70% आबादी गरीबी रेखा से नीचे कैसे? प्रति व्यक्ति आय के दावों के अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
Supreme Court: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों में उच्च विकास और प्रति व्यक्ति आय के दावों के बीच अंतर पर सवाल उठाए हैं, जबकि कुछ राज्यों में 70% आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर संदेह जताया कि क्या सब्सिडी वाले खाद्यान्न की योजनाएं वास्तव में गरीबों को लाभ पहुंचाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी प्रवासी श्रमिकों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु राशन कार्ड की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे राज्य हैं जो विकास कार्ड का उपयोग करते हैं या उसे पेश करते हैं, यह कहते हुए कि हमारी प्रति व्यक्ति आय अधिक है।

हमने बहुत अच्छी प्रगति की है, लेकिन हम पाते हैं कि उनकी 70% आबादी गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) घोषित की गई है। उन्होंने पूछा कि यह दोनों कारक एक साथ कैसे हो सकते हैं? यदि 70% लोग बीपीएल हैं और फिर भी आप उच्च प्रति व्यक्ति आय का दावा करते हैं, तो इसमें एक अंतर्निहित विरोधाभास है।
सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि क्या गरीबों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए शुरू की गई सब्सिडी युक्त राशन प्रणाली, सरकारों द्वारा लोकप्रियता हासिल करने की एक चाल मात्र है। उन्होंने कहा कि हमारी चिंता यह है कि क्या वास्तविक गरीबों के लिए निर्धारित लाभ उन लोगों तक पहुंच रहे हैं जो इसके हकदार नहीं हैं?
राशन कार्ड अब एक लोकप्रियता कार्ड बन गया है। कोविड-19 महामारी के बाद से अदालत ने अधिकारियों को ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत लोगों को राशन कार्ड वितरित करने सहित कल्याणकारी उपायों को लागू करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि क्या राजनीतिक उद्देश्य राशन कार्ड जारी करने और खाद्यान्न वितरण को प्रभावित करते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारी प्रयासों के बावजूद, गरीब परिवार अक्सर व्यवस्थागत मुद्दों के कारण गरीबी में ही रह जाते हैं। कुछ हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि आंकड़ों में यह विसंगति लोगों की आय में असमानताओं से उपजी है। उन्होंने कहा कि असमानता का स्तर इतना बढ़ गया है कि कुछ लोगों के पास लाखों करोड़ रुपये हैं।
जबकि, अधिकांश लोग प्रतिदिन 30 और 40 रुपये पर जीवन यापन करते हैं। अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं, जबकि गरीब अब भी गरीब बने हुए हैं। भूषण ने कहा कि सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत गरीब प्रवासी श्रमिकों को मुफ्त राशन दिए जाने की जरूरत है और यह आंकड़ा लगभग आठ करोड़ है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि हमें उम्मीद है कि राशन कार्ड जारी करने में कोई राजनीतिक तत्व शामिल नहीं होंगे। मैं अपनी जड़ों से अलग नहीं हुआ हूं। मैं हमेशा गरीबों की दिक्कतें जानना चाहता हूं। ऐसे परिवार हैं जो गरीब बने हुए हैं। कहा कि यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि राशन गरीबों तक पहुंचे।
सरकार की जिम्मेदारी
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न उपलब्ध कराना अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि आंगनवाड़ी जैसी योजनाओं के माध्यम से अतिरिक्त प्रावधानों के साथ इस अधिनियम के तहत 81.35% कवरेज मौजूद है।
भूषण ने कहा कि महामारी के बाद बेरोजगारी ने कई प्रवासी श्रमिकों को बेरोजगार कर दिया है और उन्हें खाद्य सुरक्षा की जरूरत है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्यों को इन श्रमिकों को राशन कार्ड वितरित करने चाहिए ताकि केंद्र आवश्यक राशन की आपूर्ति कर सके। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिन में कम से कम दो बार भोजन मिलना एक मौलिक अधिकार है।
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