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Manipur Violence: मणिपुर में फिर जातीय टकराव! त्योहार मनाने को लेकर कुकी और मैतेई समुदाय आमने-सामने

Manipur Violence: मणिपुर (Manipur) में लंबे समय से जारी जातीय संघर्ष के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ गया। कुकी समुदाय (Kuki communities) ने मैतेई समुदाय (Meitei communities) को अपने इलाके में आने से मना कर दिया है।

इसको लेकर कुकी समुदाय ने बयान जारी किया है। जिसमें कहा गया है कि,जब तक कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकाला जाता तब तक हमारे इलाके में नहीं आ सकते हैं। इस बयान के बाद एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है।

Manipur Violence

जानिए क्या है पूरा मामला?

दरअसल, मैतेई समुदाय का एक पारंपरिक वार्षिक पर्व, जो एक पहाड़ी की तीर्थयात्रा से जुड़ा है। यह पर्व 'चेइराओबा' (Cheiraoba) के अवसर पर मनाया जाता है, जो मैतेई नववर्ष का प्रतीक है और हर साल अप्रैल के मध्य में आता है। इस अवसर पर मैतेई समुदाय 'थंगजिंग हिल' की चढ़ाई करता है, जिसे वे पवित्र मानते हैं।

यह परंपरा 'चेइराओ चिंग काबा' के नाम से जानी जाती है। ये पर्व जहां पर मनाया जाता है वो कुकी बहुल क्षेत्र है। कुकी समुदाय ने अपने इलाके में त्योहार मनाने की परमिशन नहीं दी है। जिससे एक बार फिर से तनाव की स्थिति है।

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छह कुकी जनजातीय संगठनों ने जारी किया बयान

इस बार छह कुकी जनजातीय संगठनों, जिनमें 'कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन' भी शामिल है, ने मैतेई समुदाय से आग्रह किया है कि वे 'बफर ज़ोन' को पार न करें। यह बफर ज़ोन इंफाल घाटी (जो मैतेई बहुल क्षेत्र है) और आसपास की पहाड़ियों (जहाँ कुकी-जो-हमार जनजातियां निवास करती हैं) के बीच की सीमित पट्टी है।

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संयुक्त बयान में क्या कहा गया?

इन संगठनों ने एक संयुक्त बयान में कहा, 'जब तक भारत सरकार द्वारा कुकी-जो-हमारे समुदाय के लिए संविधान के तहत कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक मैतेई समुदाय के लोगों को हमारे क्षेत्र की ओर कोई मैत्रीपूर्ण पहल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।'

बयान में आगे कहा गया है कि यदि कोई बफर ज़ोन पार करने की कोशिश की गई, तो उसका "पूरी ताक़त से विरोध" किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार से अपील की गई है कि वह दोनों समुदायों के हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए।

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हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोगों की हो चुकी है मौत

यह उल्लेखनीय है कि मणिपुर में मई 2023 से जातीय हिंसा जारी है, जिसमें अब तक 250 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं। फरवरी 2024 में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित हुई है।

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