Karnataka Hijab Ban: आसान भाषा में समझिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जज ने क्यों किया बिजो इमैन्युअल केस का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने आज कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध (Karnataka Hijab Ban)मामले पर अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन कोर्ट का फैसला आपस में बंटा हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना बंटा हुआ फैसला दिया है। इस पूरे मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने की, जिसमे जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया शामिल थे। दोनों जजों ने इस मामले में अपनी अलग-अलग राय रखी है। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कि इस मामले में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के लिए जो याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसे वापस ले लेना चाहिए। जबकि दूसरे जज जस्टिस धूलिया ने कहा यह प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।

यथास्थिति बरकरार रहेगी
दोनों जजों की बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने को कहा है। बेंच ने अनुमोदन दिया है कि इस मामले की सुनवाई तीन जजों की बेंच को करनी चाहिए। ऐसे में तीन जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी और फैसला देगी कि क्या संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं। बहरहाल यह देखने वाली बात है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया इस मामले को किस बेंच को सौंपते हैं, लेकिन फिलहाल के लिए इस पूरे मामले में यथास्थिति बरकरार रहेगी।

बड़ी बेंच करेगी सुनवाई
हालांकि दो जजों की बेंच ने अपना फैसला सुनाया है लेकिन दोनों ही जजों का फैसला अलग-अलग है लिहाजा इस पूरे मामले में यथास्थिति बरकरार रहेगा। ऐसे में कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिजाब पर प्रतिबंध का जो फैसला दिया है वह पहले की ही तरह से बरकरार रहेगा। अब यह पूरा मामले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास है, वह इस मामले की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच का गठन करेंगे जोकि इस मामले की सुनवाई करेगी। चीफ जस्टिस ही यह तय करेंगे कि बेंच तीन जजों की होगी या उससे अधिक जजों की।

कहां से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की बात करें तो इसकी शुरुआत इसी साल फरवरी माह में कर्नाटक के उडुपी जिले से हुई थी, यहां पर स्कूल के भीतर हिजाब पहनकर छात्रों को भीतर आने पर रोक लगा दी गई थी। कुछ छात्राएं कर्नाटक के उडुपी के स्कूल में परीक्षा देने के लिए गई थीं, लेकिन इन छात्रों को स्कूल के भीतर आने से रोक दिया गया और उनसे कहा गया कि आप अपने हिजाब को निकालकर ही परीक्षा देने स्कूल के भीतर आ सकती हैं। इस पूरे मामले को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गया। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट में गया, जहां कहा गया कि हिजाब धार्मिक अभ्यास का हिस्सा नहीं है लिहाजा इसे शिक्षण संस्थानों में लागू नहीं करना चाहिए। कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

जस्टिस धूलिया ने बिजो इमैन्युअल केस का किया जिक्र
जस्टिस धूलिया ने कहा कि मेरे फैसले का मुख्य आधार जरूरी धार्मिक अभ्यास का है, मेरी राय में इस मामले को खत्म करने की जरूरत नहीं है। संभवत: कर्नाटक हाई कोर्ट ने गलत रुख अख्तियार किया। यह आर्टिकल 19 और आर्टिकल 25 से जुड़ा सवाल था। यह अपनी पसंद का मामला है। ना इससे ज्यादा, ना इससे कम। बिजो इमैन्युल का केस इस पूरे मामले से ही जुड़ा है। सबसे पहले जो बात विचार में रहनी चाहिए वह छात्रा की शिक्षा है। ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण इलाकों में लड़कियों को शिक्षा हासिल करने के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्कूल जाने से पहले कई काम करने होते हैं। उनके सामने अन्य कई दिक्कतें भी होती हैं। क्या हम उनका जीवन बेहतर कर रहे हैं। मेरे दिमाग में यही सवाल था।

आखिर क्या है बिजो इमैन्युल केस
अगस्त 1986 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमे जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी और एमएम दत्त शामिल थे, उन्होंने बिजो इमैन्युअल बनाम केरल हाई कोर्ट केस में अपना फैसला दिया था। स्कूल के भीतर तीन छात्राएं राष्ट्रगान में शामिल नहीं हुई थीं। कोर्ट ने कहा था कि बच्चों को जबरन राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करना उनके मौलिक अधिकार धर्म के अधिकार के खिलाफ है। बच्चे के पिता वीजे इमैन्युअल ने अपील की थी राष्ट्रगान का सम्मान होना चाहिए, लिहाजा मेरी बेटी इसके सम्मान में खड़ी होगी लेकिन उसे धर्म के अधिकार के तहत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वहीं केरल सरकार का कहना था कि हमने राष्ट्रगान का विश्लेषण किया है इसमे कोई भी शब्द या विचार ऐसा नहीं है जो किसी की धार्मिक भावना को आहत करे, लिहाजा यह गुमराह करने वाली दलील है।

क्या था पूरा मामला
दरअसल 1985 में कोट्टयम जिले में स्थित स्कूल में 15 साल की बिजो इमैन्युअल और कक्षा 10 में पढ़ती थीं और उनकी बहन बिनू और बिंदू कक्षा 9 और 5 में पढ़ती थीं। उन्हें स्कूल से इस वजह से सस्पेंड कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया था। तीनों ही एनएसएस हाई स्कूल की छात्राएं थी, जिसे हिंदू संगठन नैयर सर्विस सोसाइटी चलाता था। स्कूल में 11 छात्र थे जोकि उस वक्त के जेहोवा विटनेस धार्मिक संगठने से आते थे। इन बच्चों के माता-पिता, कॉलेज के प्रोफेसर वीजे वीजे इमैन्युअल ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन एकल जज की बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया था। उन्होंने फिर से अपील की, लेकिन दोबारा खारिज होने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया।

कोर्ट ने बच्चों के हक में सुनाया फैसला
बिजो इमैन्युअल केस में कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 आस्था पर आधारित है, जोकि सच्चे लोकतंत्र की पहचान कराती है। लिहाजा इस आर्टिकल का इस्तेमाल करते हुए यह ध्यान रहना चाहिए कि लोकतंत्र में छोटे से छोटे समूह की रक्षा करती है। कोर्ट ने कहा कि हमारी परंपरा हमे सहनशीलता सिखाती है, हमारा दर्शन हमे सहनशीलता सिखाता है, हमारा संविधान हमे सहनशीलता सिखाता है। हम इस बात से संतुष्ट हैं कि तीनों बच्चे राष्ट्रगान के समय उसके सम्मान में खड़े रहते थे, लेकिन अपने धर्म की खातिर उसे गाते नहीं थे, लिहाजा उन्हें स्कूल से निकाला जाना गलत है। हम हाई कोर्ट के फैसले को किनारे करते हैं और याचिकाकर्ता की अपील को स्वीकार करते हैं, बच्चों को फिर से स्कूल में दाखिल किया जाए, हम सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि हमारा संविधान, परंपरा, दर्शन हमे सहनशीलता सिखाता है।












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