क्या अब खत्म हो जाएगा मानहानि कानून? SC की टिप्पणी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छिड़ी नई बहस
SC Remark Criminal Defamation Law: भारत की अदालतों में अक्सर ऐसे फैसले और टिप्पणियाँ सामने आती हैं जो आने वाले समय की दिशा तय कर देती हैं। सोमवार, 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही कहा जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी। मामला था औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे आपराधिक मानहानि कानून (Criminal Defamation Law) का।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए। यह बयान महज एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष से जुड़ा संकेत है जिसमें पत्रकार, लेखक और आम नागरिक लगातार अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात उठाते रहे हैं।

अब सवाल यह है-क्या सचमुच भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नए पंख मिलने वाले हैं? आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला....
पूरा मामला क्या है इसे समझिए?
यह विवाद 2016 में प्रकाशित 'द वायर' की एक रिपोर्ट से जुड़ा है। रिपोर्ट का शीर्षक था - "डोजियर में जेएनयू को 'संगठित सेक्स रैकेट का अड्डा' बताया गया। जिस पर छात्रों और प्रोफेसरों ने नफरत फैलाने वाले अभियान का आरोप लगाया"।
पूर्व जेएनयू प्रोफेसर अमिता सिंह ने आरोप लगाया कि इस रिपोर्ट से यह झूठा संदेश गया कि उन्होंने विवादित डॉसियर तैयार किया था और छात्रों व प्रोफेसरों के खिलाफ नफरत फैलाने का काम किया। शिकायत में कहा गया कि रिपोर्टर अजय महाप्रस्थ और संपादक मंडल ने डॉसियर की प्रामाणिकता की जांच किए बिना उसे पब्लिश किया और इससे प्रोफेसर सिंह की साख को नुकसान पहुंचा।
एक नजर में जानिए इस कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी
- 2017 में दिल्ली की एक मेट्रोपॉलिटन अदालत ने 'द वायर' के पत्रकारों सिद्धार्थ भाटिया और अजय महाप्रस्थ को तलब किया।
- 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इन समन को खारिज कर दिया।
- लेकिन 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलट दिया और मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया।
- मई 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर से नए समन को बरकरार रखा।
- अब इस फैसले को चुनौती देते हुए 'द वायर' और उसके पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि इन सबको अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी कर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह टिप्पणी?
दरअसल, मानहानि कानून भारत में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 और 500 के तहत आता है, जिसकी जड़ें ब्रिटिश शासन के औपनिवेशिक दौर में हैं। लंबे समय से यह बहस चल रही है कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) के अधिकार को सीमित करता है और पत्रकारों व एक्टिविस्टों पर दबाव बनाने का हथियार बनता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए, ने भी दलील दी कि इस तरह के आपराधिक प्रावधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर असर डालते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बड़े सुधार की ओर इशारा करती है। अगर आपराधिक मानहानि को खत्म कर दिया गया, तो यह भारतीय मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ऐतिहासिक फैसला साबित हो सकता है।












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