VD Satheesan CM Keralam: ‘केरलम' के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे वीडी सतीशन, कैसे वेणुगोपाल को पछाड़ बने पहली पसंद

VD Satheesan First CM Keralam: केरल में 'किंग' कौन होगा, इसका फैसला दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक की मैराथन बैठकों के बाद हो गया है। 14 मई को कांग्रेस आलाकमान ने 6 बार के विधायक और पूर्व नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना है।

खास बात यह है कि वह 'केरलम' नाम वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। इससे पहले पिनाराई विजयन ने 'केरल' के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी।

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मुख्यमंत्री पद की रेस में कांग्रेस के दिग्गज नेता केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला जैसे बड़े नाम शामिल थे, लेकिन आखिर में जमीनी राजनीति में मजबूत पकड़ और संगठन पर प्रभाव रखने वाले वीडी सतीशन सबसे आगे निकल गए। अब सवाल यही उठ रहा है कि आखिर सतीशन ने कांग्रेस आलाकमान का भरोसा कैसे जीता और केसी वेणुगोपाल जैसे बड़े नेता को कैसे पीछे छोड़ दिया?

KC Venugopal vs VD Satheesan: कांग्रेस की लंबी माथापच्ची के बाद सतीशन के नाम पर सहमति

केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) को बड़ी जीत मिली। इसके बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान शुरू हो गई। एक तरफ राहुल गांधी के करीबी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल थे, तो दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष रह चुके वीडी सतीशन। रमेश चेन्निथला भी रेस में बने हुए थे। दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक लगातार बैठकों का दौर चला। कांग्रेस हाईकमान ने विधायकों, सांसदों और गठबंधन सहयोगियों की राय ली। आखिरकार विधायकों और सहयोगी दलों का झुकाव वीडी सतीशन की तरफ ज्यादा दिखाई दिया।

आखिर क्यों भारी पड़े वीडी सतीशन?

वीडी सतीशन पिछले कई वर्षों से केरल कांग्रेस का मजबूत चेहरा माने जाते हैं। वह 2001 से लगातार परवूर विधानसभा सीट से विधायक हैं। 2021 में उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था और इसके बाद उन्होंने विधानसभा में लेफ्ट सरकार को कई मुद्दों पर घेरा।

भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक विफलता और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों पर उनकी आक्रामक राजनीति ने उन्हें जनता और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय बना दिया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने पूरे राज्य में कांग्रेस के लिए जमकर प्रचार किया।

कांग्रेस नेतृत्व को लगा कि सतीशन ऐसा चेहरा हैं जो संगठन, कार्यकर्ताओं और गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चल सकते हैं। यही वजह रही कि आखिर में उनके नाम पर मुहर लग गई।

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केसी वेणुगोपाल क्यों रह गए पीछे?

केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा था। दिल्ली की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ है और वह कांग्रेस संगठन में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन राज्य स्तर पर कई नेताओं और सहयोगी दलों का समर्थन उन्हें पूरी तरह नहीं मिल सका।

इसके अलावा वे फिलहाल लोकसभा सांसद हैं। अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता तो छह महीने के भीतर विधानसभा सदस्य बनना जरूरी होता। कांग्रेस नेतृत्व शायद इस जोखिम से बचना चाहता था। सूत्रों के मुताबिक IUML जैसे अहम सहयोगी दलों ने वीडी सतीशन के नाम का ही समर्थन किया, जिसने उनके पक्ष को और मजबूत बना दिया।

कैसे 'केरल' से 'केरलम' बना चुनावी मुद्दा?

इस बार विधानसभा चुनाव में सिर्फ सत्ता परिवर्तन ही नहीं, बल्कि राज्य के नाम को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज रही। दरअसल राज्य सरकार और कई क्षेत्रीय संगठनों की ओर से लंबे समय से मांग उठ रही थी कि अंग्रेजी में भी राज्य का आधिकारिक नाम 'Kerala' की जगह 'Keralam' किया जाए।

केरलम नाम के समर्थकों का कहना था कि 'केरलम' राज्य की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के ज्यादा करीब है। चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को क्षेत्रीय अस्मिता और मलयाली पहचान से जोड़कर पेश किया गया। कांग्रेस और UDF ने इसे सांस्कृतिक सम्मान का मुद्दा बताया, जबकि विपक्ष ने इसे भावनात्मक राजनीति करार दिया।

हालांकि जनता के बीच यह मुद्दा काफी चर्चा में रहा और चुनावी माहौल में इसका असर भी देखने को मिला। अब वीडी सतीशन 'केरलम' नाम वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं, इसलिए यह प्रतीकात्मक रूप से भी एक बड़ा राजनीतिक क्षण माना जा रहा है।

सतीशन के सामने क्या होंगी चुनौतियां?

मुख्यमंत्री बनने के बाद वीडी सतीशन के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी। राज्य की आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, विकास परियोजनाएं और गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चलना उनकी प्राथमिकता होगी। इसके अलावा कांग्रेस नेतृत्व उनसे यह उम्मीद भी करेगा कि वह राज्य में पार्टी को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखें और लेफ्ट दलों की वापसी की संभावनाओं को कमजोर करें।

फिलहाल कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है और समर्थक इसे केरल की राजनीति में नए दौर की शुरुआत बता रहे हैं। वीडी सतीशन की जीत यह संदेश देती है कि कांग्रेस अब दिल्ली के करीबियों के बजाय जमीन पर सक्रिय नेताओं को प्राथमिकता दे रही है। 'केरलम' के लोग अब एक नई ऊर्जा के साथ विकास की नई कहानी की उम्मीद कर रहे हैं।

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