुआ है। लेकिन, अब स्थानीय लोग वहां पर मंदिर निर्माण नहीं होने देना चाहते। दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं, लेकिन विवाद गहराने की आशंका बढ़ती जा रही है।

26 मई को कारगिल के लोगों की अहम बैठक

26 मई को कारगिल के लोगों की अहम बैठक

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और यहां संविधान की छठी अनुसूची लागू करने की मांग को लेकर बने लेह अपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) की 26 मई को बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है। ये बैठक तो मूल रूप से भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन को दिशा देने के लिए आयोजित हो रही है, जो बार-बार के आश्वासन के बाद इनकी इन मांगों को पूरा करने में नाकाम रही है। लेकिन, इस बैठक के एजेंडे में वह मुद्दा हावी होने की ज्यादा संभावना है, जो पूरी तरह से स्थानीय और धार्मिक मसला है।

कारगिल में मंदिर बनाने का हो रहा है विरोध

कारगिल में मंदिर बनाने का हो रहा है विरोध

दरअसल, संभावना है कि 26 मई को होने वाली एलएबी और केडीए की बैठक में पहले कारगिल स्थित जमीन के एक टुकड़े को लेकर चर्चा होने वाली है, जिसपर बौद्ध समुदाय के लोग एक मंदिर का निर्माण करना चाहते हैं। लेकिन, स्थानीय आबादी इसका जोरदार विरोध कर रही है। गौरतलब है कि कारगिल में मुस्लिम आबादी 76 फीसदी से ज्यादा है और बौद्ध अल्पसंख्यक हैं। मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले 1969 के एक सरकारी अधिसूचना का हवाला दे रहे हैं।

1961 में बौद्धों को दी गई थी जमीन, बाद में लैंड यूज बदला-बौद्ध नेता

1961 में बौद्धों को दी गई थी जमीन, बाद में लैंड यूज बदला-बौद्ध नेता

दरअसल, 1969 के अधिसूचना के मुताबिक विवादित जमीन के टुकड़े का लैंड यूज कमर्शियल और रेसिडेंशियल बताया गया है और इसी आधार पर विरोध करने वालों का कहना है कि वहां मंदिर नहीं बनाया जा सकता। इतना ही नहीं उन स्थानीय लोगों का यह भी तर्क है कि पुराने कारगिल शहर में जमीन के उस टुकड़े के 20 किलो मीटर के दायरे में कोई बौद्ध नहीं रहता। उनका कहना है कि उस जमीन पर जो इमारत बनी हुई है, वह असल में लेह के बौद्ध समुदाय के लिए गेस्ट हाउस के तौर पर काम करता है और उसे इसी तरह से काम करते रहना चाहिए।

पहले मंदिर का मुद्दा हल हो- बौद्ध समुदाय

पहले मंदिर का मुद्दा हल हो- बौद्ध समुदाय

लेकिन, बौद्ध स्थानीय मुसलमानों के इस तर्क से सहमत नहीं हैं। लद्दाख बौद्ध संघ के चेयरमैन थुसप्तन चेवांग, जो कि लेह अपेक्स बॉडी के भी प्रमुख हैं, उनकी अगुवाई वाला प्रतिनिधिमंडल इस मसले पर कारगिल में कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के नेताओं के साथ बैठक करने वाला है। पूर्व विधायक और एलएबी के सदस्य चेरिंग दोर्जी ने कहा है, 'यदि 26 मई को यह मसला सौहार्दपूर्ण तरीके से हल हो जाता है, जब केडीए की लद्दाख बौद्ध संघ के सदस्यों के साथ बैठक हो रही है, तब उस मसले पर हम आसानी से आगे बढ़ सकेंगे, जिसके लिए मिलकर लड़ रहे हैं। यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है और इसका हल होना चाहिए।'

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मौजूदा इमारत की मरम्मत भी नहीं होने देते- बौद्ध नेता

मौजूदा इमारत की मरम्मत भी नहीं होने देते- बौद्ध नेता

दोर्जी ने कहा है कि 'यह मुद्दा बहुत बड़ी रुकावट बन गया है, क्योंकि कारगिल में धार्मिक संगठन मंदिर निर्माण का विरोध कर रहे हैं और यहां तक कि मौजूदा इमारत की मरम्मत तक नहीं होने दे रहे।' इनका कहना है कि दो कनाल से भी कम की यह जमीन 1961 में बौद्धों को दी गई थी, लेकिन 1969 में स्थानीय लोगों के दबाव में (तत्कालीन) सरकार ने इसका लैंड यूज ही बदल दिया। जाहिर है कि बौद्ध संगठन के रुख से लगता है कि वह इस मसले पर झुकने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि जिस इमारत का वही 6 दशकों से ज्यादा समय से इस्तेमाल करते हैं और उसकी देख-रेख करते हैं।(तस्वीरें-प्रतीकात्मक, अंतिम दोनों तस्वीर सौजन्य: कारगिल एनआईसी डॉट इन)

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English summary
The issue of building a Buddhist temple in Kargil is heating up, the local Muslim population is protesting
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