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'लोकपाल या जोकपाल!' हर महीने रेंट पर 50 लाख रुपये खर्च होने पर कांग्रेस ने कसा तंज

नई दिल्ली- कांग्रेस ने देश की सबसे बड़ी भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था के किराये पर हर महीने हो रहे 50 लाख रुपये की खर्च वाली मीडिया रिपोर्ट पर जोरदार तंज कसा है। कांग्रेस ने सवाल किया है कि यह 'लोकपाल है या जोकपाल।' बता दें कि इसी साल मार्च में गठित हुए लोकपाल के कार्यालय के लिए अभी स्थाई दफ्तर नहीं मिला है। जिसके चलते यह अभी दिल्ली के 5 स्टार अशोका होटल के 12 कमरों से चल रहा है, जिसपर कुछ महीनों में ही सिर्फ रेंट पर करीब 4 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। यह खुलासा एक आरटीआई से हुआ है, जिसके बाद कांग्रेस ने जोरदार हमला बोला है कि क्या इसी दिन के लिए दिल्ली में लोकपाल आंदोलन चलाया गया था।

लोकपाल या जोकपाल- कांग्रेस

लोकपाल या जोकपाल- कांग्रेस

दिल्ली के अशोका होटल में लोकपाल के दफ्तर के किराये पर हर महीने 50 लाख रुपये खर्च होने की खबरों पर कांग्रेस ने जोरदार हमला बोला है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा है कि, "लोकपाल या जोकपाल? होटल के ऑफिस पर हर महीने 50 लाख रुपये खर्च! सात महीनों से होटल ही ऑफिस बना हुआ है। " कांग्रेस ने ये भी आरोप लगाया है कि पिछले कुछ महीनों में ही हजार से ज्यादा भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली हैं, लेकिन प्राथमिक जांच भी किसी में नहीं शुरू हो पाई है। उनके मुताबिक, "31 अक्टूबर, 2019 तक भ्रष्टाचार की 1,116 शिकायतें मिलीं, लेकिन किसी में प्राथमिक जांच भी शुरू नहीं हो पाई है।" उन्होंने सवाल किया कि क्या बीजेपी के समर्थन से दिल्ली में इसी के लिए लोकपाल आंदोलन चलाया गया था।

7 महीने में 3.85 करोड़ रुपये रेंट दिया

7 महीने में 3.85 करोड़ रुपये रेंट दिया

इससे पहले खबरें आईं थी कि राजधानी दिल्ली में स्थाई दफ्तर के अभाव में लोकपाल को दिल्ली के आलीशान सरकारी 5 स्टार अशोका होटल को हर महीने 50 लाख रुपये बतौर किराया देना पड़ रहा है। इसका खुलासा एक आरटीआई से हुआ है। इसके मुताबिक, 'लोकपाल अस्थाई तौर पर अशोका होटल से काम कर रहा है। कुल मासिक किराया करीब 50 लाख रुपये है और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग से फिक्स किए गए किराए के तहत अबतक 3.85 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया जा चुका है (22 मार्च, 2019 से 31 अक्टूबर, 2019 तक)।' हालांकि, कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त और एक वक्त लोकपाल मूवमेंट से जुड़े रहे जस्टिस (रिटायर्ड) एन संतोष हेगड़ का कहना है कि उनके अनुभव के मुताबिक अगर 50 लाख रुपये महीना खर्च हो भी रहा है तो लोकपाल संस्था का होना ज्यादा जरूरी है। उन्होंने ये भी कहा कि आखिर सरकार का पैसा सरकार के ही जेब में तो जा रहा है।

जस्टिस (रि.) पीसी घोष हैं लोकपाल के पहले अध्यक्ष

जस्टिस (रि.) पीसी घोष हैं लोकपाल के पहले अध्यक्ष

गौरतलब है कि पब्लिक सर्वेंट्स के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई के लिए देश में भ्रष्टाचार-निरोधक यह सबसे बड़ी संस्था बनाई गई है। इस साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) पीसी घोष को लोकपाल का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उनके अलावा सरकार ने लोकपाल के बाकी 8 सदस्यों की भी नियुक्ति की थी, जिसमें 4 जुडिशियल और 4 नॉन-जुडिशियल मेंबर शामिल हैं। तब से लोकपाल का दफ्तर अशोका होटल की दूसरी मंजिल के 12 कमरों से चल रहा है। हालांकि, जस्टिस पीसी घोष के मुताबिक लोकपाल के स्थाई दफ्तर के लिए जगह देख ली गई है और जल्द ही यह कार्यालय वहां शिफ्ट होने की संभावना है।

भ्रष्टाचार की जांच के लिए सबसे बड़ी संस्था

भ्रष्टाचार की जांच के लिए सबसे बड़ी संस्था

18 साल के छात्र और आरटीआई ऐक्टिविस्ट सुभम खत्री को लोकपाल सचिवाल से जो जवाब दिया गया है, उसके मुताबिक 31 अक्टूबर तक पब्लिक सर्वेंट्स के खिलाफ उसे भ्रष्टाचार की 1,160 शिकायतें मिली हैं, लेकिन उनमें से कोई भी किसी जांच के लायक नहीं पाई गईं। जवाब के मुताबिक 1,000 शिकायतें लोकपाल ने सुनी हैं, जिनमें से किसी केस में भी प्राथमिक या पूरी जांच लोकपाल की ओर से अभी तक शुरू नहीं की गई है। बता दें कि लोकपाल के पास प्रधानमंत्री या पूर्व प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद या सरकार के ग्रुप ए,बी,सी और डी के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार है।

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