TVK के पास बहुमत नहीं, क्या विजय को मिलेगा सरकार बनाने का न्योता? ‘फ्लोर टेस्ट vs गवर्नर' पर क्या कहता है SC?
TN Govt Formation 2026: तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर सस्पेंस गहराता जा रहा है। तमिलगा वेट्ट्री कज़गम (TVK) के अध्यक्ष विजय ने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन राजभवन में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाकात की।
234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी (Single Largest Party) बनकर उभरे विजय के लिए सत्ता की राह में 'संवैधानिक पेच' फंस गया है। यह अनिश्चितता एक पुरानी बहस को जन्म दे रही है... क्या राज्यपाल को न्योता देने से पहले बहुमत का सबूत मांगना चाहिए, या सबसे बड़ी पार्टी को पहले मौका मिलना चाहिए?

Governor Rajendra Arlekar की मांग: पहले 118 का आंकड़ा दिखाएं
सूत्रों के अनुसार, गुरुवार की बैठक में राज्यपाल अर्लेकर ने अपना रुख कड़ा रखा। उन्होंने विजय से स्पष्ट कहा कि उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित करने से पहले 118 विधायकों के समर्थन का ठोस प्रमाण देना होगा। विजय के पास अपनी 108 सीटें और कांग्रेस की 5 सीटें मिलाकर कुल 113 का आंकड़ा है, जो बहुमत (118) से 5 कम है। समर्थन का पेच यहीं फंसा हुआ है। विजय को सरकार बनाने में VCK, CPI और MNM जैसे दलों ने सार्वजनिक रूप से विजय का समर्थन किया है, लेकिन राज्यपाल ने उन दलों के विधायकों के औपचारिक समर्थन पत्र (Letters of Support) की मांग की है।
Floor Test vs Raj Bhavan पर संवैधानिक बहस, क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट? फ्लोर टेस्ट ही असली परीक्षा
भारत के संवैधानिक इतिहास में इस मुद्दे पर कई ऐतिहासिक फैसले आए हैं, जो राज्यपाल की शक्तियों की सीमा तय करते हैं:
1. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994):
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं, बल्कि 'सदन के पटल' (Floor of the House) पर होना चाहिए। राज्यपाल को केवल 'प्रथम दृष्टया' (Prima Facie) यह देखना चाहिए कि क्या दावेदार बहुमत जुटाने की स्थिति में है।
2. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006):
अदालत ने कहा कि सरकार गठन के चरण में राज्यपाल की संतुष्टि केवल 'प्रथम दृष्टया' होनी चाहिए, निर्णायक नहीं। यानी राजभवन को बहुमत का अंतिम फैसला करने वाली अदालत नहीं बनना चाहिए।
3. सुभाष देसाई बनाम भारत संघ (2023 - महाराष्ट्र मामला):
इस मामले में कोर्ट ने एकनाथ शिंदे को न्योता देने के राज्यपाल के फैसले को सही ठहराया था क्योंकि उनके पास भाजपा के समर्थन का 'ठोस दस्तावेज' (Material) मौजूद था। यह साबित करता है कि राज्यपाल समर्थन पत्रों की जांच करने के हकदार हैं।
महाराष्ट्र संकट में भी उठे थे ऐसे सवाल, क्या कहती हैं सरकारिया आयोग की सिफारिशें?
सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सबसे पहले उस पार्टी या गठबंधन को मौका मिलना चाहिए जो सबसे बड़ी हो और जिसे अन्य दलों का समर्थन हासिल हो। लेकिन आयोग ने यह भी कहा था कि समर्थन का कुछ न कुछ प्रमाण होना जरूरी है।
2019 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट में भी यही बहस सामने आई थी। उस समय राज्यपाल ने देवेंद्र फडणवीस सरकार को शपथ दिलाई थी, जिसे लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया और दोहराया कि बहुमत का अंतिम परीक्षण विधानसभा में ही होगा। हालांकि अदालत ने यह नहीं कहा कि राज्यपाल बिना किसी समर्थन पत्र के सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी को ही बुलाने के लिए बाध्य हैं।
तमिलनाडु 'ग्रे जोन' में क्यों है?
तमिलनाडु की स्थिति महाराष्ट्र या अन्य राज्यों से अलग है क्योंकि यहां विजय की पार्टी गठबंधन के बाद भी बहुमत के आंकड़े से दूर है। सराकर बनाने में सहयोगियों के बयान तो आए हैं, लेकिन राज्यपाल के पास विधायकों के हस्ताक्षरित पत्र अभी तक नहीं पहुंचे हैं। सरकारी नियमों (सरकारिया आयोग) के अनुसार, राज्यपाल का दायित्व है कि वह एक ऐसी सरकार को न्योता दे जो स्थिर हो सके।
इतिहास के कड़वे अनुभव: झारखंड और उत्तर प्रदेश
भारतीय राजनीति में कई बार राज्यपालों के फैसले विवादों में रहे हैं।
झारखंड (2005): राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के बजाय शिबू सोरेन को न्योता दिया था। सोरेन बहुमत साबित नहीं कर पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
उत्तर प्रदेश (1997-98): राज्यपाल रोमेश भंडारी ने पहले कल्याण सिंह को न्योता देने से मना किया, लेकिन बाद में केवल 22 विधायकों वाले जगदंबिका पाल को शपथ दिला दी। इन घटनाओं ने राज्यपाल की 'विवेकाधीन शक्तियों' पर हमेशा सवाल खड़े किए हैं।
विजय के लिए चुनौती सिर्फ राजनीति नहीं, संविधान भी लड़ाई में शामिल
विजय इस समय सिर्फ राजनीतिक समर्थन जुटाने की लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि उन्हें संवैधानिक कसौटी पर भी खुद को साबित करना होगा। एक तरफ TVK दावा कर रही है कि जनता ने उसे सबसे बड़ा जनादेश दिया है, दूसरी ओर राजभवन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सरकार स्थिर रह सके। यानी तमिलनाडु में सरकार गठन का यह संघर्ष सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि संविधान, परंपरा और राज्यपाल के विवेक के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विजय बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाते हैं या नहीं। अगर TVK समर्थन पत्र पेश कर देती है, तो राज्यपाल उन्हें सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं और फिर फ्लोर टेस्ट कराया जाएगा। लेकिन यदि संख्या स्पष्ट नहीं हुई, तो तमिलनाडु की राजनीति और संवैधानिक बहस दोनों और ज्यादा पेचीदा हो सकती हैं।














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