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Maharashtra Politics: सिर्फ 5 ही महीनों में कैसे BJP के लिए गैर-जरूरी होते गए एकनाथ शिंदे?

Maharashtra politics: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर तकरार और गठबंधन टूटने की चर्चा जोरों पर हैं। सीएम देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) और एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के बीच दूरियों के दावे किए जाते रहे हैं। एक बार फिर से प्रदेश की राजनीति में दोनों के बीच दूरियों पर चर्चा शुरू हो गई है। कुछ ही दिनों में प्रदेश में निकाय चुनाव हैं और शिवसेना एक बार फिर सौदेबाजी के मूड में नजर आ रही है। हालांकि, ऐसा नहीं लग रहा है कि बीजेपी शिंदे की डिमांड मानने के मूड में है। बीजेपी विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से एकनाथ शिंदे और उनकी पार्टी की डिमांड को अनदेखा करती रही है।

शिवसेना की डिमांड पर बीजेपी अब क्यों गंभीर नहीं

निकाय चुनाव से पहले शिवसेना लगातार बीजेपी को आंखें दिखा रही है। शिंदे की पार्टी के सांसद नरेश म्हस्के ने कहा है कि अगर सहयोगी दल निकाय चुनाव में अलग होना चाहते हैं, तो नवी मुंबई महानगरपालिका का चुनाव पार्टी अकेले ही लड़ेगी। शिवसेना सांसद ने कहा कि बीजेपी को इस वक्त सिर्फ अपने फायदे के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि साथी दलों का फायदा भी देखना चाहिए। पहले तो शिंदे को उनकी पसंद का मंत्रालय नहीं दिया गया और फिर लगातार उन्हें अहम बैठकों में अनदेखा करने की खबरें आईं। समझें कैसे सिर्फ ढाई साल में पूरा खेल बदल गया और एकनाथ शिंदे पार्टी के लिए गैर-जरूरी होते चले गए।

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शिवसेना ने निकाय चुनाव से पहले कहा कि कल्याण, डोंबी और ठाणे में हमारी पार्टी को बीजेपी से मदद मिलेगी। इतना ही नहीं शिवसेना सांसद ने यह भी कहा कि मुंबई में बीजेपी के सामने शिवसेना (UBT) और महाअघाड़ी की चुनौती है। ऐसे में अगर बीजेपी अकेले चुनाव लड़ती है, तो उसके वोट ही शिवसेना (शिंदे गुट) काटेगी। अब तक बीजेपी की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

एकनाथ शिंदे क्यों गैर-जरूरी होते दिख रहे बीजेपी के लिए

लोकसभा चुनाव तक एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के सीएम थे और महायुति में उनकी बड़ी और मजबूत भूमिका नजर आती थी। हालांकि, विधानसभा चुनाव के बाद से शिंदे और उनकी पार्टी का कद लगातार घटता ही जा रहा है। पहले तो शिंदे के लाख इच्छा जताने के बावजूद भी बीजेपी ने सीएम नहीं बनाया। उसके बाद भी उन्हें गृह मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय जैसे पसंद के विभाग नहीं मिले। बीजेपी की अकेले दम पर 131 सीटें हैं और शिवसेना के 55। प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 145 है और एनसीपी (अजित पवार) की पार्टी की 35 सीटें हैं। ऐसे में बहुमत के लिए शिंदे और उनकी पार्टी की जरूरत बीजेपी को नहीं है। अजित पवार अब तक एनडीए के साथ मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। डिप्टी सीएम के पद से लेकर मंत्रालयों के बंटवारे तक पवार ने हमेशा गठबंधन के अनुशासन को निभाया है और वह संतुष्ट भी नजर आते हैं।

NCP के साथ आने पर शिंदे की ही मुश्किलें बढ़ेंगी

विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद से बार-बार दावा किया जा रहा है कि पवार परिवार फिर से एकजुट हो सकता है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए जाने वाले डेलिगेशन में शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले का भी नाम है। ऐसी खबरें भी हैं कि सुप्रिया सुले को केंद्र में मंत्रालय दिया जा सकता है। शरद पवार ने पिछले कुछ महीनों में देवेंद्र फडणवीस, पीएम मोदी, बीजेपी और आरएसएस की भी तारीफ की है। चाचा-भतीजे के महाराष्ट्र में फिर से एक साथ आने का नुकसान शिंदे को होगा। एनडीए गठबंधन में उनका कद पहले की अपेक्षा और कमजोर हो सकता है। मौजूदा राजनीतिक हालात, चुनावी समीकरण और सरकार की स्थिरता तीनों के ही लिहाज से बीजेपी को अब शिंदे की उस तरह से जरूरत नहीं है जैसे पहले थी।

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