Manmohan Singh के पास कैम्ब्रिज में थी पैसों की किल्लत, भूखे पेट रहे, कैडबरी चॉकलेट से किया गुजारा
Manmohan Singh News: बात 1950 के दशक के मध्य की है। जब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे मनमोहन सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'पैसे' की थी। उनकी बेटी, दमन सिंह, ने अपनी किताब 'स्ट्रिक्टली पर्सनल: मनमोहन एंड गुरशरण' में उनके जीवन के इस संघर्षपूर्ण दौर का जिक्र किया है।
किताब 2014 में प्रकाशित हुई थी और इसमें बताया गया है कि कैसे आर्थिक तंगी के बावजूद, मनमोहन सिंह ने न सिर्फ पढ़ाई में उत्कृष्टता हासिल की, बल्कि अपने सिद्धांतों और सादगी को भी बनाए रखा। किताब में यह भी बताया गया है कि कैसे भूखे पेट रहकर सर्द रातें मनमोहन सिंह ने काटी। आइए जानते हैं पूरा किस्सा...

भूखे पेट रहे, 6 पैसे वाली चॉकलेट बनी सहारा
मनमोहन सिंह का जन्म अब पाकिस्तान के हिस्से में आने वाले गाह गांव में हुआ था। उनकी परवरिश एक साधारण गांव के माहौल में हुई। जब वह कैम्ब्रिज में पढ़ाई कर रहे थे, उनकी छात्रवृत्ति केवल £160 (वर्तमान में 17,164.99 इंडियन रुपए) थी, जबकि सालाना खर्च £600 होता था। इस वजह से उन्हें अपने पिता से आर्थिक मदद लेनी पड़ी।
पैसों की तंगी इतनी थी कि कई बार उन्हें खाना छोड़ना पड़ता या 6 पैसे वाली कैडबरी चॉकलेट खाकर गुजारा करना पड़ता। उन्होंने बाहर खाने या शराब पीने से हमेशा परहेज किया और अपने खर्चों को नियंत्रित करने के लिए बेहद सादगी भरा जीवन जिया।
सिद्धांतों पर समझौता नहीं, पैसे उधार नहीं
इन मुश्किलों के बावजूद, मनमोहन सिंह ने कभी किसी से पैसे उधार नहीं लिए। उन्होंने एक बार अपने दोस्त मदन लाल सूदन से मदद लेने के बारे में सोचा, लेकिन ऐसा करने से मना कर दिया।
अपनी पहली साल की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन के बाद, उन्होंने मदन को पत्र लिखा कि उन्हें लगभग £20 (वर्तमान 2,145.74 भारतीय रुपया)का पुरस्कार मिलेगा। लेकिन, उन्होंने इसे लेकर कभी किसी तरह का दबाव नहीं बनाया। उनकी ईमानदारी और आत्मनिर्भरता उनके जीवन के मुख्य गुण थे।
संगीत, हास्य और परिवार से जुड़ी यादें
दमन सिंह ने अपने पिता के संगीत और हास्य प्रेम के बारे में भी बताया है। पारिवारिक पिकनिक और समारोहों में वह "लगता नहीं है जी मेरा" और अमृता प्रीतम की "आखन वारिस शाह नूं" जैसे गीत गाते थे, जो बंटवारे और निर्वासन की भावनाओं को दर्शाते थे।
सिंह का हास्यबोध उनके दोस्तों और परिवार के बीच हमेशा जीवंत रहता था। वह अपने करीबी लोगों को स्नेहभरे उपनाम देते थे। उनकी पत्नी को वह गुरुदेव, और बच्चों को किक, लिटिल नोआन, लिटिल राम कहकर बुलाते थे। यहां तक कि उनके कुत्ते का नाम नट बाबू था।
संगीत और हास्य का प्यार
मनमोहन सिंह न केवल एक गंभीर और सादगीपूर्ण जीवन जीते थे, बल्कि उन्हें संगीत और हास्य से भी गहरा लगाव था। पारिवारिक पिकनिक और समारोहों में वह "लगता नहीं है जी मेरा" और अमृता प्रीतम की कविता "आंखन वारिस शाह नूंल" गाते थे।
"आंखन वारिस शाह नूं" विभाजन के दर्द को बयां करती है, और बहादुर शाह जफर की "लगता नहीं है जी मेरा" निर्वासन के दर्द को। ये गाने उनकी संवेदनशीलता और गहराई को दर्शाते हैं।
पत्नी, बच्चों को दिया मजाकिया नाम
उनके हास्य का भी अपना अंदाज़ था। दोस्तों के बीच वह चुटकुले सुनाते और उपनाम रखते। परिवार में उन्होंने अपनी पत्नी को गुरुदेव, और बच्चों को किक, लिटिल नोआन, लिटिल राम रखा। उनके पालतू डॉग स्नूपी को वह प्यार से नट बाबू, नटर, डूज फेलो जैसे नामों से बुलाते थे।
संघर्ष से मिली सफलता
मनमोहन सिंह ने 1957 में कैम्ब्रिज से अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी सम्मान ट्रिपोस डिग्री प्राप्त की। उनका यह सफर न सिर्फ उनकी शैक्षणिक सफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे ईमानदारी, सादगी और मेहनत से कोई व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है।
उनके जीवन के ये पहलू हमें सिखाते हैं कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हम अपने मूल्यों और मेहनत पर भरोसा रखें, तो हर बाधा पार की जा सकती है।
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