Tamil Nadu Govt: विजय को रोकने के लिए साथ आएंगे DMK-AIADMK ? रजनीकांत की ‘सीक्रेट’ बातचीत की इनसाइड स्टोरी!
Tamil Nadu Govt Crisis: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आए चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर अब तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) ने पहली ही चुनावी लड़ाई में 100 से ज्यादा सीटें जीतकर सबको चौंका दिया, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से वह अभी भी दूर है। इसी बीच अब सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि क्या दशकों से एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति करने वाली DMK और AIADMK अचानक साथ आ सकती हैं?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सुपरस्टार रजनीकांत पर्दे के पीछे दोनों दलों DMK और AIADMK के बीच संवाद कराने में जुटे हुए हैं। कहा जा रहा है कि उनका मकसद विजय को मुख्यमंत्री बनने से रोकना और तमिल राजनीति में नया समीकरण बनाना है। यही वजह है कि चेन्नई से दिल्ली तक सियासी हलचल तेज हो गई है। क्या सुपरस्टार रजनीकांत इस नामुमकिन से दिखने वाले गठबंधन के 'आर्किटेक्ट' बन रहे हैं? आइए समझते हैं।

नंबरों का गणित और राजभवन की 'ना'
तमिल राजनीति लंबे समय से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस चुनाव में विजय की पार्टी TVK ने जिस तरह 108 सीटें जीत लीं, उसने राज्य की राजनीति का पूरा गणित बदल दिया। हालांकि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक विजय दो सीटों से जीतने के कारण एक सीट छोड़ेंगे, जिससे TVK की संख्या 107 रह जाएगी।
कांग्रेस ने TVK को समर्थन देने का संकेत दिया है। इसके बाद भी आंकड़ा 113 तक ही पहुंचता है, जबकि सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की जरूरत है। यही वह जगह है जहां तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह उलझ गई है।
TVK सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से दूर रह गई। दूसरी तरफ DMK और AIADMK अलग-अलग होकर भी सत्ता में नहीं पहुंच पा रहीं। इसी राजनीतिक खाली जगह ने नए समीकरणों की चर्चा को हवा दी है।
यही वजह है कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने फिलहाल विजय को सरकार बनाने का न्यौता देने से इनकार कर दिया है। गुरुवार को हुई मुलाकात में राज्यपाल ने साफ कर दिया कि जब तक विजय बहुमत का स्पष्ट प्रमाण नहीं देते, उन्हें शपथ नहीं दिलाई जा सकती। पिछले दो दिनों में यह दूसरी बार था जब विजय को खाली हाथ राजभवन से लौटना पड़ा।
रजनीकांत की एंट्री: क्या बन रहे हैं बड़े भाई?
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट सुपरस्टार रजनीकांत की एंट्री है। अंदरखाने की खबर है कि रजनीकांत इस वक्त DMK और AIADMK के बीच एक 'पुल' का काम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि रजनीकांत का मकसद विजय को मुख्यमंत्री बनने से रोकना है और इसके लिए वह इन दोनों DMK और AIADMK को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि रजनीकांत ने इस सिलसिले में दिल्ली में बीजेपी के सीनियर नेताओं से भी चर्चा की है।
सूत्रों के मुताबिक उन्होंने भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं से भी बातचीत की है। माना जा रहा है कि विजय के उभार ने तमिल राजनीति के पुराने खिलाड़ियों को असहज कर दिया है। बताया जा रहा है कि शुरुआत में DMK प्रमुख एमके स्टालिन इस तरह के किसी भी समझौते के खिलाफ थे। AIADMK के साथ जाने का विचार उन्हें राजनीतिक रूप से असहज लग रहा था। लेकिन पार्टी के भीतर से भी दबाव बढ़ रहा है।
राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन और उनकी पत्नी दुर्गा स्टालिन, व्यावहारिक राजनीति का हवाला देते हुए उन्हें विकल्प खुले रखने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि रजनीकांत को लगता है कि अगर विजय सत्ता में आते हैं, तो यह राज्य की पुरानी द्रविड़ राजनीति के लिए खतरा होगा। इसलिए, वह चाहते हैं कि स्टालिन और एडप्पाडी क पलनीस्वामी पुराने मतभेद भुलाकर एक 'स्थिर' सरकार बनाने पर विचार करें।
AIADMK का रुख: 'भगवान की कृपा से' सब संभव है!
उधर AIADMK के खेमे में भी हलचल तेज है। पार्टी के पास 47 सीटें हैं। AIADMK के राज्यसभा सांसद एम. थम्बीदुरै ने शुक्रवार को संकेत दिया कि पार्टी कई स्तरों पर बातचीत कर रही है। जब उनसे सीधा सवाल पूछा गया कि क्या आप DMK के साथ जाएंगे? तो उन्होंने बहुत ही कूटनीतिक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि जनता चाहती है कि AIADMK सत्ता में वापस आए और भगवान की कृपा से समय आने पर यह हो सकता है। उनके इस बयान ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा पक रहा है।
DMK का प्रस्ताव: सांप्रदायिक ताकतों को रोकने का बहाना
DMK ने 7 मई को अपने विधायकों के साथ बैठक के बाद एक प्रस्ताव पारित किया। इसमें सीधे तौर पर AIADMK का नाम तो नहीं लिया गया, लेकिन यह जरूर कहा गया कि तमिलनाडु दोबारा चुनाव के लिए तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि उनकी प्राथमिकता एक 'स्थिर सरकार' बनाना और उन 'सांप्रदायिक ताकतों' को रोकना है जो द्रविड़ आंदोलन की नीतियों को कमजोर करना चाहती हैं। इस प्रस्ताव ने स्टालिन को 'आपातकालीन फैसले' लेने के लिए अधिकृत कर दिया है, जो इस बात का इशारा है कि वह किसी भी गठबंधन के लिए दरवाजे खोल सकते हैं।
कांग्रेस और अन्य दलों की नाराजगी
जहां एक तरफ DMK-AIADMK के मेलजोल की खबरें हैं, वहीं कांग्रेस, VCK और CPI जैसी पार्टियां विजय के समर्थन में खड़ी दिख रही हैं। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने इसे 'अन्याय' करार दिया है। उनका कहना है कि विजय सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं और उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए। उन्हें इस तरह इंतजार कराना लोकतंत्र के खिलाफ है।
क्या पलटेगी बाजी?
तमिलनाडु की राजनीति उस चौराहे पर खड़ी है जहां से दो रास्ते निकलते हैं। पहला- विजय किसी तरह 5 और विधायकों का जुगाड़ कर लें (जिसकी संभावना AIADMK के समर्थन के बिना मुश्किल है)। दूसरा- रजनीकांत का 'प्लान' कामयाब हो जाए और DMK-AIADMK मिलकर एक महा-गठबंधन बना लें।
अगर DMK (जिसके पास अच्छी खासी सीटें हैं) और AIADMK (47 सीटें) साथ आते हैं, तो विजय का मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इनके कार्यकर्ता इस 'अजीब' गठबंधन को स्वीकार कर पाएंगे? फिलहाल तो तमिलनाडु की जनता और पूरी दुनिया की नजरें चेन्नई की ओर टिकी हैं। अगले 24 से 48 घंटे राज्य की किस्मत तय करने वाले हैं।
तमिलनाडु की राजनीति फिलहाल पूरी तरह अनिश्चितता में फंसी हुई है। तीन संभावनाएं सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
- TVK अन्य दलों और निर्दलीयों का समर्थन जुटाने की कोशिश करे
- DMK और AIADMK किसी नए फॉर्मूले पर विचार करें
- राज्य में दोबारा चुनाव की नौबत आ जाए
हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दोबारा चुनाव कोई भी पार्टी नहीं चाहती। ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद अहम रहने वाले हैं।














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