शर्मिला टैगोर की यह कसक, जो उन्हें अक्सर करती है परेशान

शर्मिला टैगोर की शख़्सियत उनके काम, खानदान, प्रेम-विवाह और परिवार के अलावा अभिनय से भी जुड़ी है.

शर्मिला टैगौर
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शर्मिला टैगौर

शर्मिला टैगोर मशहूर अभिनेत्री रही हैं.

महज 13 साल की उम्र में दिग्गज निर्देशक सत्यजीत रे के साथ अपने अभिनय की शुरुआत करने वाली शर्मिला टैगोर जल्द ही हिंदी फ़िल्म जगत की शीर्ष अभिनेत्री बन गई थीं.

कई सुपरहिट फ़िल्मों में काम करने के अलावा भारतीय क्रिकेट के सबसे चतुर कप्तानों में शुमार टाइगर पटौदी से शर्मिला टैगोर के प्रेम और शादी के भी कई क़िस्से आज तक चर्चा में हैं.

इन दिनों शर्मिला टैगोर पर्दे पर भले ही कम दिखाई देती हैं लेकिन सैफ़ अली ख़ान की मां और करीना कपूर ख़ान की सास के तौर पर वह चर्चा में बनी रहती हैं.

पद्मभूषण के अलावा अपनी फ़िल्मों के राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्म फेयर अवॉर्ड जीत चुकीं शर्मिला टैगौर ने फ़िल्म पत्रकार अर्नब बनर्जी से ख़ास बातचीत में बताया कि वो अपने दौर में बॉलीवुड सितारों के बीच रही दोस्ती और मेलजोल को बहुत याद करती हैं.

शर्मिला टैगोर ने अपने लंबे फ़िल्मी करियर और नए दौर के बदलावों पर भी खुलकर अपनी राय रखी.

पढ़िए इस बातचीत के संपादित अंश-

हमलोगों ने हाल में आपको फ़िल्म गुलमोहर में देखा. आप दूसरी फ़िल्मों में भी काम करने के लिए तैयार हैं?

जवाब- किस तरह का रोस ऑफ़र होता है, उस पर यह निर्भर करता है. गुलमोहर में मैंने अपनी उम्र के किरदार को निभाया है और यह काफ़ी दिलचस्प भी था. अगर मुझे ध्यान में रखकर भूमिकाएं लिखी गईं तो क्यों नहीं करूंगी?

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क्या आपने सिनेमा के बदलते दौर के साथ तालमेल बिठाकर रखा है?

जवाब- हां, मैं ऐसा करती हूं. मैं समझती हूं कि अब स्टार सिस्टम का दौर बीत चुका है. अब सितारों के इर्द-गिर्द रहने वाली रहस्यमय दुनिया ग़ायब हो चुकी है.

पहले फैंस स्टार को केवल सिनेमाई पर्दे पर देखते थे और उनके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया का जमाना है.

एक बटन दबाने पर स्टार के बारे में सारी जानकारी मिल जाती है. युसूफ़ साहब (दिलीप कुमार) की एक झलक पाने के लिए लोग उनके घर के सामने घंटो खड़े रहा करते थे. अब ऐसी तड़प कहां रही?

इन दिनों के किन निर्देशकों का काम आपको पसंद है?

जवाब- मुझे नए दौर के फ़िल्म निर्माताओं का काम पसंद है. तिग्मांशु धुलिया, अनुराग बासु, अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा, ज़ोया अख़्तर, शुजीत सरकार- ये सभी अच्छे फ़िल्मकार हैं. लेकिन अब बदलते दौर में हर किसी की चाहत बढ़ गई है.

फ़िल्में केवल स्टार वैल्यू के दम पर नहीं चल सकतीं. चरित्रों को लेकर भी बदलाव हुए हैं, उदाहरण के लिए सिनेमा अब हीरो-हीरोइन के लिए करियर विकल्प हो गए हैं.

इन सबके बाद भी थिएटरों में दर्शक लौटेंगे, ये मैं नहीं जानती. बालीवुड काफी आत्मसंतुष्ट भी हो चुका है, इसके बारे में भी उसे सोचना होगा.

शर्मिला टैगौर
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शर्मिला टैगौर

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आपके दौर के और आज की पीढ़ी के सितारों में आप क्या अंतर देखती हैं?

जवाब- बिना किसी शक के आज की पीढ़ी कहीं ज़्यादा स्मार्ट है. ये ज़रूर है कि आज के कलाकारों की पीढ़ी में से कुछ लोगों को हमलोगों की पीढ़ी के बारे में बहुत नहीं पता हो और दक्षिण भारतीय कलाकारों और टेक्नीशियनों के बारे में भी पता नहीं हो.

उदासी की बात ये है कि उन्हें हॉलीवुड के कलाकारों के बारे में सबकुछ पता होगा. इनमें से कुछ तो छोटे शहरों से आकर बड़े सितारे बने हैं. लेकिन एक बार कामयाबी हासिल होने के बाद वे अपनी जड़ों और अतीत को भूल चुके हैं.

उन्हें अपनी अतीत और अपनी जड़ों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, यही उनकी कसौटी होनी चाहिए. कश्मीर की कली में मुझे 25 हज़ार रुपये मिले थे, उसकी तुलना में आज नयी पीढ़ी काफ़ी पैसा कमा रही है.

मुझे इस बात को लेकर काफ़ी खुशी भी है लेकिन उन्हें सिनेमाई दुनिया में दिलीप कुमार या सत्यजीत राय के योगदान के बारे में जानना चाहिए. यह भी समझना होगा कि हर आधुनिक चीज़, सही हो ज़रूरी नहीं है.

गुड लक के लिए नारियल फोड़ने की परंपरा की कोई भी एक वजह हो सकती है- धार्मिक या फिर परंपरागत- ऐसी परंपराओं को हमें बनाए रखना चाहिए.

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सवाल- बॉलीवुड में तो आपने ढेरों बदलाव देखा होगा?

जवाब- पहले फ़िल्म फेयर अवॉर्ड समारोह में हम सब जमा होते थे और एक दूसरे को मुबारकबाद देते थे. अगर मुझे अवॉर्ड मिलता तो वहीदा जी, नरगिस जी, नूतन जी और दूसरे भी ख़ुशी में शामिल होती थीं.

आज की तरह नहीं था, आज तो स्टार तभी इन समारोहों में जाते हैं जब उन्हें पहले से अवॉर्ड देने का वादा किया जाता है, या फिर उन्हें प्रदर्शन के भारी रकम का भुगतान किया जाता है.

यानी कुल मिलाकर यह एक टीवी शो जैसा हो गया है, यह हास्यास्पद है.

सवाल- फ़िल्म इंडस्ट्री में आपकी किन लोगों से दोस्ती है?

जवाब- कई लोगों से, अपर्णा सेन, जावेद साब और कुछ और दोस्त हैं. लेकिन हमलोग ज़्यादा मिल नहीं पाते हैं.

सौमित्र चटर्जी और मेरे बीच, बहुत ही ख़ास रिश्ता था. हमारी 40 साल से भी पुरानी दोस्ती थी. सत्यजीत राय की तरह ही उनकी दिलचस्पी भी कला, थिएटर, राजनीति, किताब, सिनेमा और संगीत में थी. वे अमूमन बात करते थे और मैं सुनती.

उत्तम कुमार से बहुत दोस्ती तो नहीं थी, लेकिन वे बहुत मदद करने वाले सह-कलाकार थे. मुझे हरिभाई (संजीव कुमार) की बहुत कमी महसूस होती है.

मैं मनोज वाजपेयी को जानती हूं और उनके साथ काम करना शानदार अनुभव है. मैं बहुत बात नहीं करती हूं. अमिताभ बच्चन के साथ अच्छे संबंध हैं. मैं गुलज़ार साब की बहुत इज़्ज़त करती हूं.

मनोज वाजपेयी के साथ शर्मिला टैगोर
Manoj Bajpayee/Instagram
मनोज वाजपेयी के साथ शर्मिला टैगोर

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सवाल- आपकी नज़र में इन दिनों फ़िल्म जगत की समस्या क्या है?

जवाब- फ़िल्म इंडस्ट्री में आपसी भाईचारा नहीं दिखता है. अवॉर्ड समारोह में फ़िल्मी कलाकार आते हैं और अपनी अपनी सीटों पर बैठ जाते हैं, एक दूसरे का अभिवादन भी नहीं करते हैं.

हमलोगों के दौर में हमलोग एक दूसरे हेलो बोलने जाते थे. संकट के समय में राज कपूर जी के घर पर जमा होते थे. या देश में आयी किसी आपदा के समय में सुनील दत्त जी हम सबको चैरेटी के लिए एकजुट कर लेते थे.

उस दौर में आपसी मेलजोल था, जिसके अब नहीं होने पर अफ़सोस होता है.

सवाल- एक देश के तौर पर हम लोगों के मूल्यों में गिरावट आयी है, क्या ये बात आपको परेशान करती है?

जवाब- हर कोई कट्टर या धर्मांध नहीं हुआ है. एकाध ऐसे लोग हैं जो चीखने-चिल्लाने का काम कर रहे हैं. सिस्टम ऐसा है जो इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है. इन सबके पीछे ख़ास लोगों का एजेंडा होता है.

उसपर से इंटरनेट के दौर में ये आग की तरह फैलता है और वायरल हो जाता है. पीड़ितों की चुप्पी की वजह से गलत करने वालों के हौसले बुलंद हैं.

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सवाल- इन मुद्दों पर बॉलीवुड की आवाज़ कहां है?

जवाब- देश के ज्वलंत मुद्दों को कुछ लोगों ने टालना शुरू कर दिया है. हालांकि हमारे पास ऋषि कपूर जैसे कलाकार भी थे, जो सबके सामने अपनी राय ज़ाहिर करते थे.

पिछले साल कोलकाता में हुए फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान अमिताभ बच्चन को मंच पर शाहरुख़ ख़ान के साथ अपनी बात रखते देख मुझे बहुत खुशी हुई थी.

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