यूपी के दिल लखनऊ से रोड शो, मतदाताओं के दिल में जगह बना पाएंगी प्रियंका?
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रोड शो। इसके साथ ही प्रियंका गांधी का राजनीति में सक्रिय अवतरण। कांग्रेस की उम्मीद हैं प्रियंका तो कार्यकर्ताओं की अपेक्षा भी। प्रियंका गांधी के हाथों में कांग्रेस के लिए 42 लोकसभा सीटों में जीत दिलाने का दारोमदार है। अगर पार्टी के लिए वह आधी सीटें भी जिताने में सफल रहीं, तो यह प्रियंका के नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिहाज से निर्णायक होगा।

चुनाव प्रचार के साथ ही उम्मीदों का इतना बड़ा बोझ प्रियंका पर डालना उचित नहीं होगा। मगर, ये उम्मीद यूं ही पैदा नहीं हो रही है। प्रियंका के चुनाव मैदान में उतरने से सबसे अधिक बेचैनी बीजेपी खेमे में है जिनके पास पूर्वांचल की ज्यादातर सीटें हैं। यह अकारण नहीं है कि रोड शो के पहले बीजेपी सांसद रविन्द्र दुबे प्रियंका पर उनकी पोशाक के बहाने हमले बोल रहे हैं। दरअसल यह उस बेचैनी का प्रकटीकरण है जो बीजेपी खेमे में है।

प्रियंका मास लीडर ही नहीं, रणनीतिकार भी
प्रियंका सिर्फ मास लीडर नहीं हैं। वह रणनीतिकार भी रही हैं। किसके साथ गठबंधन किया जाए, कैसे जीत सुनिश्चित हो इस कला में वह निपुण हैं। वह अच्छी वक्ता भी हैं और अच्छी वार्ताकार भी। वह सवाल भी उठाती हैं। उनको जवाब देना भी आता है। इसलिए यह तय है कि वह सभी 42 सीटों पर फोकस नहीं करेंगी। मगर, ये भी तय है कि ऐसा वह संदेश भी नहीं देंगी कि कोई सीट उनकी प्राथमिकता में नहीं है। निश्चित रूप से प्रियंका गांधी के एजेंडे में वे सीटें सबसे पहले हैं जिन्हें कांग्रेस ने 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस ने जीती थी। इन सीटों में शामिल हैं- मुरादाबाद, बरेली, खेरी, धौराहा, उन्नाव, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फर्रुखाबाद, कानपुर, अकबरपुर, झांसी, बाराबंकी, फैजाबाद, बहराईच, श्रावस्ती, गोंडा, डुमरियागंज, महाराजगंज और कुशीनगर। ये सीटें रायबरेली और अमेठी को छोड़कर हैं।
लखनऊ में दफ्तर खोलना, वहीं से चुनाव प्रचार का आगाज करना प्रतीकात्मक भी है और रणनीति के ख्याल से भी यह अहम है। लखनऊ कांग्रेस का परम्परागत गढ़ रही है। आज के दौर में लोग जरूर मानते हैं कि रीता बहुगुणा जोशी के पार्टी छोड़ देने के बाद कांग्रेस वहां कमजोर हुई है लेकिन कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि जब खुद प्रियंका गांधी यहां चुनाव प्रचार की बागडोर सम्भाल लेंगी तो यह सीट फिर से कांग्रेस अपनी झोली में कर ले सकती है। वैसे, कांग्रेस दोबारा रीता बहुगुणा जोशी को अपने पाले में लाने की कोशिश भी कर सकती है। ऐसी कोशिश प्रियंका की रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

माइक्रो मैनेजमेंट में कुशल हैं प्रियंका
प्रियंका गांधी की खासियत निर्वाचन क्षेत्र का माइक्रो मैनेजमेंट है। प्रियंका की कोशिश स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रभावकारी गुटों, समूहों और जातिगत वर्गों को भी जोड़ने में महारत रखती हैं। हर सीट के आधार पर ये कोशिश की जाती है। प्रियंका में यह क्षमता भी है कि अगर कोई सीट एसपी-बीएसपी उम्मीदवार की वजह से फंसती दिखेगी, तो वह अखिलेश और मायावती से अलग से उस बारे में बात भी कर ले सकती हैं। यह क्षमता किसी और कांग्रेस नेता में नहीं है।

मीडिया में बने रहना प्रियंका का है प्लस प्वाइंट
प्रियंका का मीडिया में बने रहना भी उनका प्लस प्वाइंट है। प्रियंका की मौजूदगी मात्र से कोई इलाका, कोई मुद्दा सुर्खियों में आ जाता है। यह एक ऐसा आकर्षण है जो उन्हें उनकी सक्रियता के अनुपात में सफलता की ओर ले जाता है। इसका मतलब ये हुआ कि प्रियंका जितना अधिक मेहनत करेंगी, नतीजे उतने बेहतर आएंगे। ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रियंका की पकड़ बहुत मजबूत है। ये दो बातें उन्हें किसी लोकसभा चुनाव में बगैर प्रचार के ही लीड दिलाती है। इसकी वजह ये है कि पर्दे के पीछे से सियासत करते हुए भी प्रियंका का मतदाताओं से कनेक्शन रहा है। वह कार्यकर्ताओं को नाम से जानती हैं। नेताओं से सीधा संवाद रखती हैं।

रोड शो के लिए लखनऊ को चुनने की भी है वजह
रोड शो के लिए प्रियंका ने वाराणसी या गोरखपुर न चुनकर लखनऊ चुना है तो इसके पीछे की वजह ये है कि लखनऊ से लेकर कानपुर तक कांग्रेस का अच्छा प्रभाव रहा है। इसके अलावा लखनऊ से प्रदेश की राजनीति को पकड़ में रखना कहीं आसान है। मगर, सबसे बड़ी बात ये है कि इन्दिरा गांधी भी यहीं से चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया करती थीं। जिस दफ्तर में इन्दिरा बैठा करती थीं, उसी दफ्तर से प्रियंका चुनाव अभियान की कमान सम्भाल रही हैं।
लखनऊ के रोड शो से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह होना लाजिमी है। कुछ दिन पहले तक जहां कांग्रेस को उम्मीदवार के लाले पड़ रहे थे, अब उम्मीदवारों की होड़ लग गयी है। अभी दूसरी पार्टियों से टूटने और रूठने वाले उम्मीदवारों का लाइन लगना बाकी है। निश्चित रूप से यह बदलाव आया है या आने वाला है तो इसके पीछे वजह हैं प्रियंका गांधी। प्रियंका गांधी ने चुनावी राजनीति में कदम रखने से पहले ही जो फ़िजां बांध दी थी, वह उनके कदम रखने के बाद कांग्रेस के लिए अनुकूल होने वाला है, ऐसा कांग्रेसी उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन, कोई बड़ा मतलब निकालने के लिए अभी कम से कम एक महीने का इंतज़ार करना चाहिए।












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