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पति के गिफ्ट किए गहने, सामान क्‍या वापस ले सकती हैं? तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को लेकर SC ने सुनाया बड़ा फैसला

देश की सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने विवाहित जीवन के दौरान पति या विवाह के समय उसके माता-पिता द्वारा उसे या उसके पति को दिए गए नकदी, सोने और अन्य सामान को कानूनी रूप से वापस पाने की हकदार है।

यह ऐतिहासिक फैसला तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की वित्‍तीय सुरक्षा देगा। कोर्ट ने अपने निर्णय में ये साफ किया कि ऐसे सामान को महिला की निजी संपत्ति माना जाना चाहिए और विवाह समाप्त होने पर उसे लौटा दिया जाना चाहिए।

sc

दरअसल, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ एक मुस्लिम महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई में मंगलवार को सुनवाई की। जिसमें कोर्ट ने कहा तलाकशुदा मुस्लिम महिला शादी में पति को दिए गए नकद, सोने के आभूषण और अन्य उपहार मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वापस पा सकती है।

कोर्ट ने फैसले में क्‍या कहा?

2 दिसंबर को दिए अपने फैसले में पीठ ने जोर देकर कहा, "इस अधिनियम का निर्माण समानता, गरिमा और स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हुए होना चाहिए। इसे महिलाओं के वास्तविक अनुभवों, खासकर छोटे शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त पितृसत्तात्मक भेदभाव के आलोक में देखा जाना चाहिए।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने माता-पिता द्वारा विवाह के समय उसे या उसके पति को दिए गए सभी सामान की हकदार है। पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 3(1) मेहर/दहेज व अन्य शादी की संपत्तियों से संबंधित है, जिससे महिला पति से इन वस्तुओं को वापस मांग सकती है।

अदालत ने आगे कहा, "भारत का संविधान सभी के लिए समानता की आकांक्षा रखता है, जो स्पष्ट रूप से अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। इस उद्देश्य की पूर्ति में न्यायालयों को सामाजिक न्याय न्यायनिर्णयन पर आधारित अपना तर्क देना चाहिए।"

कोर्ट ने 2001 के फैसले का भी हवाला दिया

पीठ ने डैनियल लतीफी बनाम भारत संघ (2001) के फैसले का भी हवाला दिया। इसने स्थापित किया कि यदि तलाकशुदा महिला को उचित भरण-पोषण, मेहर या निर्धारित संपत्तियां नहीं मिली हैं, तो वह भुगतान या इन संपत्तियों की वापसी के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर सकती है।

शीर्ष अदालत ने एक मुस्लिम महिला की याचिका स्वीकार कर उसके पूर्व पति को 17,67,980 रुपये उसके बैंक खाते में जमा करने का आदेश दिया। यह राशि मेहर, दहेज, 30 तोले सोने के आभूषण व फ्रिज, टीवी, स्टेबलाइजर, शोकेस, बॉक्स बेड, डाइनिंग फर्नीचर जैसे घरेलू उपहारों के लिए तय की गई थी।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह भुगतान छह सप्ताह के भीतर अनुपालन शपथ पत्र के साथ हो। समय पर भुगतान न होने पर पति को 9% वार्षिक ब्याज देना होगा। इस फैसले के साथ कलकत्ता उच्च न्यायालय का 2022 का निर्णय रद्द कर दिया गया।

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